Monday, June 27, 2016

कहानीपन माने सही सही क्या ?

कहानीपन की खोज का प्रश्न मेरे भीतर इस तरह आया कि जब मैंने सोचा कि -
मुझे किस तरह की कहानियां लिखनी चाहिएं?
किस तरह की  कहानियां लोग पसंद करते हैं ?
या
खुद मुझे  किस तरह की  कहानियां लोग पसंद  हैं ?
जाहिर है इस खोज  में ,मैं पाठक थी ,लेखक थी ,आलोचक थी ;.........
तो इस तरह जब अपनी पढ़ी हुई कहानियों के कुएं (सटीक उपमा है ,क्योंकि कम पढ़ा है या कह लें ,सर्व काल और सर्व देशों के साहित्य सागर को देखते हुए यह किसी भी व्यक्ति की सीमा भी है   ) में डुबकी लगाई तो एक कहानी पकड़ में आई -ओ हेनरी की -a cup of tea .
छोटी सी कहानी है । मजेदार है । witty है ।
मोहतरमा को खरीददारी के दौरान एक गरीबनी मिल गयी । सहानुभूति में वह उसे घर ले आई । मियां ने देखा यह क्या बला गले पड़ गयी । मोहतरमा को समझाया तो वह उल्टे बहस में उलझने लगी । आखिर मियां  थक कर बोला -रख लो ।  देखने में भी  खासी सुन्दर है ।
बस्स।
लुगाई का तो मथ्था ठनक गया । उसने तो फ़ौरन उस औरत को एक कप चा पिलाके दफा करा । (दो जबान के लहजों में इस कहानी का सार पेश किया है और मुझे लगता है कि  दोनों मजेदार बने हैं )
इस कहानी का कहानीपन उस युक्ति में है जहाँ  एक घटना में औरत मन के रहस्य को पकड़ा गया है । मजेदार है । light है । हेवी नहीं है ।
इनकी और भी कहानियां हैं । ज्यादातर witty है |
तो कहानियों की पसंद का एक नुक्ता हाथ में आया - light
पर क्या मैं खुद ऐसी कहानियां लिख सकती हूँ ?
शायद नहीं या शायद हाँ (पर atleast अभी तो नहीं । ) 

Tuesday, June 14, 2016

कहानी का कहानीपन ,सही सही क्या ?

बी ए  spm college से की | वहाँ  वृन्दावन लाल वर्मा के उपन्यास और शरत चन्द्र के उपन्यास खूब पढ़े | बहुत से अंग्रेजी नावेल भी पढ़े |बल्कि एक समय ऐसा भी आया कि मैं हिंदी से उब गयी थी और इंग्लिश पढना ही पसंद करती थी |थर्ड इयर में ख्याल आया कि इतना कुछ पढ़ती हूँ ,पढ़कर भूल जाती हूँ |कभी कोई पूछ ले कि आपने क्या-क्या पढ़ रखा है तो क्या जवाब दूंगी ? तो ये सोचकर एक बार डायरी में लिस्ट बनाइ  |१३ किताबे याद आई -जिनमे शानी का काला जल ,गोर्की का माँ भी थी |बल्कि माँ उपन्यास की  तो उस समय में  मैंने छोटी-मोटी  समीक्षा भी लिखी थी |.......पर यह सब कुछ जल्द ही भूल-भाला गया|
.................
अब लगभग  २-३ साल से दोबारा लिखना शुरू किया था |अब वैसी दिखाने की /नुमाइश की  हसरतें बाकी नही रही |बल्कि अब तो कुछ अच्छा लगता है तो नोट कर लेती हूँ ,नहीं तो भूल जाती हूँ |भूल जाने का अब कोई दर्द  नहीं | बल्कि सोचती हूँ अच्छा है |दिमाग का बोझ कम हुआ |पढने का कोई प्रतिबन्ध नहीं है | कुछ भी पढ़ लूँ | पर टिकेगा वही ,जो स्ट्राइक करेगा | इस मामले में मैं खुद को एक  दुश्प्रसाद्य (hard to please)पाठक मानती हूँ |सचमुच एक लेखक के लिए मुझे प्रसन्न  करना अत्यंत कठिन है |लेखन-कर्म के प्रति मेरे आदर्श बहुत ऊँचे है | मैं स्वयं कैसी लेखक हूँ ,यह तो समय ही बताएगा |.....    
तो इस तरह एक बार ख्याल आया कि कहानी क्या होती है ?अर्थात कहानी का कहानीपन ,सही सही ,क्या -किस्मे होता है ?
जाहिर है इस प्रॉब्लम को थेओरीटिकली सोल्व करने चलती ,तो कई सारी  आलोचनात्मक किताबों की  भूल-भुलईया में फंस कर रह जाती |
तो मैंने एक ,स्वयं का ,आसान रास्ता निकाला कि याद किया कि मुझे कौन सी कहानियां पसंद हैं और क्यूँ ? -तो इससे मुझे अपनी पसंद का भी पता चल जाएगा और कहानीपन को भी जानने में आसानी होगी |
(next post -next weeek)
  

Thursday, June 9, 2016

शब्दों की दुनिया

अब तो मैं ये मानती हूँ कि बहुत ज्यादा पढना आपको  फिजिकली लेजी बना देता है |आपको बहुत कच्ची उम्र में 'जिंदगी क्या है ?'जैसे  जटिल प्रश्न में उलझा देता है |इस गुत्थी को सुलझाते -सुलझते ,आखिर आपके पास कोई चारा नही बचता की आप शब्दों की दुनिया (जंगल ,बियाबान ,रेगिस्तान ,गहन समुद्र ,अनत आकाश ,भयानक वन ) में पहुंच  जाए | बेशक ये स्वास्थ्य (आपके परिवार )के लिए हानिकारक है |
किसी ने सही कहा है कि अति हर चीज की बुरी होती है |खैर ..
पढने की  शुरुआत कॉमिक्स से हुई |प्राण की कोमिक्स से -चाचा चौधरी ,पिंकी ,बिल्लू ,रमन |सुपर कमांडो ध्रुव ,अमर चित्र कथा |इनके किरदार हमेशा हँसते  ,मुस्कुराते ,चलाचल तबियत के थे |ऐसा लगता था कि पढ़कर हमारी ज़िन्दगी में भी रवानगी सी आ गयी है (जो की, उस समय ,वास्तव में पढने से प्रसन्नता आदि भावों की रवानगी होती थी  ) खैर ....
सांतवी -आठवी तक मैंने जैन कथाएँ -केवल मुनि जी की (जिनमे मैंना सुंदरी ,गुणसागर ,धन्ना सेठ,अमर कुमार  ) पढ़ ली थी | (उपलब्धता के कारन ,क्योंकि पीतम पुरा में हमारा घर जैन स्थानक के सामने ही था |मेरे जीवन में यह संयोग हमेशा रहा | हमारे घर अधिकतर जैन स्थानक के आस-पास ही रहे | क्योंकि  पापा सोचते थे कि इससे धार्मिक रूटीन (चातुर्मास में गुरुओं के दर्शन ,प्रवचन सुनना इत्यादि )को फ़ॉलो करने में आसानी रहेगी |बिना उस रूटीन के लगता था कि  जीवन में कुछ अर्थपूर्ण ........नहीं हो रहा है |खैर ...... )
टेंथ तक मुझे ये रिअलाइज़ (कोन्शिअसली )हो गया था कि मैं शब्दों की दुनिया में पहुंच गयी हूँ | मैं यहाँ अकेली हूँ| यह  बहुत भयानक है | लेकिन मुझे चलना होगा | रास्ता निकालना हो होगा |  

कहानीनामा - कहानियों का लेखा जोखा

कई टाइम से सोच रही थी ,यह  ब्लॉग शुरू करने की ;आखिर अब समय आया |
जो कुछ भी पढ़ती हूँ उसके नोट्स डायरी में लिखती हूँ |यह ब्लॉग उसी लेखन का नतीजा है |
लिखने का ड्यूरेशन तय नहीं है | कभी हर दिन ,कभी हफ्ते में ,तो कभी महीने में भी कोई पोस्ट आ सकती है|
पाठक प्रतिक्रिया देकर उत्साह अवश्य बढाएं|