Tuesday, September 13, 2016

कहानीपन -16

टिप्पणियों का सिलसिला अब ख़त्म होने को है |दो -चार और हैं ,इन्हें भी निपटा लेते हैं |
27 -11 -14
मृणाल पाण्डेय की कहानियों की किताब अकेडमी की लाइब्रेरी से लाई थी |अब तक एक पसंद आयी -शरण्य की ओर |बहुत क्लिष्ट लिखती हैं |
14-1 -15

  • मृदुला गर्ग को पढ़ा |ठीक था |लाइट हैं |
  • अशोक सकेसरिया की कहानी मोटर पार्ट्स का एजेंट पढ़ी ,अच्छी लगी |
  • विनोद शुक्ल की कहानी रुपये अच्छी लगी |
  • मृणाल की और भी कहानियां अच्छी लगीं |सुर् जी  ,रूबी .........बहुत क्लिष्ट हैं |
6-2-15
विनोद शुक्ल की कहानियों की किताब महाविद्यालय लायी थी |उनका स्टाइल सरल ,satirical तथा जिंदगी के भीतर गुंथा हुआ सा है |जिंदगी के ब्योरे देते -देते read between the lines की गुंजाईश बहुत है |कहे हुए से अधिक अनकहा असरदार है |
12 -3 -15
अकेडमी में शर्मीला वोहरा जालान की कहानी फिनिक्स पढ़ी |अच्छी लगी |
8 -7 -15
फेसबुक पर प्रभात जी की वाल पर शाह की कंजरी पढ़ी तो अमृता के सधेपन और भाषा ने तुरंत खींच लिया |नेट पर और ढूंढा तो गद्य कोष में कई रचनाएँ दिखीं |रसीदी टिकट इत्यादि |साहिर के साथ उनके प्रेम की बातें ,कविताएँ इत्यादि |
अब उनके निबंधों और कहानियों की एक किताब लाई |तो अब पूरा पढ़ा है |इनके भीतर एक आग सी है |अमृता के युग में आम जनों का जीवन देखे तो बड़ी बेचारगी ,एक चक्कर में गति करते हुए लोगों का जड़ जीवन है |उनका युग आज़ादी की आग से धधकता हुआ युग था ,पर आश्चर्य है कि उन्होंने अपना रास्ता व्यक्तिगत स्वतंत्रता का चुना |वे नारी की स्वतंत्रता और प्रेम के अधिकार की बात अपने साहित्य में कहती हैं |
in between comments -एक जगह अमृता ने कहा है की मेरे  साहित्य का हश्र वही होगा जो नाजायज बच्चों का होता है | क्यों ?
ऐसा क्यों कहा होगा अमृता ने |
अगर हम उनके लेखन और उन पर लिखे हुए लेखन को पढ़ें (बल्कि  जरुरत ही नहीं ,अमृता ने खुद ऐसे हवाले अपनी आत्मकथा में दे दिए हैं ) ,तो उनकी इस बात के मर्म को समझना मुश्किल नहीं है |उन्होंने लगभग 25 साल के बाद अपनी शादी तोड़ी |जिसे चाहा ,उसका साथ भी नहीं मिला |पर उनमें एक  आग थी |समाज की सड़ी -गली रिवायतें न मानने की आग |
पर इसकी कीमत चुकानी पड़ती है |अमृता की आग भी आखिर विस्फोटक होकर उसे ही लील गयी ,और उसका जीवन एक राख बन  कर रह गया |पर अमृता हारी नहीं |वह चलती रही |और चलने की निरंतरता ने आखिर उसे इल्मियत (ज्ञान )के महत्त्व से परिचित कराया |उसकी आवाज़ स्वतंत्रता की ,विद्रोह के साहस  की आवाज़ बन  गयी |अपनी लकीर ,अपनी किस्मत खुद लिखने वाली |
पर्सनली कहूँ तो मुझे इनके विषयों से असहमति हो सकती है ,पर इनका लिटरेरी टेस्ट बहुत बढ़िया है | i really liked her style and taste .
30 -7-15
चन्द्रकिरण सोनेरेक्सा की कहानियां एक चक्र में घूमते लोगों की कहानियां हैं |बचपन ,जवानी ,शादी ,काम -धंधा ,बच्चे ,मरण का चक्र |
इनके पात्र सवाल नहीं करते |अपने यथार्थ को देखते नहीं ,बस ,अनवरत परिस्थितिओं के अनुरूप हिचकोले खाते हुए, बहते चले जाते हैं ;छीजते ,टूटते ,बूढ़े होते ,ख़त्म होते चले जाते हैं |
इनकी कहानियों का सबसे विलक्षण तत्व है -इनकी भाषा |
23-9-15
विमल पाण्डेय की कहानी उत्तर प्रदेश की खिड़की पढ़ी |अच्छी थी |नायक की तीन दुनियाएं है -एक घर की ,एक वर्कप्लेस की ,एक उसके प्यार की |इन दुनियां के कांफ्लिक्ट्स की |फलक बहुत बड़ा रखा है |खासकर राजनीति को जबरदस्ती घुसेड़ा है |हो सकता है ,यह भाव हो कि हमारी दुर्दशा का कारण राजनीति है |भाषा अच्छी थी |satirical ,hilarious ,एकदम समझ में आने वाली |
शीषक खासा व्यंजक बन  गया है | उत्तर प्रदेश की झांकी (अर्थात खिड़की )दिखाती एक उम्दा कहानी |
हरे प्रकाश उपाध्याय की नाच पढ़ी |कम शब्दों में एक पर्टिकुलर टाइप के लोगों की पर्टिकुलर टाइप  की मानसिकता को अच्छा उकेरा है |

 

Monday, September 12, 2016

कहानीपन -15

9-10-14
एलिस मुनरो की कहानियाँ पढ़ी |
red dress -शीर्षक का औचित्य तो मुझे समझ नहीं आया |क्योंकि कहानी की सेंट्रल घटना तो वह पार्टी है |खैर ..
मुनरो का कहानी कहने का तरीका काफी अलग है |एक तो अधिकतर फर्स्ट पर्सन नेरैटिव स्टाइल में लिखती हैं तो कहानी की फॉर्म में यकायक चुस्ती आ जाती है |परिवेश ,पात्र ,चरित्र की रुपरेखा की डिटेलिंग  पर ज्यादा (शब्द ) खर्च नहीं करना पड़ता |
दुसरे मुनरो का स्टाइल कुछ ज्यादा ही चुस्त है |घटनाओं का ब्यौरा देने ,डिटेल्स के प्रभाव , पर , तुरंत उनसे बाहर आकर एक डिसपैशनेट कमेन्ट करना उनका स्टाइल है |

  • she does not take a second to reach to conclusion .
  • फिर कहानी का एक एक वाक्य का उपयोग सार्थक बात कहने के लिए करती हैं |as if something is boiling inside her .
  • particularly इस कहानी में मुझे वह प्वाइंट सबसे interesting लगा ,जब वह लड़की (नायिका के स्कुल में फ्रेशेर्स पार्टी है ,इसके लिए वह अपनी मां  से जिद करके एक लाल ड्रेस बनवा कर पहन कर जाती है ) पार्टी में किसी लड़के के साथ नृत्य कर पाने की इच्छा को रोके खड़ी थी और ऑलमोस्ट सिक फील कर रही थी (क्योंकि कोई भी उस पर ध्यान नहीं दे रहा था ,एक किशोर मन में उठने वाली भावनाओं की तेजी  )कि तभी उसे किसी दूसरी लड़की ने बुला लिया और एक अलग जगह जाकर उन्होंने सिगरेट पी और तत्काल वे उस बॉल रूम के प्रभावों के घरे से बाहर आ गए |(इच्छा के भीतर होना और बाहर आना का अद्भुत एग्ज़ाम्प्ल है )
  • i guess munro has had been independent right through early age .
  • इन्हें भी नोबेल मिला है |और ये देखना कितना दिलचस्प है न , की सर्जनात्मकता की कोई सीमा ,कोई परिभाषा नहीं होती |आसमान जैसी अनंतता में उड़ना भी  सर्जनात्मकता है ,और किसी बात की गूढता को हौले से खोलना भी  सर्जनात्मकता है |
17-10 -14
मार्क ट्वेन की कहानी भाग्य पढ़ी |अच्छी लगी |दोबारा पढूंगी |
30-10-14
आज  मुनरो की दूसरी कहानी  पढ़ी -पेशन |ठीक थी  |उनके यहाँ जब लड़कियां जवानी में ही इंडिपेंडेंट रहती हैं ,तो वे अपनी शादी ,प्यार ,साथी के बारे में स्वयं सोचें ,जाने ,प्रयोग करें ,आगे बढ़ें ;तो इस तरह की कहानियां निकलना unexpected नहीं है |लेकिन अच्छा है ,लेखिका का अपने  दिल को जानना और उसे बोल्डली कहने की हिम्मत रखना |कहानी में कनाडा की लाइफ ,डिनर्स ,बुक्स ,गॉसिप्स अच्छे दिखाए हैं |i like munro's style very much .it is very fast ,decision taking .very confident characters ,speaking and knowing one's
mind exactly .
कहानी में नील की मृत्यु हो गयी और मौरी को भी ग्रेस ने रिजेक्ट कर दिया ,पर फिर भी ग्रेस के अकेले हो जाने की चिंता पाठक को नहीं सताती क्योंकि ग्रेस जैसी इंडिपेंडेंट ,thoughtful और searching-true-love- in -her-life -girl  के लिए पाठक को विश्वास है कि यह अपना कुछ न कुछ कर ही लेगी |यहाँ ,इंडिया , जैसी बेचारगी का ठप्पा  नहीं लगेगा
|इस कहानी में ग्रेस का प्यार को जानना ,नील का केरेक्टर इतना highlighting है कि इसके आगे अंत कुछ लगता ही नहीं |
31-10 -14
इनकी एक और कहानी पढ़ी -deep holes |समझ नहीं आई |जब २-२ ,3-3, शादियाँ आम हो तो उनके बीच क्या इंटिमेसी बचेगी |पर यह सब तो अब इंडिया में भी हो रहा है |

Sunday, September 11, 2016

कहानीपन -14

22-9 -14
आज सुनीता जैन की आत्मकथा पढ़ी -शब्द्काया |पढने का चाव इस प्रकार बन गया की सुधा अरोरा के किसी इंटरव्यू में किन्ही सुनीता का जिक्र आया था |अब वे जैन थी या नहीं ,इसी कन्फ्यूज़न में पढ़ गयी |बाद में दोबारा देखा तो वे सुनीता देशपांडे निकली |खैर  ...
सुनीता जैन को पढना  भी बुरा नहीं रहा |एक तो जैनियों की हिंदी साहित्य में उपस्थिति की वैसे भी उत्सुकता रहती है ,फिर कहानी के पहले भाग की भाषा सहज लगी तो पढ़ती ही चली गयी |
लेखिका ने अपने संघर्ष को साफगोई से बयान किया है |विशेषकर इनका अपने कालेज की दो अध्यापिकाओं से आकर्षण वाला भाग मुझे ज्यादा अच्छा लगा |अपने जीवन में मीनू मैडम का किस्सा याद  आ गया |रामसिंह वाला चैप्टर ठीक तो था पर इसमें रामसिंह का अलग से कोई व्यक्तित्व नहीं उभरा |ऐसा लगा कागज पर उतार कर लेखिका किसी भार से मुक्त हो रही है |
अमेरिका में डिग्री पाने की जद्दोजहद भी प्रेरणास्पद थी |
आत्मकथा में निजी संबंधो का एक व्यक्तित्व बनता है ,वह इस किताब में गायब है |सास से सम्बन्ध ,पति -बच्चों से सम्बन्ध पर इन्होने अधिक नहीं कहा है  |
संस्कृत शास्त्री वाला किस्सा ज्यादा ही खिंच गया |
मुनिश्री वाला प्रसंग ठीक था |पर नीरस लगा |
अशोक वाजपेयी प्रसंग ठीक था ,हिंदी के हालात दिखाने के लिए |सब यही बताते हैं |प्रकाशकों ,लेखकों के व्यव्हार पर लेखिका की टिप्पणियाँ धारदार हैं |
नौकरी ,इंटरव्यू  वाला प्रसंग भी ठीक था |
कुल 8 प्रसंग है |लेखिका का भाषा प्रेम ,भाषा का व्यक्तित्व निर्माण में योगदान इत्यादि प्रसंग लाजवाब है |गर्मी की छुट्टियों में पुस्तकें पढने की प्रेरणा देना अच्छी सलाह है |
एक जाने -पहचाने परिवेश के बारे में पढना सुखद रहा |
25 -9-14
सुधा अरोरा की कहानी '................भरवां करेले 'में पंडाइन शब्द का प्रयोग पात्र के सजीव चित्रण के लिए बहुत उपयुक्त है |इस शब्द के साथ सीधे पल्ले की साड़ी ,स्थूल का्य ,बीच की मांग निकली .सिंदूर ,कसी हुई चोटी ,बिंदी लगाये हुए महिला का चित्र साक्षात साकार हो उठता है |हिंदी की शक्ति |क्या इस तरह की व्यंजना गुप्ताइन ,या रस्तोगन शब्दों से की जा सकती है |
comments -सुधा अरोड़ा के साहित्य पर और कोई टिप्पणी नहीं है |कमाल है ,मैंने कहीं कुछ भी नहीं लिखा ;जबकि ये मेरी प्रिय कहानीकारों में से हैं  |हो सकता है ,ऐसा इसलिए .कि मैं इन्हें अभी तक डिकोड नहीं कर पायी होंगी |
27 -9-14
हिंदी में प्रोफेशनल एटमोस्फेयर ,मनोभावों के चित्रण वाली कहानिया नहीं है |ज्ञान संवेदना का विषय नहीं बना है ,बना भी है तो विडम्बना ,नोस्टेल्जिया के रूप में |


Friday, September 9, 2016

कहानीपन-13

पोस्ट जारी ..........
रही अश्लीलता की बात तो मैं इसे अश्लील नहीं मानती |एक इन्सान बिना मेकअप के ; पास ,अति पास से जैसा होता है ;सआदत ने उसे वैसा ही पेश किया है |साहित्य सम्बन्धी किसी भी निषेधों को उन्होंने अपने अनुभव की सच्चाई पर हावी नहीं होने दिया |इस कहानी को ही लो -ईश्वर सिंह का गिल्ट उस पर उस समय ही हावी होता होगा ,अन्यथा तो वह एक सामान्य इन्सान था |लेखक को इस वर्णन से दो शब्द क्लीयर करने थे |पत्ते फेंटना -रति क्रीडा ,पत्ते चलना -पेंटरेशन |हमारे समाज में सेक्स सम्बन्धी शब्दावली का इस्तेमाल खुले में करना वर्जित है |इसलिए लोगों ने अपने अपने लेवल के हिसाब से कूट भाषा बना ली है |लोगों तक उनकी कहानिया उनकी भाषा में पहुंचाना लेखक की सर्जनात्मक आवश्यकता है |
स्याह हाशिये -छोटे instances हैं |सचमुच सआदत का वक्त बहुत बुरा था |
post comments -सआदत का दौर वह था ,जब समूची मानवता का कोई एक हिस्सा मर गया था |जैसे किसी मौत के अवसर पर औरतें इकठ्ठी होती हैं ,तो किसी अत्यधिक गमजदा औरत को रोना नहीं आता ,तो बाकि औरतें अपने वचनों से उसे रुलाने का प्रयास करती है कि यह रो लेगी तो इसका दर्द भीतर जमेगा नहीं ,सदमा नहीं बैठेगा |मुझे लगता है सआदत का साहित्य उस कठिन दौर के दर्द को फूट बाहर निकालने का एक साहित्यिक प्रयास है |रिलीफ थेरेपी सोर्ट ऑफ़ |
बाकी जो इन्होने कहा की 'रोटी के लिए लिखता हूँ ' ,तो यह इनकी अति विनम्रता ही है |कुछ लोग , संतत्व की हद तक पहुंचे हुए ,इतने गहरे विनम्र हो जाते है कि उन्हें अपना दिया तो दिखता ही नहीं ,कुछ रोटी के टुकड़ों या कपड़ों की इतनी ग्लानि मानते हैं |
मेरे गुरु प्रवचनों में कहा करते कि जो तुम्हारी रोटी खाते हैं ,उसका कर्ज चुकता भी तो करना है |इन लोगों का कोई इलाज नहीं |
18-9-14
नीलम जैन की एक कहानी अभिव्यक्ति पर पढ़ी |अंतिम यात्रा | अमेरिका में एक बूढी अपनी अंतिम यात्रा में किसी ओल्ड एज होम में जा रही है |इस पर वह टेक्सी वाले के साथ पूरा शहर घूम रही है |घूम क्या रही है ,मानो दोबारा यादों में जी रही है |टेक्सी वाले के लिए भी जानी पहचानी निर्जीव गलियां एक नई  सजीव अर्थवत्ता से भर उठती हैं |
कहानी तो ठीक लगी पर ऐसी कहानिया एक वृहतर पाठक वर्ग में इस मीठी मुस्कान से स्वीकार की जाती है कि हाँ मैडम ठीक कह रहे हो |यह  मीठी मुस्कान इस बात का प्रूफ होती है कि मैडम को जिन्दगी की क्रूर सच्चाइयों का पता नहीं है |सचमुच एक दरिया-ए -अहसास है जो हमारे आस पास ही उबल रहा है |इससे दो-चार हुए बिना हम जान नहीं पायेंगे की जिंदगी क्या है ? सत्य क्या है ?
 दरिया-ए -अहसास या दरिया-ए -कामना ?

Thursday, September 8, 2016

कहानीपन -12

5 -9 -14
आज सआदत की कई कहानियां पढ़ी -

  1. टोबा टेक सिंह -लगता है साहित्य जगत में ये इसी कहानी से ज्यादा फेमस हैं |इंटरनेट पर सर्च की तो author of toba teksingh नाम से कई रिज़ल्ट निकले |ठीक थी |
  2. खोल दे -ठीक थी |बंटवारे की हैवानियत में लोगों पर सदियों का पागलपन तारी हो गया था |
  3. टिटमार का कुत्ता - भी वही ,जड़ पागलपन को दिखाती है |
  4. बू -कहानी अच्छी लगी |स्त्री-पुरुष के रिश्ते की नैसर्गिकता को पेश किया है |
ठंडा गोश्त -इस कहानी ने मुझे सबसे ज्यादा चौंकाया |बंटवारे की विभीषिका पर लिखने वाले ढेरों लोग हुए हैं पर यह सबकी अपनी अपनी तबियत की बात है कि वे उन अनुभवों में से क्या ढूंढ कर  लाते हैं | जब दिल के तार ही कुचल दिए गए हो तो संगीत कहाँ से फूटेगा और खाली पीढ़ियों की रक्षा के लिए कब तक कोई कलाकार अपने अनुभव सत्य से समझौता करके भावभीनी दुनिया रच सकता है |
भीष्म साहनी और सआदत के अनुभवों में कितना फर्क है |पागलपन और बर्बरता भीष्म ने भी देखी | फिर भी उनमे कुछ मानवीयता की रोशनी बची रही जो की वे हरनामसिंह (तमस में )जैसा किरदार रच पाए |यह भी उस दौर का एक सच था कि उस  भीषण आग में भी कुछ लोगों ने हिन्दू-मुस्लिम से ऊपर उठकर मानवीयता दिखाई होगी | मूल्यों की क्षीण रेखा भीष्म के यहाँ बची है |
पर सआदत के यहाँ मनुष्य गोश्त हो गया है |एक दुसरे को नोचते लोग जानवर दिखाई देते है (क्या  जानवर ऐसे होते हैं, यह भी एक वाजिब प्रश्न हो सकता है ?मगर क्या  करें |शब्दों की मज़बूरी है |और क्या कहें ? )   |इसमें स्त्री -पुरुषों के बीच शरीर संबंधों पर यह पागलपन भयावह लगता है |इस कहानी ने इसलिए मुझे चौंकाया |
ईश्वर सिंह ने 6 जने क़त्ल कर दिए थे फिर उस लड़की के मृत शरीर का ही उसे क्या अफ़सोस लगा ?
 पर नहीं  !!!!यही तो बात है इंसान की |
 उस लड़की को उसने मारना नहीं भोगना चाहा था ,पर वह खुद मर गयी या वह मरी हुई ही उठा लाया ,भावना की इतनी सी हलचल ने ईश्वर सिंह के समूचे व्यक्तित्व में ऐसी ठसता भर दी की वह न हैवान ही बना और न इन्सान ही बचा |कहीं बीच में ही ठंडा पड  गया |भावनाओं के उबाल में एक साथ 10 क़त्ल कर डालना आसान है पर एक लड़की की अनाम मौत झिंझोड़ देती है |ठंडा गोश्त ईश्वर सिंह के भीतर उठते हुए हैवान के ठंडेपन की कहानी है |
in between comment - आप कहोगे हैवान का  ठंडापन ? उसने 6 लोग मार डाले ,क्या अब भी उसके हैवान बनने में कोई कसर है ?
मैं कहूँगी -हाँ  | हैवान का  ठंडापन |
अगर हम इस कहानी को ध्यान से पढ़ें तो हमें दिखाई देगा की कहानीकार ने भी ईश्वर सिंह के प्रति अ -सहानुभूती नहीं दिखाई है |ईश्वर सिंह और उसकी बीवी एक साधारण सरदार दंपति हैं जो ,घर के बाहर हो रहे इतने बड़े बवाल में ,अपना हाथ साफ करने में कोई बुराई नहीं देखते |उसकी बीवी तो लूटे हुए गहने पाकर खुश होती है |उसे ईश्वर के किसी और लड़की के साथ मुह मारने में भी कोई ऐतराज नहीं |दोनों के बीच 'गुनहगारी की परस्पर इजाजत देने वाला '(थैंकयू मार्केज ) एक अनाम समझौता है |
ये स्वाभिमान ,अस्मिता ,शुचिता  के प्रश्न पढ़े -लिखों की सरदर्दिया हैं |आम लोग तो खाओ-पीयो-मौज मारो के सिद्धांत पे जीता है |
सआदत को इसलिए इस आदमी से अ-सहानुभूती नहीं ,क्योंकि वे जानते हैं कि ,अन्यथा यह आदमी कितना मासूम है ; क्योंकि वे स्वयं उनमे से एक हैं ,उन्होंने इस आदमी को करीब से ,बहुत करीब से देखा है ,जाना है |
वे जानते हैं कि ,अगर इस पर यह पागलपन तारी न होता तो ,लाश के साथ गन्दा काम करना तो दूर यह आदमी तो उसे छूने से भी डरता |यह तो वो आदमी है ,जो किसी को कन्धा देकर आये ,तो नहाता है |किसी अनजानी लाश को भी दूर से प्रणाम करके वाहे गुरु का नाम याद करता है |
मगर हाय !!!
हाय!!!हाय!!!!
क्या हो गया इसे !!!!
क्यों असफुद्दीन(काल्पनिक नाम ) ने मिलापे(काल्पनिक नाम )   की बेटी को मारा |मिलापा  क्यों अपने पिंड के दस लोगों को लेकर चढ़ आया |हाय !!हाय!!
क्यों सरदार जगजीत सिंह (किसी स्थानीय नेता का काल्पनिक नाम )ने ऐन वक्त पर कायरता दिखाई और आग बुझाने की बजाय ,भाग खड़े  हुए |हाय !!हाय!!
क्यों जिन्ना ने गाँधी जी की बात नहीं मानी ?
कहाँ तक सोचें?क्या क्या सोचें ?
दिमाग फेल हो गया जी |
बेचारी फूल जैसी लड़की कैसी उघाड़ी झाड़ियों में पड़ी पाई गयी |हाय ! उसका कैसा सलोना चेहरा था! कैसा गोरा रंग था ! कितने सुन्दर नैन-नक्श थे ! कैसा लम्बा कद था! बदन क्या गठीला था !कैसे चढ़े हुए ,गठीले उरोज थे !
सआदत का साहित्य अपने समय का करुण -करुणतम विलाप है |contd



Monday, September 5, 2016

कहानीपन -11

मार्केज पर आखिरी टिप्पणी मैंने यह लिखी -
तो इन कहानियों को पढना दिलचस्प तो था ,परन्तु किसी दृष्टि के अभाव में आखिर ये कहानियां एक गल रहे ,नग्न समाज को ही तो दिखाती है ,जिन्हें पढ़कर कोई उर्जा नहीं मिलती |
मार्केज सही कहते हैं आलोचकों को इग्नोर करना चाहिए ,इन्हें संतुष्ट करना असंभव है |चाहे मैं ही क्यों न हूँ |
हा!हा!हा!
यूँ ही नोबल नहीं मिला !!!!
4-9-14
सआदत का साहित्य डाउनलोड किया |मैं क्यूँ लिखता हूँ पर बोले कि रोटी के लिए लिखता हूँ |घरेलु औरतें इंस्पायर नहीं करती पर तवायफों की बेचैनियाँ बेचैन  करती हैं |मैं कहानीकार नहीं जेबकतरा हूँ |
साफगोई अच्छी है |वस्तुतः अपने आप से यही सच्चाई आदमी को आगे बढाती है |



Sunday, September 4, 2016

मार्केज-8

' एलिवेटर से उतरते  सत्रह शव ' तो पूरी वर्णनात्मक है |एक बूढी ईसाई औरत अपने बूढ़े  के मरने पर कोई मन्नत पूरी करने ,पहली बार अपने घर से अकेली निकली है|उसकी समुद्री यात्रा ,होटलों रेस्टोरेंटों के वर्णन ,सड़कों के वर्णन हैं |इस किरदार को बयां करने में लेखक की दिलचस्पी शायद यह रही होगी कि वे पाठकों को याद दिलाएं की ऐसी धर्म भीरु औरतें भी होती हैं |
अपने यहाँ की किसी पुरानी पंडाइन या शर्माजी सोर्ट ऑफ कोई वर्णन समझ लीजिये |ऐसे कई लोगों की कहानी का भी पाठक वर्ग होता है |इस तरह के किरदार नोस्टेल्जिया बड़ी कुशलता से  क्रिएट करते है |
 'संत ' का नायक अपनी आस्था को जी रहा है |ईसाईयों में संत की पदवी देना ,एक सांस्थानिक परिपाटी है |इस कहानी के नायक की बेटी का शव अर्सा बाद भी सडा नहीं |तो उसे उसके चमत्कार पर यकीं हुआ ,और वह उसे संत की पदवी दिलाने रोम ले आया |
यह कहानी उसके अंतहीन  प्रयास और प्रतीक्षा को दिखाती है |
देखा जाए कहानी में कुछ भी नहीं |मजा कैसे आएगा ?पर ऐसी कहानी में भी ,कुछ युवा विद्यार्थियों के क्रियाकलापों और हरकतों को जोड़कर लेखक  ने इस कहानी को fultush मसाला कहानी बना दिया है ,बिना साहित्यिकता से समझौता किये |
' सोई सुंदरी की हवाई उड़ान ' imperial blue whisky की ad  - men will be men का कहानी संस्करण समझिये |एक गुदगुदाती हुई मीठी 'हार्मलेस 'कहानी |इसमें जापानी मिथक कथा का उपयोग मुझे कहानी के अनुभव को रिच बनाने की दृष्टि से बहुत पसंद आया |
' प्रकाश पानी समान है ' में बच्चों के नज़रिये से जीवन में '  झाँका ' गया है |
 'मैं सपने बेचती हूँ 'की स्त्री को अहसास हुआ कि उसके पास कुछ पराशक्ति है .तो उसने इसी को अपना बिजनेस बना लिया | वे कोई नौसिखिये लेखक होते हैं ,जो मृत्यु को एक शॉकिंग डिवाइस की तरह इस्तेमाल करते हैं |वे पहले किरदार की मज़बूरी दिखाएँगे ,फिर धीरे धीरे उसके समझौते गिनाएँगे ,उन समझौतों में रपटती बेचारे किरदार की ज़िन्दगी का अवसादपूर्ण अंत मृत्यु !!!!!
मार्केज़ पहले पैरा में ही बता देते हैं कि यह फलां इस प्रकार मरा |पर उसने जीवन क्या जीया ? इस बात को वे खोल खोल के ,रस ले ले कर बताते हैं ,कि पाठक को इत्मिनान रहता है कि मरी तो मरी ,अपनी जिंदगी तो जी गयी |
मार्केज की कला का जादू -लोगों को जानने और समझने की उनकी अदम्य जिज्ञासा में है |
जादू की बात कही थी |वह भी बता दूँ |
 इनकी कहानी है -' बर्फ में  जमी तुम्हारे लहू की लकीर ' ,जिसके नाम पर इस संग्रह का नाम है |इस कहानी में वर्णन चल रहा है कि किस तरह नायक -नायिका मिले ,उनमे प्यार हुआ , उन्होंने प्यार को एक्सप्लोर किया और दो महीने की गर्भवती नायिका शादी के बाद फर्स्ट नाइट  व्यतीत करने मेड्रिड से  पेरिस जा रहे हैं ,कार से |उनके घरवालों ने होटल बुक करा रखा है |दोनों उस देश के शाही खानदानों के बच्चे है |
नायिका के हाथ की उंगली में काँटा चुभ गया और किसी ऐसी नस में चुभा की वह सफ़र उसका अंतिम सफ़र साबित हुआ |उसे बराबर होश है अपने जख्म का |महंगी गाड़ी ,पीछे की सीट पर पड़े महंगे उपहार ,उसका  महंगा ओवरकोट | पर हाइवे पर रात के समय ,चिकित्सा कहाँ मिलेगी ?
और ऐसे ही समय ,जब वे दो जन ,किसी डाक्टर को भी देख रहे है ,उन्हें यह भी ख्याल है की पेरिस पहुंच जाएँ ,रात का समय है ,बर्फ पडनी शुरू हो गयी है -
"फिर वो ,हाल के पिछले  दिनों की बाबत ,काफी देर से आह्वान करते आ रहे स्वप्नों में जा डूबी ,और ,किसी ऐसे दुस्वप्निल प्रभाव से चौंककर उठी मानो कार पानी में चल रही हो ,तब यद्यपि खूब विलम्ब से ,याद आया उंगली पर रुमाल बंधा है |उसने डैशबोर्ड के बीच लगी प्रदीप्त घडी में देखा वक्त तीन से ऊपर है ,अन्दाजिया गणना कर समझ पाई कि वे बोर्ड्यु ही नहीं एन्गाऊलिमे और पोइतिएर्स भी पार कर लोआयर के जल प्लावित बाँध की बाजू में चल रहे हैं |धुंध में से छनी चांदनी बिखरी हुई थी और चीड की असंख्य पत्तियों के बीच से दुर्गों,किलों,गढ़ियों की स्याह छायाकृतियों दिखाई दे रही थी मानो परीकथाओं में से निकल कर सामने आ गयी हों |इलाके से भली भांति परिचित नेना -दाकोंते ने अनुमान लगाया वे पेरिस से कोई तीन घंटे ही दूर होंगे ....
इस वर्णन में जादू कहाँ है ?
चांदनी और चीड की पत्तियों में?
पर वे तो होती हैं |ये तो रियल है |
फिर ?
जादू है .इन अलग -अलग प्रकार की वास्तविकताओं को ब्लेंड करने में ,उन्हें मिलाने में |
वास्तविकता को फैला कर उसे और अधिक सघन और रिच बनाने में |