Friday, September 9, 2016

कहानीपन-13

पोस्ट जारी ..........
रही अश्लीलता की बात तो मैं इसे अश्लील नहीं मानती |एक इन्सान बिना मेकअप के ; पास ,अति पास से जैसा होता है ;सआदत ने उसे वैसा ही पेश किया है |साहित्य सम्बन्धी किसी भी निषेधों को उन्होंने अपने अनुभव की सच्चाई पर हावी नहीं होने दिया |इस कहानी को ही लो -ईश्वर सिंह का गिल्ट उस पर उस समय ही हावी होता होगा ,अन्यथा तो वह एक सामान्य इन्सान था |लेखक को इस वर्णन से दो शब्द क्लीयर करने थे |पत्ते फेंटना -रति क्रीडा ,पत्ते चलना -पेंटरेशन |हमारे समाज में सेक्स सम्बन्धी शब्दावली का इस्तेमाल खुले में करना वर्जित है |इसलिए लोगों ने अपने अपने लेवल के हिसाब से कूट भाषा बना ली है |लोगों तक उनकी कहानिया उनकी भाषा में पहुंचाना लेखक की सर्जनात्मक आवश्यकता है |
स्याह हाशिये -छोटे instances हैं |सचमुच सआदत का वक्त बहुत बुरा था |
post comments -सआदत का दौर वह था ,जब समूची मानवता का कोई एक हिस्सा मर गया था |जैसे किसी मौत के अवसर पर औरतें इकठ्ठी होती हैं ,तो किसी अत्यधिक गमजदा औरत को रोना नहीं आता ,तो बाकि औरतें अपने वचनों से उसे रुलाने का प्रयास करती है कि यह रो लेगी तो इसका दर्द भीतर जमेगा नहीं ,सदमा नहीं बैठेगा |मुझे लगता है सआदत का साहित्य उस कठिन दौर के दर्द को फूट बाहर निकालने का एक साहित्यिक प्रयास है |रिलीफ थेरेपी सोर्ट ऑफ़ |
बाकी जो इन्होने कहा की 'रोटी के लिए लिखता हूँ ' ,तो यह इनकी अति विनम्रता ही है |कुछ लोग , संतत्व की हद तक पहुंचे हुए ,इतने गहरे विनम्र हो जाते है कि उन्हें अपना दिया तो दिखता ही नहीं ,कुछ रोटी के टुकड़ों या कपड़ों की इतनी ग्लानि मानते हैं |
मेरे गुरु प्रवचनों में कहा करते कि जो तुम्हारी रोटी खाते हैं ,उसका कर्ज चुकता भी तो करना है |इन लोगों का कोई इलाज नहीं |
18-9-14
नीलम जैन की एक कहानी अभिव्यक्ति पर पढ़ी |अंतिम यात्रा | अमेरिका में एक बूढी अपनी अंतिम यात्रा में किसी ओल्ड एज होम में जा रही है |इस पर वह टेक्सी वाले के साथ पूरा शहर घूम रही है |घूम क्या रही है ,मानो दोबारा यादों में जी रही है |टेक्सी वाले के लिए भी जानी पहचानी निर्जीव गलियां एक नई  सजीव अर्थवत्ता से भर उठती हैं |
कहानी तो ठीक लगी पर ऐसी कहानिया एक वृहतर पाठक वर्ग में इस मीठी मुस्कान से स्वीकार की जाती है कि हाँ मैडम ठीक कह रहे हो |यह  मीठी मुस्कान इस बात का प्रूफ होती है कि मैडम को जिन्दगी की क्रूर सच्चाइयों का पता नहीं है |सचमुच एक दरिया-ए -अहसास है जो हमारे आस पास ही उबल रहा है |इससे दो-चार हुए बिना हम जान नहीं पायेंगे की जिंदगी क्या है ? सत्य क्या है ?
 दरिया-ए -अहसास या दरिया-ए -कामना ?

No comments:

Post a Comment