Saturday, September 3, 2016

मार्केज -7

'मैं तो बस फोन करने आयी 'की मारिया की  बदनसीबी देखिये | किसी शाम अपने घर से दूर निकली  यह औरत गलती से पागलों को ले जाने वाली गाड़ी से लिफ्ट ले लेती है और 'गलती' से (जो की वहां की व्यवस्था की यांत्रिकता की भयावहता का एक पक्ष दिखता है )पागल ही समझ कर भर्ती कर ली  जाती है |
उसे एक फोन करना था बस ,अपने हसबैंड को बताने के लिए ,पर वह फोन कर नहीं पाती |
उधर दिन बीतते -बीतते पति का  उसके किसी और के साथ भाग जाने का शक गहरा होता जाता है ,क्योंकि मारिया पहले भी दो पति छोड़ चुकी है |
और इस तरह ,मारिया जब फाइनली फोन करने में कामयाब हो भी जाती है ,तब प्रत्युत्तर में किसी की परवाह से भरे प्यार बरसाते शब्द सुनने के बजाय उसे घृणा से भरे रंडी शब्द सुनने को मिलते हैं ;तब उस पर क्या बीती होगी ,पाठक ज़रा कल्पना करें |
पर जीवटता  इन लोगों में पक्की है |मारिया ने जब देखा की उसका मुर्ख पति भी उसे पागल ही समझ रहा है ,तो उसने उसे भी भूलने में देर नहीं लगाईं |जेल का माल खाकर उसने तो अपना वज़न बढाया और मस्त हो गयी |  
इस कहानी को पढ़ते हुए मैं सोच रही थी कि मरिया जैसी पात्र की कल्पना इंडिया में किस प्रकार संभव है |ये लोग ऐसे पात्र और ऐसी स्थितियों की रचना कर सकते हैं ,क्योंकि इनके पारिवारिक -सामाजिक ढांचे ख़त्म हो चुके हैं |पर ये कहानियां वैयक्तिक साहस को जरुर सेलिब्रेट करती  नज़र आती हैं |
मारिया दोस प्राजेरेज़ ' की मारिया एक वेश्या है |बड़ी छोटी उम्र में वह इस काम में डाल दी  गयी |उसने अपना सारा जीवन लगभग ऐसे ही बिताया |इस बीच उसे एक अराजकतावादी से प्रेम हुआ होगा ,जिसका अस्पष्ट इशारा कहानी में है |ऐसे ब्योरों को मार्केज कुछ वाक्यों में ही निपटा देते हैं ,क्योंकि पाठकों को मुख्य किरदार के बारे में कौन ?कहाँ?कैसे? जानने की दिलचस्पी  तो होती ही है |
मार्केज की असल दिलचस्पी किरदार के आज के ,वास्तविक जीवन को देखने में है (कहानीपन )
मारिया अपने आज के जीवन से लगभग संतुष्ट ही है |उसके एक ग्राहक ने उसे सलाह दी कि वह पैसे जोड़कर अपना घर बनाये ,ताकि बुढ़ापे में उसे किसी की मोहताजी न उठानी पड़े |मारिया ने अपना घर बनाया ,अच्छे से सजाया |एक कुत्ता है उसके पास ,नुई |
एक बार उसे ख्याल आया कि मेरी मौत के बाद लोगों को पता कैसे चलेगा ?तो इसके लिए उसने नुई को ट्रेन किया कि वह लोगों को बुला लाये ;उसकी कब्र पर हर इतवार जाकर रोये ,अपनी कब्र की वसीयत बनाई |यह कहानी इन्ही क्रियाकलापों में पूरी होती है ;पर साथ ही साथ मानवीय संवेदना के बारीक़ रेशों को पाठकों की स्मृति  में छोडती हुई कि देखों लोग कैसा जीवन जीते है  |और उनकी कैसी -कैसी इच्छाएँ हुआ करती है |
इस कहानी के कई हिस्से मुझे पसंद आये |
एक तो मुख्य किरदार ही काफी हंसमुख ,जहीन और उर्जावान है |
दूसरे वह हिस्सा ,जहाँ काउंट उसके यहाँ रोज़ शाम को आता है |वह सोफे पे बैठकर गाना सुनता है |वह उसके लिए खाना बनाती है |न्यूज़ सुनते है एटसेट्रा -खासा शांत ,प्रमोद्पूर्ण वर्णन है |
मार्केज जानते हैं -जीवन कहाँ है ?
जीवन है -बढ़िया खाने में ,घुमने में ,मित्रों की गपबाजी में ,उत्तेजनापूर्ण बहसों में ,उम्दा प्राकृतिक दृश्यों में ,रहस्य में ,रोमांच में ,अद्भुत में |आप फेसबुक देखिये | लोग किस प्रकार का जीवन शेयर करते हैं |इसी को वे अपनी कहानियों में रिक्रिएट करते है |
अगर कोई मुझसे मार्केज की कला के बारे में पूछे तो मैं कहूँगी कि वे शानदार ,एंटिक ,अद्भुत ,जीवंत 'जीवनानुभवों 'से भरी दुकान के मालिक हैं जो ग्राहक की फरमाइश पर तुरंत एक बढ़िया ,आनंददायक ,मजेदार  मिक्सचर पेश करने में माहिर कलाकार हैं |       

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