Monday, September 5, 2016

कहानीपन -11

मार्केज पर आखिरी टिप्पणी मैंने यह लिखी -
तो इन कहानियों को पढना दिलचस्प तो था ,परन्तु किसी दृष्टि के अभाव में आखिर ये कहानियां एक गल रहे ,नग्न समाज को ही तो दिखाती है ,जिन्हें पढ़कर कोई उर्जा नहीं मिलती |
मार्केज सही कहते हैं आलोचकों को इग्नोर करना चाहिए ,इन्हें संतुष्ट करना असंभव है |चाहे मैं ही क्यों न हूँ |
हा!हा!हा!
यूँ ही नोबल नहीं मिला !!!!
4-9-14
सआदत का साहित्य डाउनलोड किया |मैं क्यूँ लिखता हूँ पर बोले कि रोटी के लिए लिखता हूँ |घरेलु औरतें इंस्पायर नहीं करती पर तवायफों की बेचैनियाँ बेचैन  करती हैं |मैं कहानीकार नहीं जेबकतरा हूँ |
साफगोई अच्छी है |वस्तुतः अपने आप से यही सच्चाई आदमी को आगे बढाती है |



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