कहने से पहले ,कहने का हक़ ,अर्जित करना चाहिए। next post -next month
Tuesday, July 19, 2016
Monday, July 18, 2016
कहानीपन -7
8-8-14
आज गोरा ख़त्म कर लिया |गोरा का जैसा चरित्र शुरू किया था ,वैसा अंत नहीं किया |उसके क्रिस्तान होने के रहस्य को ही एकमात्र विस्फोटक कारण बताकर उसके पूर्व अर्जित व्यक्तित्व को इस प्रकार उडा देना 'अकुशल ' लगा |
अच्छे उपन्यास के तत्व -दोस और रवीन्द्रनाथ के दोनों नावेल्स को कम्पेयर करके ये बातें निकाली |
राजर्षि शुरू किया था |अच्छा चल रहा है |बालकों के साथ राजा की क्रीडा के दृश्य अतिरंजित से हैं पर उस समय के (और वह भी भावुक हृदय बंगालियों के लिए ) पाठकों की मनोवृत्ति के अनुकूल हैं |
आज गोरा ख़त्म कर लिया |गोरा का जैसा चरित्र शुरू किया था ,वैसा अंत नहीं किया |उसके क्रिस्तान होने के रहस्य को ही एकमात्र विस्फोटक कारण बताकर उसके पूर्व अर्जित व्यक्तित्व को इस प्रकार उडा देना 'अकुशल ' लगा |
अच्छे उपन्यास के तत्व -दोस और रवीन्द्रनाथ के दोनों नावेल्स को कम्पेयर करके ये बातें निकाली |
- मुख्य पात्र अक्सर बौद्धिक ही रखते है | |एक गौण पात्र साथ में लगा देते हैं |पर गोरा में विनय का पात्र ऐसा गौण भी नहीं है |
- नायिका का अतीव कोमल और अक्सर नायक के समकक्ष होना -सुन्दरता ,कोमलता,बुद्धि की तीक्षणता ,धैर्य ,तनुता ,पैने नक्श (अर्थात जिस समय सौन्दर्य के जैसे मानक स्थापित होते हैं ,उनमे से चुन चुन कर गुणों को नायक-नायिका में आरोपित करना )
- एक ओर सुचरिता हिंदुत्व में ढली जा रही है ,दूसरी और गोरा खुद ब्रह्म बनने चल पड़ा है|
- आनंदमयी का चरित्र ठीक था |
- हरिमोहिनी के चरित्र के उतार चढाव अधिक विश्वसनीय थे |
- कैलाश का इमारत का निरीक्षण elizabeth का darsy के country side villa के निरीक्षण जैसा लगा |
- रवीन्द्र का पक्ष समझ नहीं आया |गोरा के चरित्र में हिंदुत्व की ऐसी गौरवमयी वीर्यवान छवि प्रतिष्ठित करके फिर उसी ढुलमुलपन की और झुक पड़ना ;क्या है ? (अगर धर्म के स्वयंसेवक इस तरह नारी के मोह में विचलित होकर फिसलते गए तो धर्म रक्षक सेना का क्या होगा ? )
- प्रकृति का पक्ष इनका बहुत स्ट्रोंग है |लगता है वर्षा ऋतु कवि की प्रिय ऋतु है |राजर्षि की शुरुआत भी वहीँ से की है |
राजर्षि शुरू किया था |अच्छा चल रहा है |बालकों के साथ राजा की क्रीडा के दृश्य अतिरंजित से हैं पर उस समय के (और वह भी भावुक हृदय बंगालियों के लिए ) पाठकों की मनोवृत्ति के अनुकूल हैं |
- रस जगाने में कवि की प्रतिभा कुछ ज्यादा ही निखरती है |
- प्रकृति निरीक्षण तथा उससे भी अधिक प्रकृति से उत्पन्न अन्तःप्रेरणा के दृश्य अद्भुत हैं |
- प्रेमचंद को कठोर कहा जाता है |पात्रों को मनचाही दिशा में घुमाने में रवीन्द्र भी कम नहीं |
- त्रिपुरा के राजा का इस तरह बिलकुल ही impractical दिखाना सही नहीं लगा |
- भाषा तत्सम ,गंभीर ,शिष्ट हास्य परिनिष्ठित है |शिक्षित बंगाली रूचि के अनुकूल |
- रसोत्पादक क्षमता अच्छी है |
- हिंदुत्व का प्रश्न, लगता है ,इनके लेखन का केन्द्रीय विषय है |
Sunday, July 17, 2016
कहानीपन -6
25-3-14
सविता पाठक की हिस्टीरिया ठीक थी |
फलाना -ढिमकाना की आलू -चालू bull shit .
ढिमकाना फलाना की चालू आलू bull shit .
............ bull shit .
इसके बाद ऐसा हुआ की मैंने कम ज्ञात या अज्ञात लेखकों की कहानियों पर हाथ लगाना ही छोड़ दिया |पता नहीं क्या बबाल निकल आएगा |इसके बाद अधिकतर मैं रेफरेन्स के आधार पर ही पढने लगी |जैसे फेसबुक पर किसी लेखक की प्रशंसा देखी या कुछ इसी तरह |
२-५-१४
मार्केज की कहानी mamma's funeral पढ़ी |अच्छी लगी |ये तरीका है सही कहानियां कहने का |जीवन के भीतर की गन्दगी को ऐसे छांट कर रख देते हैं |
इनकी गाँव वाली (अफवाह ) कहानी सो सो थी |
(मार्केज पर कई टिपण्णी आगे भी हैं |चलो इन्हें आगे ही देखेंगे )
२-७-१४
मुक्तिबोध की तीन कहानियां पढ़ी -काठ का सपना ,जंक्शन और क्लाड इथरली |ठीक ही थीं |जो कविताओं में लिखते हैं ,वही कहानियों में घड दिया है |आदर्शवादी आत्मा की बेचैनी |दार्शनिक चिंताओं की लेखकीय परिणिति |मजा नी आया |
१४-७- १४
इस्मत चुगताई की कई कहानियां पढ़ी |लिहाफ ,अंग्रेजों भारत छोडो ,जड़ें ,चौथी का जोड़ा |आजादी के आसपास मुस्लिम समाज की दास्तानें कहने के ढंग में आत्मीयता है | कहानियों में सब कुछ है | मार्मिकता ,हंसी-चुहल ,व्यंग्य ,तठस्थता ,घटनाओं की डिटेलिंग |
२७-७ १४
रबीन्द्रनाथ टैगोर का गोरा पढना शुरू किया है | ७ भाग पढ़ लिए है |२ भाग तक तो खूब इम्प्रेस हुई थी ,पर तीसरे तक आते आते इसका plot कुछ कुछ jane austen के pride and prejudice से मिलता जुलता सा लगा |खैर
भारतीयता पर विचार गहन तो बहुत है ,पर देखो | आगे क्या ?
चरित्रांकन की समझ अच्छी है |एक दम ऐसी कि बिलकुल तीर भेदी नज़र की तरह सारी असलियत खोल कर रख देती है |बरसात ,बरसाती आकाश ,बुँदे ,उस मौसम का गीलापन अच्छा व्यंजित किया है |
सविता पाठक की हिस्टीरिया ठीक थी |
फलाना -ढिमकाना की आलू -चालू bull shit .
ढिमकाना फलाना की चालू आलू bull shit .
............ bull shit .
इसके बाद ऐसा हुआ की मैंने कम ज्ञात या अज्ञात लेखकों की कहानियों पर हाथ लगाना ही छोड़ दिया |पता नहीं क्या बबाल निकल आएगा |इसके बाद अधिकतर मैं रेफरेन्स के आधार पर ही पढने लगी |जैसे फेसबुक पर किसी लेखक की प्रशंसा देखी या कुछ इसी तरह |
२-५-१४
मार्केज की कहानी mamma's funeral पढ़ी |अच्छी लगी |ये तरीका है सही कहानियां कहने का |जीवन के भीतर की गन्दगी को ऐसे छांट कर रख देते हैं |
इनकी गाँव वाली (अफवाह ) कहानी सो सो थी |
(मार्केज पर कई टिपण्णी आगे भी हैं |चलो इन्हें आगे ही देखेंगे )
२-७-१४
मुक्तिबोध की तीन कहानियां पढ़ी -काठ का सपना ,जंक्शन और क्लाड इथरली |ठीक ही थीं |जो कविताओं में लिखते हैं ,वही कहानियों में घड दिया है |आदर्शवादी आत्मा की बेचैनी |दार्शनिक चिंताओं की लेखकीय परिणिति |मजा नी आया |
१४-७- १४
इस्मत चुगताई की कई कहानियां पढ़ी |लिहाफ ,अंग्रेजों भारत छोडो ,जड़ें ,चौथी का जोड़ा |आजादी के आसपास मुस्लिम समाज की दास्तानें कहने के ढंग में आत्मीयता है | कहानियों में सब कुछ है | मार्मिकता ,हंसी-चुहल ,व्यंग्य ,तठस्थता ,घटनाओं की डिटेलिंग |
२७-७ १४
रबीन्द्रनाथ टैगोर का गोरा पढना शुरू किया है | ७ भाग पढ़ लिए है |२ भाग तक तो खूब इम्प्रेस हुई थी ,पर तीसरे तक आते आते इसका plot कुछ कुछ jane austen के pride and prejudice से मिलता जुलता सा लगा |खैर
भारतीयता पर विचार गहन तो बहुत है ,पर देखो | आगे क्या ?
चरित्रांकन की समझ अच्छी है |एक दम ऐसी कि बिलकुल तीर भेदी नज़र की तरह सारी असलियत खोल कर रख देती है |बरसात ,बरसाती आकाश ,बुँदे ,उस मौसम का गीलापन अच्छा व्यंजित किया है |
Saturday, July 16, 2016
कहानीपन -5
१८-3-१४
उदय प्रकाश की कहानी 'अनावरण ' पढ़ी | ठीक थी |कहानी में यथार्थ स्थितिओं के कहने के ढंग में वर्णनात्मकता नहीं है ,इसलिए बड़े स्वाभाविक से लगते हैं |पाठकों के स्तर को लेकर आश्वस्त से हैं |कहानी पढ़ती गयी |पर कुछ चौंकाने वाला सामने आ ही नहीं रहा था |एकदम सूचनात्मक ढंग से चल रही थी |कि ,पर ,उनके बीच ही यह उजागर हुआ कि अनावरण उस व्यवस्था और सिस्टम का है जो आदर्शों के खोखलेपन को ढो रही है | अच्छी थी |एंड को तार्किक ढंग से संभाल नहीं पाए |
(इनकी दो टिपण्णी और हैं ,इकठ्ठा ही लिख देती हूँ )
२५-3-१४
उदय प्रकाश की कहानी 'अरेबा -परेबा ' पढ़ी | ठीक थी | पर सपाट कथनात्मक ढंग से बच्चे की मासूमियत को खींचा सा गया है |९-१० साल के लड़के इतने मासूम भी नहीं होते |घटनात्मक क्रम जबरदस्ती की उत्सुकता पैदा करने के लिए रचा गया है |अंत वही फिलोस्फिकल |पवित्र , मासूम के लुप्त होने का संताप |
१६-4-१४
उदय प्रकाश की कहानी 'जज साब ' पढ़ी | ठीक थी | बल्कि अच्छी लगी |बिलकुल आज के परिवेश को कहानी में रूपायित करती यथार्थवादी कहानी |जिंदगी की लत पर है |वह जो है कि लोग आदी हो जाते हैं एक जैसी जिंदगी ,आदतों ,कपड़ों और भाषा के |कहानी में सच्चाई है ....|लगभग किसी भी तरह का भाव उत्पादन नहीं करती .....पर अपनी सच्चाई से ;अंत में ; शायद उसांस जैसा कुछ निकले |पठाक सहमत हो कि हाँ ऐसा ही होता है ,यही इस कहानी की उपलब्धि है |
परिवेश की वर्णनात्मकता में मेक्डोनाल्ड ,बीकानेरवाला ,ट्वेंटी -ट्वेंटी जैसी बातचीत डालकर यथार्थ को ज्यों का त्यों रखा है |बिना किसी अतिरिक्त दवाब के |कोई व्यंग्य नहीं ,विरोध नहीं ,'साहित्यिक ' औजारों के शून्य पर फिर भी अत्यंत प्रभावी |
हिंदी पर भी चुटकियाँ ली हैं |लेखन होने की दुविधा को शेयर किया है |पर आम पाठक के लिए यह सुविधाजनक नहीं होता |
कुमार अनुपम की कविता 'बातूनी लोग ' का कहानी संस्करण लगता है |
पर शीर्षक 'जज साब ' क्यों रखा | ज़िन्दगी की लत होना चाहिए था |
पर इस तरह के जीने को लत क्यों कह रहे है | जीना तो जीना है |may be passionlessness के लिए कहा होगा |
उदय प्रकाश की कहानी 'अनावरण ' पढ़ी | ठीक थी |कहानी में यथार्थ स्थितिओं के कहने के ढंग में वर्णनात्मकता नहीं है ,इसलिए बड़े स्वाभाविक से लगते हैं |पाठकों के स्तर को लेकर आश्वस्त से हैं |कहानी पढ़ती गयी |पर कुछ चौंकाने वाला सामने आ ही नहीं रहा था |एकदम सूचनात्मक ढंग से चल रही थी |कि ,पर ,उनके बीच ही यह उजागर हुआ कि अनावरण उस व्यवस्था और सिस्टम का है जो आदर्शों के खोखलेपन को ढो रही है | अच्छी थी |एंड को तार्किक ढंग से संभाल नहीं पाए |
(इनकी दो टिपण्णी और हैं ,इकठ्ठा ही लिख देती हूँ )
२५-3-१४
उदय प्रकाश की कहानी 'अरेबा -परेबा ' पढ़ी | ठीक थी | पर सपाट कथनात्मक ढंग से बच्चे की मासूमियत को खींचा सा गया है |९-१० साल के लड़के इतने मासूम भी नहीं होते |घटनात्मक क्रम जबरदस्ती की उत्सुकता पैदा करने के लिए रचा गया है |अंत वही फिलोस्फिकल |पवित्र , मासूम के लुप्त होने का संताप |
१६-4-१४
उदय प्रकाश की कहानी 'जज साब ' पढ़ी | ठीक थी | बल्कि अच्छी लगी |बिलकुल आज के परिवेश को कहानी में रूपायित करती यथार्थवादी कहानी |जिंदगी की लत पर है |वह जो है कि लोग आदी हो जाते हैं एक जैसी जिंदगी ,आदतों ,कपड़ों और भाषा के |कहानी में सच्चाई है ....|लगभग किसी भी तरह का भाव उत्पादन नहीं करती .....पर अपनी सच्चाई से ;अंत में ; शायद उसांस जैसा कुछ निकले |पठाक सहमत हो कि हाँ ऐसा ही होता है ,यही इस कहानी की उपलब्धि है |
परिवेश की वर्णनात्मकता में मेक्डोनाल्ड ,बीकानेरवाला ,ट्वेंटी -ट्वेंटी जैसी बातचीत डालकर यथार्थ को ज्यों का त्यों रखा है |बिना किसी अतिरिक्त दवाब के |कोई व्यंग्य नहीं ,विरोध नहीं ,'साहित्यिक ' औजारों के शून्य पर फिर भी अत्यंत प्रभावी |
हिंदी पर भी चुटकियाँ ली हैं |लेखन होने की दुविधा को शेयर किया है |पर आम पाठक के लिए यह सुविधाजनक नहीं होता |
कुमार अनुपम की कविता 'बातूनी लोग ' का कहानी संस्करण लगता है |
पर शीर्षक 'जज साब ' क्यों रखा | ज़िन्दगी की लत होना चाहिए था |
पर इस तरह के जीने को लत क्यों कह रहे है | जीना तो जीना है |may be passionlessness के लिए कहा होगा |
पॉज़ -3
रेफरेंस वाली बात भी अच्छी निकल आई |यह बात तो है की रोज लिखने का अभ्यास बनाया जाए तो कई बार अनजाने में ही अच्छे पॉइंट्स निकल आते हैं |
कई लोगों के लिए उनकी भाषा ,एक जैसा रहन -सहन ,माहौल उनके रेफरेंस होते हैं | दे फील कम्फर्टेबल |
खैर ..
इस रेफरेंस के कारण मुझे खुद पर इतना भरोसा होता है कि मैं तो किसी से भी जीत लूंगी |कोई भी मेरे सामने क्या टिकेगा ? रजिया गुन्डों में नहीं फंसी बल्कि गुंडे ये सोचेंगे कि ये किस रजिया के सामने फंस गए |जो भी है |अपनी एक आदत की बात मैंने यहाँ शेयर करी |
शायद आगे की बातचीत में प्रसंगों के सन्दर्भ में यह ज्यादा क्लीअर होगी |
अब आगे बढ़ते हैं |
कई लोगों के लिए उनकी भाषा ,एक जैसा रहन -सहन ,माहौल उनके रेफरेंस होते हैं | दे फील कम्फर्टेबल |
खैर ..
इस रेफरेंस के कारण मुझे खुद पर इतना भरोसा होता है कि मैं तो किसी से भी जीत लूंगी |कोई भी मेरे सामने क्या टिकेगा ? रजिया गुन्डों में नहीं फंसी बल्कि गुंडे ये सोचेंगे कि ये किस रजिया के सामने फंस गए |जो भी है |अपनी एक आदत की बात मैंने यहाँ शेयर करी |
शायद आगे की बातचीत में प्रसंगों के सन्दर्भ में यह ज्यादा क्लीअर होगी |
अब आगे बढ़ते हैं |
Friday, July 15, 2016
पॉज़ -२
जैन शास्त्रों के विषय ,आजकल की साइंस की भांति ,टेक्नीकल ज्यादा हैं | जैसे बाहर की दुनिया (पाठक गौर करें इस शब्दावली पर ) में धर्म के खिलाफ जो आवाजें सुनाई देती हैं ,उनमे प्रमुख रूप से यह बात होती है की औरतों के दमन ,जाति व्यवस्था आदि को सुदृढ़ करने में धार्मिक शास्त्रों की बहुत भूमिका है | किन्ही विशेष धार्मिक प्रतीकों के पीछे लोगों का उन्माद और पागलपन कोई इग्नोर करने वाली बातें तो नहीं हैं |ये बातें सच ही होंगी |
जैनी तो ,हाल-फ़िलहाल तक ,इन बीमारीओं से(थैंक गॉड )बचे हुए हैं |यहाँ तो हमने किसी गुरु के मुख से स्त्री विरोधी या दलित विरोधी बातें नहीं सुनी |हाँ अनुशासित करने की भाषा अवश्य सुनी है |खैर
लेकिन सम्प्रदायवाद इनमे भी कम नहीं ,पर ये बेचारे आपस में उलझ कर ही अपनी गर्मी का शमन कर लेते हैं |
जैन शास्त्रों के विषय ,मुख्यत ;,चार अनुयोगों में विभाजित है |चरणानुयोग ,करणानुयोग ,कथानुयोग और गणितानुयोग |ये समझ लीजिये कि सारी हिस्ट्री ,जिओग्राफी ,बॉटनी ,फिजिक्स ,साहित्य ,कला ,भाषा विज्ञान इनमे समाया है |
इसलिए इन शास्त्रों का अध्ययन मेरे लिए वैसा ही है ,जैसे मैं अन्य लेखकों की किताबें पढ़ती हूँ | शास्त्र भी किताबें ही तो हैं |
बस एक फर्क है |कि इनमे लिखी बातों की मुझे श्रद्धा है | ऐसा नहीं कि मुझे हर बात पढ़ते ही समझ में आ जाती है या मुझे कोई बात गलत नहीं लगती पर जैन शास्त्रों में लिखी बातों को मैं काटती नहीं हूँ |मैं यही समझती हूँ कि हो सकता है मुझे अभी समझ नहीं आ रही हो |सोचती रहती हूँ ,गुनती रहती हूँ |कभी मौका लगता है तो किसी गुरु के यहाँ शंका निवारण कर लेती हूँ |
इनके अध्ययन से ही चीजों को ग्रहण करने का मेरा एक रेफरेंस बन गया है |इनमे जो भी विषय हैं -गति ,
जीव, जीव का लक्षण ,योग ,उपयोग ,कर्म ,काल इत्यादि -उन विषयों के आधार पर ही मेरी थॉट प्रोसेस काम करती है |
फॉर एग्जाम्पल -अभी दोस का जिक्र आया था ,तो उनके उपन्यास में मैंने हिसाब लगाया कि (तारीख वही है- २८-११-१३ )सत्य (जो मेरे रेफरेन्स के मुताबिक जैन शास्त्रों में वर्णित सत्य है ) और काव्य सत्य की खाई को यह उपन्यास इस बिंदु पर तो पूरा पाट देता है कि व्यक्ति के कर्मों का कर्ता व्यक्ति स्वयं है और वही भोक्ता भी ,ईश्वर नहीं है |(ये सब लिखते हुए मुझे कितनी हंसी आ रही है ,बता नहीं सकती ) बेहद तार्किक ,विचारोत्तेजक ढंग से उपन्यास सामजिक ताने-बाने की क्रूर स्थितियों में फंसे ईश्वर भीरु लोगो की बेचारगी और निष्क्रिय आस्था की व्यर्थता तथा inevitable अंत को सामने रखता है कि एक बार तो दृढ विश्वासी का विशवास भी हिल जाए (गौर करना इस बात में एक रचना के उद्देश्य और इम्पैक्ट की बात आ गयी है ) इस बिंदु पर यह एक पुरुष लेखक की दिमागी ऐयाशी नहीं है ,बल्कि सच्चाई से टकराने की एक ईमानदार कोशिश है |हाँ ,निष्कर्ष से असहमति हो सकती है |(टिपण्णी क्लोज )
जैन दर्शन भी ईश्वर के अस्तित्व को उस तरह नहीं मानता ,कि वह कहीं समुद्र में लेटा है और लक्ष्मीजी उनके पैर दबा रही हैं एटसेट्रा |
अब ज़रा इस बात को रोद्या की मां के नजरिये से देखें |अगर उसका ये विश्वास है की एक दिन सब ठीक हो जाएगा ,पर कुछ ठीक हुआ नहीं तो (उसके विशवास के मुताबिक )इस बात को ऐसे भी तो कह सकते हैं कि अगर रोद्या की नौकरी लग जाती तब तो सब कुछ ठीक हो ही जाना था |पर लड़का ईश्वर का द्वेषी निकला और इसी बात का दंड उन्होंने भुगता |
तो सत्य का निर्णय कैसे हो ?
रोद्य का विश्वास ठीक है या उसकी मां का |तेरा सत्य सही है या मेरा |
पर कोई सत्य तो ऐसा होगा जो तेरे -मेरे मानने से नहीं ,बल्कि सत्य होने से सत्य है -उसे कोई माने या नहीं |वह बदलता नहीं है |
जैन दर्शन में या किसी भी किताब में ,मैं इसी सत्य की खोज करती हूँ |
आप कहोगे कि यह तो सरासर गलत है |अपनी दार्शनिक मान्यताओं को साहित्यिक आलोचना में आरोपित करना तो पूर्वग्रह हुआ |
नहीं ऐसा नहीं है |..contd
जैनी तो ,हाल-फ़िलहाल तक ,इन बीमारीओं से(थैंक गॉड )बचे हुए हैं |यहाँ तो हमने किसी गुरु के मुख से स्त्री विरोधी या दलित विरोधी बातें नहीं सुनी |हाँ अनुशासित करने की भाषा अवश्य सुनी है |खैर
लेकिन सम्प्रदायवाद इनमे भी कम नहीं ,पर ये बेचारे आपस में उलझ कर ही अपनी गर्मी का शमन कर लेते हैं |
जैन शास्त्रों के विषय ,मुख्यत ;,चार अनुयोगों में विभाजित है |चरणानुयोग ,करणानुयोग ,कथानुयोग और गणितानुयोग |ये समझ लीजिये कि सारी हिस्ट्री ,जिओग्राफी ,बॉटनी ,फिजिक्स ,साहित्य ,कला ,भाषा विज्ञान इनमे समाया है |
इसलिए इन शास्त्रों का अध्ययन मेरे लिए वैसा ही है ,जैसे मैं अन्य लेखकों की किताबें पढ़ती हूँ | शास्त्र भी किताबें ही तो हैं |
बस एक फर्क है |कि इनमे लिखी बातों की मुझे श्रद्धा है | ऐसा नहीं कि मुझे हर बात पढ़ते ही समझ में आ जाती है या मुझे कोई बात गलत नहीं लगती पर जैन शास्त्रों में लिखी बातों को मैं काटती नहीं हूँ |मैं यही समझती हूँ कि हो सकता है मुझे अभी समझ नहीं आ रही हो |सोचती रहती हूँ ,गुनती रहती हूँ |कभी मौका लगता है तो किसी गुरु के यहाँ शंका निवारण कर लेती हूँ |
इनके अध्ययन से ही चीजों को ग्रहण करने का मेरा एक रेफरेंस बन गया है |इनमे जो भी विषय हैं -गति ,
जीव, जीव का लक्षण ,योग ,उपयोग ,कर्म ,काल इत्यादि -उन विषयों के आधार पर ही मेरी थॉट प्रोसेस काम करती है |
फॉर एग्जाम्पल -अभी दोस का जिक्र आया था ,तो उनके उपन्यास में मैंने हिसाब लगाया कि (तारीख वही है- २८-११-१३ )सत्य (जो मेरे रेफरेन्स के मुताबिक जैन शास्त्रों में वर्णित सत्य है ) और काव्य सत्य की खाई को यह उपन्यास इस बिंदु पर तो पूरा पाट देता है कि व्यक्ति के कर्मों का कर्ता व्यक्ति स्वयं है और वही भोक्ता भी ,ईश्वर नहीं है |(ये सब लिखते हुए मुझे कितनी हंसी आ रही है ,बता नहीं सकती ) बेहद तार्किक ,विचारोत्तेजक ढंग से उपन्यास सामजिक ताने-बाने की क्रूर स्थितियों में फंसे ईश्वर भीरु लोगो की बेचारगी और निष्क्रिय आस्था की व्यर्थता तथा inevitable अंत को सामने रखता है कि एक बार तो दृढ विश्वासी का विशवास भी हिल जाए (गौर करना इस बात में एक रचना के उद्देश्य और इम्पैक्ट की बात आ गयी है ) इस बिंदु पर यह एक पुरुष लेखक की दिमागी ऐयाशी नहीं है ,बल्कि सच्चाई से टकराने की एक ईमानदार कोशिश है |हाँ ,निष्कर्ष से असहमति हो सकती है |(टिपण्णी क्लोज )
जैन दर्शन भी ईश्वर के अस्तित्व को उस तरह नहीं मानता ,कि वह कहीं समुद्र में लेटा है और लक्ष्मीजी उनके पैर दबा रही हैं एटसेट्रा |
अब ज़रा इस बात को रोद्या की मां के नजरिये से देखें |अगर उसका ये विश्वास है की एक दिन सब ठीक हो जाएगा ,पर कुछ ठीक हुआ नहीं तो (उसके विशवास के मुताबिक )इस बात को ऐसे भी तो कह सकते हैं कि अगर रोद्या की नौकरी लग जाती तब तो सब कुछ ठीक हो ही जाना था |पर लड़का ईश्वर का द्वेषी निकला और इसी बात का दंड उन्होंने भुगता |
तो सत्य का निर्णय कैसे हो ?
रोद्य का विश्वास ठीक है या उसकी मां का |तेरा सत्य सही है या मेरा |
पर कोई सत्य तो ऐसा होगा जो तेरे -मेरे मानने से नहीं ,बल्कि सत्य होने से सत्य है -उसे कोई माने या नहीं |वह बदलता नहीं है |
जैन दर्शन में या किसी भी किताब में ,मैं इसी सत्य की खोज करती हूँ |
आप कहोगे कि यह तो सरासर गलत है |अपनी दार्शनिक मान्यताओं को साहित्यिक आलोचना में आरोपित करना तो पूर्वग्रह हुआ |
नहीं ऐसा नहीं है |..contd
Thursday, July 14, 2016
पॉज -1
मेरी एक बुरी आदत है |सोचा अभी कह दूँ , बाद की बातचीत में ये एंगल भी साइड बाई साइड चलता रहेगा |
.....................
मेरे जन्म से जैन हूँ | इसे संयोग कहिये या एक प्रकार की परम्परा से जुडाव ,कि ,मेरे जीवन में जैनिज़्म का प्रभाव शुरू से रहा है | शुरू से हमारे घर के आसपास स्थानक थी ,तो जैन साधू-साध्वियों से वास्ता रहा |यह प्रयत्नज भी रहा होगा कि बड़ों ने सोचा होगा कि घर स्थानक के आसपास ही लेते हैं ,धार्मिक चर्या के परिपालन में आसानी रहेगी | बीच के कई बार यह क्रम टूटा भी ,कि , कई बार हम दूर भी रहे | (दिल्ली में तो किराए के घर में थे |अब तो अपना है ,दोनों जगह |मायका भी ,ससुराल भी ) पर वह अधिकतर साल दो साल या अधिक से अधिक 3-4 साल के लिए | फिर वापस संयोग जुड़ जाता था |
शुरू में तो यह साधू-साध्वियों के दर्शन तक सीमित था | जैसे अपने बड़ों के साथ चले गले ,दर्शन करके वापस आ गए |मम्मी कहती है कि तेरे बाबा (गन्नौर में ) तुझे 'अठन्नी दूंगा ' कहकर स्थानक ले जाते थे | उस समय ,समझ तो क्या थी ,पर संत अच्छे लगते थे | खासकर गुरनीजी के यहाँ शाम को भजन सुनते थे ,तो कई स्तुतियाँ मुझे बचपन में ही याद हो गयी थी |पीतमपुरा (मैं ६ या ७ वी में होंगी ) में हमने सामायिक के ९ पाठ ,कुछ बोल वगैरह सीखे थे | पर मेरे जीवन में जैनिज़्म का विशेष जुडाव १९९७ में हुआ ,जब सेक्टर -3 में सेठ जी और भगवन जी का चातुर्मास हुआ | उस दौरान गुरूजी के प्रवचनों के माध्यम से अपने धर्म के कई कांसेप्ट से परिचित हुई | भगवन जी की गुरु धारना भी ली |सीखने की लगन भी जागी | वीर स्तुति (प्राकृत ) याद की थी |और भी कई बातें थी ............
बाद में शास्त्रों के स्वाध्याय का क्रम चला (जो की आज भी जारी है )....
इन सब बातों को यहाँ कहने का मकसद ये है कि मैं पाठकों के सामने अपने माइंड का रेफरेन्स बताना चाहती हूँ |
हर एक इंसान का एक रेफरेन्स होता है | मानी जिस पर वो टिका होता है ,जिस पर उसे विशवास होता है | यह कोई व्यक्ति भी हो सकता है ,परिवार भी ,एक व्यवस्था का ढांचा भी |
समय बदलने के साथ ये रेफरेंस बदलते भी रहते हैं |जैसे ब्याह के अगले दिन से ही एक लड़की यह जान लेती है (इंडिया में )कि अब ससुराल ही उसका घर है और उसका गुजारा अब यहीं होना है |रेफरेंस चेंज
मेरे जीवन के रेफरेंस भी बदलते रहे |
बचपन में मैं दादी -बाबा की ज्यादा सुनती थी ,क्योंकि देखिये ना ,घुमने के साथ साथ पैसा भी मिलता था | तो एक बच्चा क्यों विश्वास नहीं करेगा |
बाद में मुझ पर मेरे पिता का ज्यादा प्रभाव था |दिल्ली का खुला आसमान ,और चौड़ी सडकें ,मैंने देखी जरुर पर पिता की उंगली पकडे हुए |
फिर जैसे अण्डों में से बच्चे निकलते हैं ,आसमान को देखते हैं ,अपनी आखें मलकाते हैं ,वैसे ही मैं भी स्कुल -कालेज -अक्षरों की नई -नई दुनिया देखी |नई -नई बातें सीखीं |पर मेरा रेफरेंस हमेशा मेरे पिता ही थे |मेरे कभी ज्यादा दोस्त भी नहीं बने |इस बात को कुछ भी कह लो |मेरे अन्दर हिम्मत नहीं थी या आज में याद करूँ ,तो वे कभी ज्यादा क्रूर नहीं थे | authoritative थे ,पर किसी का व्यक्तित्व कुचल दें ,ऐसे नहीं थे |
पर अक्षरों के कारण एक अलग रेफरेन्स सेंटर था ,जो मेरे अन्दर develop हो रहा था ,या कहूँ ,१८-२० साल की उम्र तक मैं कई रेफरेंसों के जाल में उलझ चुकी थी |सही क्या ? गलत क्या ? इसका मुझे ज्यादा अंदाज नहीं था |...............................
फिर सेठजी मिल गए | उनके पास बैठना ऐसा था कि किसी झील के किनारे आ बैठे हों |उनकी शांत -दांत छवि केवल दर्शन मात्र से सारे संताप हर लेती थी |
आप कहोगे भक्ति है |
मैं कहूँगी 'हाँ भक्ति है |'
तो जीवन में ,गुरु के रूप में एक नए शक्तिशाली रेफरेन्स ने प्रवेश किया |
पर गुरु से मेरी संलग्नता केवल शास्त्रों की आज्ञा लेने और स्वाध्याय में कठिनाई निवारण तक रही |क्योंकि भगवन और सेठजी ,दोनों ही उम्र में तो मेरे दादाजी के समकक्ष बैठते है |अत; पर्सनल प्रॉब्लम कभी पूछी नहीं | कई लोगों से गुरुओं का जुडाव काफी पर्सनल हो जाता है |(बल्कि ज्यादातर लोग अपनी घरेलु समस्याओं के कारण ही ज्यादा जुड़ते हैं |यह भी हमारे (हमारे क्या ,सभी जगह यही हाल है )समाज का सच है |अस्तु )
अब भगवन जी का तो देवलोक हो चूका हैं ,सेठजी ने तैयारी कर ली है (उनकी संलेखना चल रही है |गोहाना जैन स्थानक में ) तो जीवन किस पर टिका है ?
अब जीवन गुरु के नाम पर टिका है |तुलसी ने लिखा है -राम से भी बढ़कर राम का नाम है |एक बार मैंने भगवन से सवाल पूछ लिया था (जी हाँ ,मूर्खताएं मैंने कम नहीं की हैं ) तो वे हंसकर बोले ,गुरु तो वही रहेगा |आज याद करती हूँ कि कितनी गहरी बात थी |
और टिका है शास्त्र स्वाध्याय पर |मुझे जैन शास्त्रों पर अगाध श्रद्धा है |इतनी बुद्धि तो कहाँ है की सभी समझ लूँ पर फिर भी कोशिश करने में तो हर्ज नहीं | ..................contd
.....................
मेरे जन्म से जैन हूँ | इसे संयोग कहिये या एक प्रकार की परम्परा से जुडाव ,कि ,मेरे जीवन में जैनिज़्म का प्रभाव शुरू से रहा है | शुरू से हमारे घर के आसपास स्थानक थी ,तो जैन साधू-साध्वियों से वास्ता रहा |यह प्रयत्नज भी रहा होगा कि बड़ों ने सोचा होगा कि घर स्थानक के आसपास ही लेते हैं ,धार्मिक चर्या के परिपालन में आसानी रहेगी | बीच के कई बार यह क्रम टूटा भी ,कि , कई बार हम दूर भी रहे | (दिल्ली में तो किराए के घर में थे |अब तो अपना है ,दोनों जगह |मायका भी ,ससुराल भी ) पर वह अधिकतर साल दो साल या अधिक से अधिक 3-4 साल के लिए | फिर वापस संयोग जुड़ जाता था |
शुरू में तो यह साधू-साध्वियों के दर्शन तक सीमित था | जैसे अपने बड़ों के साथ चले गले ,दर्शन करके वापस आ गए |मम्मी कहती है कि तेरे बाबा (गन्नौर में ) तुझे 'अठन्नी दूंगा ' कहकर स्थानक ले जाते थे | उस समय ,समझ तो क्या थी ,पर संत अच्छे लगते थे | खासकर गुरनीजी के यहाँ शाम को भजन सुनते थे ,तो कई स्तुतियाँ मुझे बचपन में ही याद हो गयी थी |पीतमपुरा (मैं ६ या ७ वी में होंगी ) में हमने सामायिक के ९ पाठ ,कुछ बोल वगैरह सीखे थे | पर मेरे जीवन में जैनिज़्म का विशेष जुडाव १९९७ में हुआ ,जब सेक्टर -3 में सेठ जी और भगवन जी का चातुर्मास हुआ | उस दौरान गुरूजी के प्रवचनों के माध्यम से अपने धर्म के कई कांसेप्ट से परिचित हुई | भगवन जी की गुरु धारना भी ली |सीखने की लगन भी जागी | वीर स्तुति (प्राकृत ) याद की थी |और भी कई बातें थी ............
बाद में शास्त्रों के स्वाध्याय का क्रम चला (जो की आज भी जारी है )....
इन सब बातों को यहाँ कहने का मकसद ये है कि मैं पाठकों के सामने अपने माइंड का रेफरेन्स बताना चाहती हूँ |
हर एक इंसान का एक रेफरेन्स होता है | मानी जिस पर वो टिका होता है ,जिस पर उसे विशवास होता है | यह कोई व्यक्ति भी हो सकता है ,परिवार भी ,एक व्यवस्था का ढांचा भी |
समय बदलने के साथ ये रेफरेंस बदलते भी रहते हैं |जैसे ब्याह के अगले दिन से ही एक लड़की यह जान लेती है (इंडिया में )कि अब ससुराल ही उसका घर है और उसका गुजारा अब यहीं होना है |रेफरेंस चेंज
मेरे जीवन के रेफरेंस भी बदलते रहे |
बचपन में मैं दादी -बाबा की ज्यादा सुनती थी ,क्योंकि देखिये ना ,घुमने के साथ साथ पैसा भी मिलता था | तो एक बच्चा क्यों विश्वास नहीं करेगा |
बाद में मुझ पर मेरे पिता का ज्यादा प्रभाव था |दिल्ली का खुला आसमान ,और चौड़ी सडकें ,मैंने देखी जरुर पर पिता की उंगली पकडे हुए |
फिर जैसे अण्डों में से बच्चे निकलते हैं ,आसमान को देखते हैं ,अपनी आखें मलकाते हैं ,वैसे ही मैं भी स्कुल -कालेज -अक्षरों की नई -नई दुनिया देखी |नई -नई बातें सीखीं |पर मेरा रेफरेंस हमेशा मेरे पिता ही थे |मेरे कभी ज्यादा दोस्त भी नहीं बने |इस बात को कुछ भी कह लो |मेरे अन्दर हिम्मत नहीं थी या आज में याद करूँ ,तो वे कभी ज्यादा क्रूर नहीं थे | authoritative थे ,पर किसी का व्यक्तित्व कुचल दें ,ऐसे नहीं थे |
पर अक्षरों के कारण एक अलग रेफरेन्स सेंटर था ,जो मेरे अन्दर develop हो रहा था ,या कहूँ ,१८-२० साल की उम्र तक मैं कई रेफरेंसों के जाल में उलझ चुकी थी |सही क्या ? गलत क्या ? इसका मुझे ज्यादा अंदाज नहीं था |...............................
फिर सेठजी मिल गए | उनके पास बैठना ऐसा था कि किसी झील के किनारे आ बैठे हों |उनकी शांत -दांत छवि केवल दर्शन मात्र से सारे संताप हर लेती थी |
आप कहोगे भक्ति है |
मैं कहूँगी 'हाँ भक्ति है |'
तो जीवन में ,गुरु के रूप में एक नए शक्तिशाली रेफरेन्स ने प्रवेश किया |
पर गुरु से मेरी संलग्नता केवल शास्त्रों की आज्ञा लेने और स्वाध्याय में कठिनाई निवारण तक रही |क्योंकि भगवन और सेठजी ,दोनों ही उम्र में तो मेरे दादाजी के समकक्ष बैठते है |अत; पर्सनल प्रॉब्लम कभी पूछी नहीं | कई लोगों से गुरुओं का जुडाव काफी पर्सनल हो जाता है |(बल्कि ज्यादातर लोग अपनी घरेलु समस्याओं के कारण ही ज्यादा जुड़ते हैं |यह भी हमारे (हमारे क्या ,सभी जगह यही हाल है )समाज का सच है |अस्तु )
अब भगवन जी का तो देवलोक हो चूका हैं ,सेठजी ने तैयारी कर ली है (उनकी संलेखना चल रही है |गोहाना जैन स्थानक में ) तो जीवन किस पर टिका है ?
अब जीवन गुरु के नाम पर टिका है |तुलसी ने लिखा है -राम से भी बढ़कर राम का नाम है |एक बार मैंने भगवन से सवाल पूछ लिया था (जी हाँ ,मूर्खताएं मैंने कम नहीं की हैं ) तो वे हंसकर बोले ,गुरु तो वही रहेगा |आज याद करती हूँ कि कितनी गहरी बात थी |
और टिका है शास्त्र स्वाध्याय पर |मुझे जैन शास्त्रों पर अगाध श्रद्धा है |इतनी बुद्धि तो कहाँ है की सभी समझ लूँ पर फिर भी कोशिश करने में तो हर्ज नहीं | ..................contd
Tuesday, July 12, 2016
कहानीपन ? रजिया फंस गयी गुंडों में
६-१२-१३
निराला की कहानी लिली और व्यंग्य श्रीमती गजानंद शास्त्रानी पढ़े |कहानी ठीक थी (उस समय के भारतीय परिवार के सन्दर्भ में ),व्यंग्य भी ठीक था |बाल कहानियां ,ऐसा लगा कि श्रुत परम्परा में पहले से हैं |
(बीच की कई टिपण्णी स्किप कर रही हूँ ,वे कहानियों पर हैं भी नहीं | जस्ट यह बताने के लिए की पढने में इतना गैप नहीं आता | )
4-3-१४
आज एक कहानी पढ़ी -मनोज पांडे की ''पुरोहित जिसने मछलियाँ पाली ''| आदि से अंत तक रामदत्त की जिंदगी का वर्णन ही कर दिया |खासी औपन्यासिक सी थी |अच्छी नहीं लगी |जी ख़राब हो गया |पर वो शायद कथ्य के चुनाव के कारण (इस कहानी में कुछ पोर्शन चाइल्ड अब्यूस पर है ) था |अंत बिलकुल बेमजा था | idealistic .कुनेन की गोली खिलाने के बाद कोई जलेबी कैसे दिखा सकता है ?
पर यह है की मनोज की भाषा एकदम सहज है |तुरंत समझ में आने वाली |कोई टेक्निकेलिटी नहीं |स्थितियों की रचना भी सहज है |स्वाभाविक सी | और कहते -कहते बीच में जिंदगी के फलसफे पर जो एकाध जगह गंभीर हो जाते हैं ,सो वह भी अच्छा ही लगता है |
५-3-१४
मनोज की एक कहानी और पढ़ी ''वह बुढा जो शायद कभी था ही नहीं ''|एक और पढ़ी थी पहले -लड़की की हंसी |शीर्षक लम्बे रखते हैं |
यह कहानी ठीक थी |ईश्वर सम्बन्धी मान्यताओं ,अंधविश्वासों ,सम्प्रदायों के खोखलेपन को प्रस्तुत
करती है |ठीक थी |मनोज की चिंताएं और प्रस्तुतीकरण का ढंग अच्छा है |
पत्नी और छुट्टी का दिन -यह कहानी भी मनोज की थी | कहानी में कुछ भी नहीं |बल्कि कहिये कथ्य या कथानक तो है ही नहीं ;पर फिर भी पढने लायक है क्योकि नायक की मनस्थितियों और भाषा से पाठक (पुरुष पाठक रिलेट कर सकता है )
नोट ;यह टिपण्णी बताती हैं की कई बार भाषा या कहने के ढंग से भी पाठक कहानी का रस ले लेता है |
१६-3-१४
अमरकांत की पोखरा पढ़ी |समझ ही नहीं आई |कहानीपन क्या था ?
निराला की कहानी लिली और व्यंग्य श्रीमती गजानंद शास्त्रानी पढ़े |कहानी ठीक थी (उस समय के भारतीय परिवार के सन्दर्भ में ),व्यंग्य भी ठीक था |बाल कहानियां ,ऐसा लगा कि श्रुत परम्परा में पहले से हैं |
(बीच की कई टिपण्णी स्किप कर रही हूँ ,वे कहानियों पर हैं भी नहीं | जस्ट यह बताने के लिए की पढने में इतना गैप नहीं आता | )
4-3-१४
आज एक कहानी पढ़ी -मनोज पांडे की ''पुरोहित जिसने मछलियाँ पाली ''| आदि से अंत तक रामदत्त की जिंदगी का वर्णन ही कर दिया |खासी औपन्यासिक सी थी |अच्छी नहीं लगी |जी ख़राब हो गया |पर वो शायद कथ्य के चुनाव के कारण (इस कहानी में कुछ पोर्शन चाइल्ड अब्यूस पर है ) था |अंत बिलकुल बेमजा था | idealistic .कुनेन की गोली खिलाने के बाद कोई जलेबी कैसे दिखा सकता है ?
पर यह है की मनोज की भाषा एकदम सहज है |तुरंत समझ में आने वाली |कोई टेक्निकेलिटी नहीं |स्थितियों की रचना भी सहज है |स्वाभाविक सी | और कहते -कहते बीच में जिंदगी के फलसफे पर जो एकाध जगह गंभीर हो जाते हैं ,सो वह भी अच्छा ही लगता है |
५-3-१४
मनोज की एक कहानी और पढ़ी ''वह बुढा जो शायद कभी था ही नहीं ''|एक और पढ़ी थी पहले -लड़की की हंसी |शीर्षक लम्बे रखते हैं |
यह कहानी ठीक थी |ईश्वर सम्बन्धी मान्यताओं ,अंधविश्वासों ,सम्प्रदायों के खोखलेपन को प्रस्तुत
करती है |ठीक थी |मनोज की चिंताएं और प्रस्तुतीकरण का ढंग अच्छा है |
पत्नी और छुट्टी का दिन -यह कहानी भी मनोज की थी | कहानी में कुछ भी नहीं |बल्कि कहिये कथ्य या कथानक तो है ही नहीं ;पर फिर भी पढने लायक है क्योकि नायक की मनस्थितियों और भाषा से पाठक (पुरुष पाठक रिलेट कर सकता है )
नोट ;यह टिपण्णी बताती हैं की कई बार भाषा या कहने के ढंग से भी पाठक कहानी का रस ले लेता है |
१६-3-१४
अमरकांत की पोखरा पढ़ी |समझ ही नहीं आई |कहानीपन क्या था ?
Monday, July 11, 2016
पोस्ट कमेंट्स -अपराध और दंड
यह तो थी इस उपन्यास पर लिखी कुछ अनौपचारिक टिपण्णीयां ;
कुछ अन्य विचारणीय बिंदु ;
यह आलोचना कि रोद्या ,सोन्या जैसे पात्र साहित्यिक हैं ,सही होते हुए भी ;इनमे एक अन्य विचारणीय पक्ष और भी है |लोग कहते हैं कि रचनाओं में लेखकों का अपना जीवन होता है | लेखक क्यूँ लिखता हैं ? इस प्रश्न की भी अलग अलग थियोरियां हैं |कोई कहते हैं (सुधा अरोरा )कि उन्हें रिलीफ मिलता है ,कोई कहते हैं (सआदत हसन मंटो )कि रोटी के लिए लिखता हूँ | अभिव्यक्ति वाली थ्योरी तो है ही |
इन थिओरियों से अलग ज़रा इस बात पर भी गौर करें कि किसी कहानी में एक पक्षकार तो होता ही है |अर्थात कोई भी कहानी किसी एक नजरिये से पेश की जाती है |यह नजरिया लेखक का ही होगा | उस नजरिये का वाहक पात्र स्वयं उस कहानी में मौजूद हो भी सकता है ,नहीं भी |पर उसे पहचानना मुश्किल नहीं होता |
इस उपन्यास में रोद्या लेखक के पक्ष का वाहक पात्र है |(यह तो स्पष्ट है ही )
अब रोद्या का जीवन कितना स्वयं लेखक के जीवन से मिलता -जुलता है ,ऐसे तथ्य तो अन्य साक्ष्यों से जुटाए जा सकते है |
पर एक बात है -दोस का समय रूस में मार्क्सवादी चिंतन के उभार का समय था ,जिसके फलस्वरूप वहां लाल क्रांति भी हुई |अर्थात गहरी उथल-पुथल का समय |एक लेखक के लिए अपने समय की हलचलों को इग्नोर करना संभव नहीं होता |बल्कि मैं कहूँगी कि लेखन के क्षेत्र में कालजयी रचनाओं के तैयार होने का सबसे उत्तंम समय यही होता है |
लेखन कार्य मूलतः चिन्तनात्मक कार्य है |यह एनर्जी अलग प्रकार की होती है | इसका सम्बन्ध व्यक्ति की विचार शक्ति से है |विचारने का कार्य अधिकांश sitting का काम है ,जो की सामान्य पाठकों को बेहद उबाऊ ,अक्रियाशील ,बोरिंग सा लगता है |परन्तु इस कार्य का भी अपना महत्व होता है |
दूसरी बात है कि - किसी भी प्रकार की एनर्जी श्रेष्ट या हीन नहीं होती | यह तो उस पर्टिकुलर समय की बात है कि उस युग में कौन सी एनर्जी को सम्मानित किया जाता है |eg आजकल गंभीर ज्ञान के विद्वानों की उतनी पूछ नहीं है |
दोस का समय गंभीर चिंतकों के सम्मान का युग था | स्वयं दोस ने अपनी रचनाओं में विद्वानों के प्रति गहरा सम्मान दर्शाया है |उपन्यास में रोद्या की माँ ,उसकी सतत बेकारी के बावजूद ,उसकी क्षमता पर कभी संदेह नहीं करती |(हमारे यहाँ ऐसा नहीं है | यहाँ अगर किसी उच्च शिक्षित को नौकरी न मिले तो घरवाले समझेंगे ,ये ही नालायक है |)
रोद्या की नाकामी दोस की नाकामी हो सकती है | हो सकता है कि उन्होंने किसी दुसरे प्रकार का जीवन जीना चाहा हो |परन्तु रोदया के माध्यम से वे जो स्थितियों की इतनी बारीकी तक पहुंचे हैं और समस्या को इतनी गहराई तक जाना है कि इन्ही सब चीजों को समझने में एक साहित्यकार (अथवा कहें कि एक संवेदनशील व्यक्ति ,साहित्यकार तो वह बाद में बनता है ) की उम्र गुज़र जाती है समाधान तो कहाँ से लायें ? समस्या की पेचीदगी को सुलझा दिया ,यही क्या कम है |
ऐसी कहानियों को मैं तीव्र भावावेग (आलोचनात्मक )वाली 'बंद '(कि लेखक एक प्रकार के भावावेग में बंद है ,उससे बाहर निकलने के लिए छटपटा रहा है )कहानियां कहती हूँ |
कुछ अन्य विचारणीय बिंदु ;
यह आलोचना कि रोद्या ,सोन्या जैसे पात्र साहित्यिक हैं ,सही होते हुए भी ;इनमे एक अन्य विचारणीय पक्ष और भी है |लोग कहते हैं कि रचनाओं में लेखकों का अपना जीवन होता है | लेखक क्यूँ लिखता हैं ? इस प्रश्न की भी अलग अलग थियोरियां हैं |कोई कहते हैं (सुधा अरोरा )कि उन्हें रिलीफ मिलता है ,कोई कहते हैं (सआदत हसन मंटो )कि रोटी के लिए लिखता हूँ | अभिव्यक्ति वाली थ्योरी तो है ही |
इन थिओरियों से अलग ज़रा इस बात पर भी गौर करें कि किसी कहानी में एक पक्षकार तो होता ही है |अर्थात कोई भी कहानी किसी एक नजरिये से पेश की जाती है |यह नजरिया लेखक का ही होगा | उस नजरिये का वाहक पात्र स्वयं उस कहानी में मौजूद हो भी सकता है ,नहीं भी |पर उसे पहचानना मुश्किल नहीं होता |
इस उपन्यास में रोद्या लेखक के पक्ष का वाहक पात्र है |(यह तो स्पष्ट है ही )
अब रोद्या का जीवन कितना स्वयं लेखक के जीवन से मिलता -जुलता है ,ऐसे तथ्य तो अन्य साक्ष्यों से जुटाए जा सकते है |
पर एक बात है -दोस का समय रूस में मार्क्सवादी चिंतन के उभार का समय था ,जिसके फलस्वरूप वहां लाल क्रांति भी हुई |अर्थात गहरी उथल-पुथल का समय |एक लेखक के लिए अपने समय की हलचलों को इग्नोर करना संभव नहीं होता |बल्कि मैं कहूँगी कि लेखन के क्षेत्र में कालजयी रचनाओं के तैयार होने का सबसे उत्तंम समय यही होता है |
लेखन कार्य मूलतः चिन्तनात्मक कार्य है |यह एनर्जी अलग प्रकार की होती है | इसका सम्बन्ध व्यक्ति की विचार शक्ति से है |विचारने का कार्य अधिकांश sitting का काम है ,जो की सामान्य पाठकों को बेहद उबाऊ ,अक्रियाशील ,बोरिंग सा लगता है |परन्तु इस कार्य का भी अपना महत्व होता है |
दूसरी बात है कि - किसी भी प्रकार की एनर्जी श्रेष्ट या हीन नहीं होती | यह तो उस पर्टिकुलर समय की बात है कि उस युग में कौन सी एनर्जी को सम्मानित किया जाता है |eg आजकल गंभीर ज्ञान के विद्वानों की उतनी पूछ नहीं है |
दोस का समय गंभीर चिंतकों के सम्मान का युग था | स्वयं दोस ने अपनी रचनाओं में विद्वानों के प्रति गहरा सम्मान दर्शाया है |उपन्यास में रोद्या की माँ ,उसकी सतत बेकारी के बावजूद ,उसकी क्षमता पर कभी संदेह नहीं करती |(हमारे यहाँ ऐसा नहीं है | यहाँ अगर किसी उच्च शिक्षित को नौकरी न मिले तो घरवाले समझेंगे ,ये ही नालायक है |)
रोद्या की नाकामी दोस की नाकामी हो सकती है | हो सकता है कि उन्होंने किसी दुसरे प्रकार का जीवन जीना चाहा हो |परन्तु रोदया के माध्यम से वे जो स्थितियों की इतनी बारीकी तक पहुंचे हैं और समस्या को इतनी गहराई तक जाना है कि इन्ही सब चीजों को समझने में एक साहित्यकार (अथवा कहें कि एक संवेदनशील व्यक्ति ,साहित्यकार तो वह बाद में बनता है ) की उम्र गुज़र जाती है समाधान तो कहाँ से लायें ? समस्या की पेचीदगी को सुलझा दिया ,यही क्या कम है |
ऐसी कहानियों को मैं तीव्र भावावेग (आलोचनात्मक )वाली 'बंद '(कि लेखक एक प्रकार के भावावेग में बंद है ,उससे बाहर निकलने के लिए छटपटा रहा है )कहानियां कहती हूँ |
अपराध और दंड -3
२८-११-१३
स्विद्रिगाईलोव ने आत्महत्या कर ली |
जैसे कई फ़िल्मकार किसी सीन का महत्व दिखाने के लिए उसे कुछ देर तक स्क्रीन पर स्टिल रखते है (eg तारे जमीं पर फिल्म में दर्शील का पानी पर पड़ते हुए रोशनी के टुकड़े को देखना ),वैसे ही दोस ने भी इस भयानक अंत के लिए स्विदरी के उस दिन के क्रियाकलाप ,उसका अकेलापन ,अकेलेपन की भयानकता ,व्यवहार के अजनबीपन को काफी खींचा है |
उपन्यास तो पूरा हो गया और यह रहा लेखा -जोखा -
अपराध और दंड एक विचारात्मक -आलोचनात्मक यथार्थपूर्ण उपन्यास है जिसमे रस्कोलनिकोव (रोद्या ) के माध्यम से इस बात पर विचार किया गया है कि आखिर अपराध है क्या ? और उसका दंड क्या हो ?
जब समाज की बुनावट ऐसी हो जिसमे उपलब्ध साधन कुछ व्यक्तियों के इर्द-गिर्द हो सिमट जाएं ,तब अपराध कि सही व्याख्या क्या हो ?यह उपन्यास जिन बातों को बेहद असरदार ढंग से उठाता है वह हैं -
पर क्या यह संभव है कि सामान्य तर्कशक्ति तथा बुद्धि से युक्त व्यक्ति अपने चारों ओर की तर्कहीनता को नज़रन्दाज़ करके सिर्फ जीवन का वरण करे ? रुसी कहानी यहाँ खत्म होती है |मैं समझती हूँ भारतीय कहानी यहाँ से शुरू होती है | उपर्युक्त प्रश्न का उत्तर है - हाँ |अकेले अपने दम पर महासमुद्र पार करने वाले होते हैं ,परन्तु विरले होते है |भारत की दर्शन परम्परा इस महाप्रशन की गंगोत्री में से निकली है |
उपन्यास के high points हैं जहाँ दोस बेहद सफल हैं -
भाषा बहुत चुस्त है (अनुवाद में भी) सीन-निर्माण ,पात्रों का आना जाना ,सीन बदलाव ,आकस्मिकता ,नाटकीयता रोचकता का निर्माण करती है |
स्विद्रिगाईलोव ने आत्महत्या कर ली |
जैसे कई फ़िल्मकार किसी सीन का महत्व दिखाने के लिए उसे कुछ देर तक स्क्रीन पर स्टिल रखते है (eg तारे जमीं पर फिल्म में दर्शील का पानी पर पड़ते हुए रोशनी के टुकड़े को देखना ),वैसे ही दोस ने भी इस भयानक अंत के लिए स्विदरी के उस दिन के क्रियाकलाप ,उसका अकेलापन ,अकेलेपन की भयानकता ,व्यवहार के अजनबीपन को काफी खींचा है |
उपन्यास तो पूरा हो गया और यह रहा लेखा -जोखा -
अपराध और दंड एक विचारात्मक -आलोचनात्मक यथार्थपूर्ण उपन्यास है जिसमे रस्कोलनिकोव (रोद्या ) के माध्यम से इस बात पर विचार किया गया है कि आखिर अपराध है क्या ? और उसका दंड क्या हो ?
जब समाज की बुनावट ऐसी हो जिसमे उपलब्ध साधन कुछ व्यक्तियों के इर्द-गिर्द हो सिमट जाएं ,तब अपराध कि सही व्याख्या क्या हो ?यह उपन्यास जिन बातों को बेहद असरदार ढंग से उठाता है वह हैं -
- व्यक्ति की साधारणता और असाधारणता (मैंने अपनी लाइफ में कुछ लोग ऐसे देखे है जो स्वाभिमानी थे | जिनके भीतर आग थी ,सम्मान के साथ जीने कि और जिन्होंने इसके लिए कड़ी मेहनत ,अनुशासन ,बुद्धि ,कौशल का उपयोग किया |ऐसे लोग अक्सर विशेष भावनाशील ,संवेदनशील,नाजुक दिल होते है |वे अपने जीवन के रास्ते स्वयं निकलते हैं |उनका जीवन संघर्ष जीवन की परिस्थितिओं के बीच में से निकलता है | शायद ऐसे ही लोगो को असाधारण कहते होंगे | )
- ईश्वर में अनास्था (निष्क्रिय आस्थावाद मनुष्यों को कितना निरीह और भयभीत बना देता है ,इसका प्रमाणिक चारित्रिक चित्रण इस उपन्यास की ऐसी उपलब्धि है ,जिससे यह all time क्लासिक बना ही रहेगा | वह स्थान इससे कोई छीन नहीं सकता है |)
पर क्या यह संभव है कि सामान्य तर्कशक्ति तथा बुद्धि से युक्त व्यक्ति अपने चारों ओर की तर्कहीनता को नज़रन्दाज़ करके सिर्फ जीवन का वरण करे ? रुसी कहानी यहाँ खत्म होती है |मैं समझती हूँ भारतीय कहानी यहाँ से शुरू होती है | उपर्युक्त प्रश्न का उत्तर है - हाँ |अकेले अपने दम पर महासमुद्र पार करने वाले होते हैं ,परन्तु विरले होते है |भारत की दर्शन परम्परा इस महाप्रशन की गंगोत्री में से निकली है |
उपन्यास के high points हैं जहाँ दोस बेहद सफल हैं -
- पोर्फिरी और रोद्या का चोर-पुलिस का मानसिक खेल
- कटरीना द्वारा आयोजित मृत-भोज का वर्णन -वर्ग भेद ,भेद से उत्पन्न स्थितियां ,मानसिकता
- रोद्य का अकेलापन ,मानसिक दशा का सूक्ष्म विवरणात्मक वर्णन ,तनाव ,तनाव का असर ,hallucinations ,अनिश्चित मानसिक अवस्था (अर्थात उपन्यास के शीर्षक दंड की पूरी प्रक्रिया तो वह पहले ही भुगत चूका है |)
- सारा केन्द्रीकरण एकमात्र रोद्या पर कर दिया गया है |वह जो कह दे ,जो कर दे ,जो न कर दे -वही ठीक है |
- रजुमिखिन एक जीवंत पात्र है और कारण समझ में नहीं आता कि क्यों उपन्यासकार ने इस पात्र को विकसित नहीं किया ,मात्र इसलिए कि वह बोद्धिक नहीं था |बल्कि रोद्या के मुकाबले इस पात्र को अधिक प्रभावशाली बनाया जा सकता था ताकि पाठकों के पास पहले से ही अपना ऑप्शन चुनने का मौका रहे |पर रोद्या को अधिक प्रभावशाली दिखाकर पाठकों को मजबूर किया गया कि वे रोद्या की नाकामी को अंत तक झेले |जिस निष्कर्ष तक दोस अंत में पहुंचे है और जो महज ३-४ पैरा में निपटाया गया है वह निष्कर्ष रजुमिखिन के रूप में उपन्यास में पहले से मौजूद था |बस अगर उपन्यासकार का ध्यान उस ओर गया होता तो |तब वे बेहतरीन जीवन स्थितियां रचकर इस उपन्यास को एकांत बौद्धिक होने से बचा सकते थे|अब तो लगता है कि निष्कर्ष बौद्धिक ही रह जाएगा क्योकि खून के आखिरी कतरे तक का तनाव झेल चुकने ,बेकारी ,शारीरिक कमजोरी तथा निकम्मेपन के कारण लगता नहीं कि रोद्या ८ साल की जेल काटकर दोबारा नॉर्मल जीवन जी सकेगा |
- रोद्या और सोन्या साहित्यिक पात्र है ,जिन्हें साहित्यकार अपने मानस में रचते है |वे ही स्त्री -पुरुषों को ऐसा व्यक्तित्व देते है | पुरुष -स्वाभिमानी,बौद्धिक ,विचारवान ,दयालू ,कष्ट्सहिष्णु |स्त्री -कोमल ,लज्जावान ,आंतरिक पवित्रता की दीप्तिवाली ,आभामयी,तेजमयी,प्रेममयी |
भाषा बहुत चुस्त है (अनुवाद में भी) सीन-निर्माण ,पात्रों का आना जाना ,सीन बदलाव ,आकस्मिकता ,नाटकीयता रोचकता का निर्माण करती है |
Sunday, July 10, 2016
अपराध और दंड -2
२४-११-१३
७ भागो में से ६ पढ़ लिए हैं |समापन पहले पढ़ लिया है |उपन्यास में २ दर्दनाक मौतें हो चुकी हैं |एक क्लर्क की ,दूसरी उसकी पत्नी कटरीना की |रोद्या की माँ समापन में मरी |वैसी ही दर्दनाक ,निराशापूर्ण |
७ भागो में से ६ पढ़ लिए हैं |समापन पहले पढ़ लिया है |उपन्यास में २ दर्दनाक मौतें हो चुकी हैं |एक क्लर्क की ,दूसरी उसकी पत्नी कटरीना की |रोद्या की माँ समापन में मरी |वैसी ही दर्दनाक ,निराशापूर्ण |
- कटरीना और उसकी मालकिन की rivarly अच्छी दिखाई गयी है |सचमुच एक दूसरे के पंजों में फंसी औरतें ऐसे ही बिहेव करती हैं |
- क्लर्क की नौकरी छूटी तो वह शराब क्यों पीने लगा ? (अनास्था ,अपने स्वयं के जीवन उद्देश्य के प्रति किंकर्तव्यविमूढ़ता लोगों को ऐसा ही बना देती है |
- प्योत्र पेत्रोविच के रूप में धनी वर्ग के अहंकार ,दंभ ,मक्कारी का चित्र खींचना दोस का highlight पॉइंट है |ऐसी एक कहानी भी पढ़ी थी |
- क्या कारन है की प्रेमचंद की तरह दोस ने भी गरीब ,वंचित कमजोर और सामाजिक रूप से कुचले हुओं को सच्चा मानवीय ,नेकदिल,रहमदिल,संवेदनशील दिखाया है |चाहे रोद्या हो ,उसकी माँ हो ,बहन हो या सोन्या हो |क्या कुचले हुए लोगों की संवेदना 'प्रबल' हो जाती है ?what is the science behind it ? उपन्यास का tension -point बहुत high रखा गया है और इसकी कसावट कहीं भी ढीली नहीं पड़ी है |
- ५वे भाग में रोद्या ने सोन्या के आगे वे कारण कहे ,जिनके वशीभूत होकर उसने बुढीया को मारा |इनमे सबसे प्रबलतम कारण यह था कि वह खुद को यह साबित करना चाहता था कि वह जूँ नहीं है ;साधारण नहीं है | असाधारण है |अर्थात वह अपनी शक्तियों की आजमाइश (बुद्धि ,साहस ,जोखिम उठाने की क्षमता )करना चाहता था | दूसरे वह तार्किक रूप से इस बात से संतुष्ट हो चुका था कि उसकी स्थिति को ऊपर उठाने का भार स्वयं उसके ऊपर है ,ईश्वर पर नहीं |अर्थात ईश्वर पर अनास्था ने रोद्या को इतना दुस्साहसी बनाया |इसी कारण वह बुढ़िया की हत्या को तार्किक रूप से सही साबित कर सका |उसे सोन्या,कटरीना,अपनी मांऔर बहन जैसी निष्क्रिय आस्थावादी औरतों से गहरी चिढ और नफरत है ,जो केवल अप्रतिरोधी सहनशक्ति के कारण दूसरों के लिए सतत दुःख का स्रोत हैं |
- फिर रोद्या नाकाम क्यों हुआ ?ठीक यही प्रश्न वह अपने आप से पूछता है और इस नतीजे पर पहुँचता है कि वह 'कायर 'था |मैं भी यही मानती हूँ या कह लीजिये हत्या आखिर जुर्म है और ईश्वर के इस कानून के खिलाफ जाने की हिम्मत लेखक में भी नहीं ,चाहे वह खुद ईश्वर को न मानता हो |
- रोद्या की अनास्था क्लर्क की अनास्था से भिन्न है |
- नरेश नदीम ने अनुवाद अच्छा किया है |.....contd
Saturday, July 9, 2016
अपराध और दंड
१६ -११ -१३
फ्योदोर दोस्तोव्यस्की का उपन्यास शुरू किया है 'अपराध और दंड '| ऑनलाइन(hindisamay.com) | दूसरा भाग चल रहा है |रोद्या ने बुढ़िया और उसकी बहन को मार दिया है | आलोचनात्मक यथार्थपूर्ण वर्णन पढने का मज़ा ही कुछ और है |जगह जगह रोद्या की मनस्थिति ,उसके क्रियाकलापों के सूक्ष्म ब्योरे ,घटनाओं की तार्किकता ,आकस्मिकता तथा सबसे बढ़कर पात्रों की व्यक्तिगत विशेषता को पहचानती अचूक दृष्टि ने मजबूर कर दिया है की एक- एक शब्द ध्यान से पढूं |उसकी गहराई तक जाकर पढूं |may be जितनी गहराई में डूबकर लिखा गया है |
रोद्या (मुख्य किरदार ) का अकेलापन ,खालीपन ,बेतरतीबी ,संवेदनाओं का विश्लेषण अद्भुत है |फिर भी मैं इन सब से किंचित दुरी पर रहना manage कर लेती हूँ क्योकि मेरी परवरिश ,शिक्षा अलग वातावरण में हुए हैं -भारतीय वातावरण में हुए हैं| और यह जानना दिलचस्प है (चाहे किताबो के जरिये ही सही )कि कैसे होते हैं वे लोग जो भारतीय नहीं होते |
२० -११- १३
२१-११-१३
चौथे भाग पर पहुच गयी |उफ़ !!!!!! रोद्या का तनाव (क्या लेखक ने भी यही तनाव नहीं झेला होगा )
फ्योदोर दोस्तोव्यस्की का उपन्यास शुरू किया है 'अपराध और दंड '| ऑनलाइन(hindisamay.com) | दूसरा भाग चल रहा है |रोद्या ने बुढ़िया और उसकी बहन को मार दिया है | आलोचनात्मक यथार्थपूर्ण वर्णन पढने का मज़ा ही कुछ और है |जगह जगह रोद्या की मनस्थिति ,उसके क्रियाकलापों के सूक्ष्म ब्योरे ,घटनाओं की तार्किकता ,आकस्मिकता तथा सबसे बढ़कर पात्रों की व्यक्तिगत विशेषता को पहचानती अचूक दृष्टि ने मजबूर कर दिया है की एक- एक शब्द ध्यान से पढूं |उसकी गहराई तक जाकर पढूं |may be जितनी गहराई में डूबकर लिखा गया है |
रोद्या (मुख्य किरदार ) का अकेलापन ,खालीपन ,बेतरतीबी ,संवेदनाओं का विश्लेषण अद्भुत है |फिर भी मैं इन सब से किंचित दुरी पर रहना manage कर लेती हूँ क्योकि मेरी परवरिश ,शिक्षा अलग वातावरण में हुए हैं -भारतीय वातावरण में हुए हैं| और यह जानना दिलचस्प है (चाहे किताबो के जरिये ही सही )कि कैसे होते हैं वे लोग जो भारतीय नहीं होते |
२० -११- १३
- तीसरा भाग चल रहा है |अब कुछ interest बनने लगा है |ठंडे ,शांतचित से बैठकर लिखना किसे कहते हैं ,यह कोई देखे |power of observance
- russia में भी दो नामों का चलन है |प्रत्येक पात्र के दो नाम है |
- रोद्या के अकेलेपन की वजह उसका असफल प्रेम भी है |
- रोद्य की बहन का गरिमापूर्ण वर्णन |इंडिया के कंगाल तो ऐसे नहीं देखे -may be -मेरा अनुभव ही क्या है ?-शायद education का असर हो -शायद इसीलिए वहां लाल क्रांति संभव हुई |
२१-११-१३
चौथे भाग पर पहुच गयी |उफ़ !!!!!! रोद्या का तनाव (क्या लेखक ने भी यही तनाव नहीं झेला होगा )
- सपनो का कलात्मक उपयोग किया है | अब तक 3-4 बड़े सपने आ चुके हैं \एक घोड़ी वाला ,एक रोद्य के जन्म स्थान के परिवेश को दिखाता है ,तीसरा क़त्ल करने से पहले नदी के किनारे ,चौथा एक आदमी उसे हत्यारा बुला रहा है
- रोद्य गहन बुद्धिमान तथा विचारशील है |संवेदनशील भी |
- रोद्य के अतिबुधिमान चरित्र के आगे रजुमिखिंन के साधारण पात्र की योजना पाठकों को अति गंभीरता के अटैक के बचने के लिए की गयी लगती है |
- रजुमिखिन को देखते ही मैं समझ गयी थी कि इसका टांका अ०दोत्या के साथ जुड़ेगा (सरसता की योजना )
- देखें जिस खुले सिरे की बात आई है क्या वह अंत में कहीं जाकर खुलेगा भी या एक अति कुशल पुरुष लेखक की दिमागी ऐयाशी निकलेगी जो पाठकों को अपनी मेधा ,प्रतिभा से चकित ,थकित ,आतंकित कर देना चाहता है | .............contd
Thursday, July 7, 2016
कहानी और कहानीपन -4
इसके बाद याद आयी -सुधा अरोरा की 'एक औरत -तीन बटा चार ' ,प्रेमचंद की 'सवा सेर गेंहू ' इत्यादि कहानियां |
ये वे कहानियां थी ,जिन्हें मैंने एक किसी दिन, कहानी के कहानीपन पर विचार करते हुए यादों के कुएं से निकाला था या यह कहना जयादा सही होगा की पानी को छेड़ने पर ये कहानियां अपने आप सतह पर आ गयी थी |ये वे कहानियां थी जिन्हें मैं इग्नोर नहीं कर सकती थी /हूँ , न आज और न कभी कल |क्यों ?इस बारे में बाद में बात करेंगे |
अब चलते है डायरी में लिखी तारीखवार एंट्रीज़ की ओर -कि जबसे मैंने पढे हुए पर टिपण्णी लिखना शुरू किया |
इससे पहले की एक टिपण्णी २४-१० -१३ की भी है पर वह मैं स्किप कर रही हूँ |
क्यों ?
मेरी मर्जी |
७-११-१३
मैत्रेयी पुष्पा की कहानी पढ़ी 'गोमा हंसती है ' |ग्रामीण परिवेश है |साधारण से पात्र |कथ्य भी कुछ नहीं |पर कथनोपकथन (पात्रों के संवाद )विश्वसनीय है | गालियों का प्रयोग विश्वसनीय है |भाषा ठीक है |बाकी ................|साधारण वातावरण ओर साधारण स्थितियों में जन्मे पात्रों के जीवन लक्ष्य कितने साधारण होते है ,यह इस कहानी में देखा जा सकता है |
क्या बात है कि गोमा को किसी का डर नहीं है ?लोकोपवाद का ,घर टूटने का |
१६-११ -१३
(फ्योदोर दोस्तोव्यस्की - बड़ी जल्दी आ गए है |खैर ...
शुरू करने से पहले बता दूँ की इनकी कहानियों की एक किताब मैंने पहले भी पढ़ी थी |शायद 2010 या ११ में |पर उस समय मैं पढ़ती थी |पढ़ कर लिखती नहीं थी |इसलिए उन कहानियों का ब्योरेवार विश्लेषण तो मैं नहीं दे सकती ,पर स्मृति के आधार पर यह जरुर कह सकती हूँ कि उस समय भी मैं इनके लेखन से प्रभावित हुई थी |इनका लेखन हैवी जरुर है ,पर इनके भीतर लेखकीय ईमानदारी बहुत है ,जो इनकी ओर आकर्षित करती है |फॉर एग्जाम्पल - पढने /लिखने का आनंद जीवन के अन्य सजीव आनद (बच्चे को खिलाना ,या मित्र से बतियाना ) से किस्मी तौर पर अलग है इसकी विवेचना शायद फ्योदोर ने ही की है |अन्यथा लेखको की प्रजाति आत्ममुग्ध लोगो की प्रजाति होती है |दो अक्षर पढ़कर ये लोग खुदा के भी काबू के बाहर हो जाते है |
उस संकलन में कई कहानिया थी जो अच्छी लगी थी |क्लासिक लेखन जिसे कहते है ,वह इनकी हरेक रचना में दिखता है |
एक कहानी थी (मैं अपने आप को कहने से रोक नहीं पा रही हूँ )
उसमे आभिजात्य वर्ग के उस पात्र की जैसी दुर्गति दिखाई है ,वह एक एग्जामपल ही है |एक कहानी को शुरू करने से पहले उन्होंने कहानी की टेक्निक के बारे में लिखा है |'सिल्वरी नाइट्स ' कहानी के वातावरण की प्रभावोत्पादकता बेहतरीन है |खैर .... )
ये वे कहानियां थी ,जिन्हें मैंने एक किसी दिन, कहानी के कहानीपन पर विचार करते हुए यादों के कुएं से निकाला था या यह कहना जयादा सही होगा की पानी को छेड़ने पर ये कहानियां अपने आप सतह पर आ गयी थी |ये वे कहानियां थी जिन्हें मैं इग्नोर नहीं कर सकती थी /हूँ , न आज और न कभी कल |क्यों ?इस बारे में बाद में बात करेंगे |
अब चलते है डायरी में लिखी तारीखवार एंट्रीज़ की ओर -कि जबसे मैंने पढे हुए पर टिपण्णी लिखना शुरू किया |
इससे पहले की एक टिपण्णी २४-१० -१३ की भी है पर वह मैं स्किप कर रही हूँ |
क्यों ?
मेरी मर्जी |
७-११-१३
मैत्रेयी पुष्पा की कहानी पढ़ी 'गोमा हंसती है ' |ग्रामीण परिवेश है |साधारण से पात्र |कथ्य भी कुछ नहीं |पर कथनोपकथन (पात्रों के संवाद )विश्वसनीय है | गालियों का प्रयोग विश्वसनीय है |भाषा ठीक है |बाकी ................|साधारण वातावरण ओर साधारण स्थितियों में जन्मे पात्रों के जीवन लक्ष्य कितने साधारण होते है ,यह इस कहानी में देखा जा सकता है |
क्या बात है कि गोमा को किसी का डर नहीं है ?लोकोपवाद का ,घर टूटने का |
१६-११ -१३
(फ्योदोर दोस्तोव्यस्की - बड़ी जल्दी आ गए है |खैर ...
शुरू करने से पहले बता दूँ की इनकी कहानियों की एक किताब मैंने पहले भी पढ़ी थी |शायद 2010 या ११ में |पर उस समय मैं पढ़ती थी |पढ़ कर लिखती नहीं थी |इसलिए उन कहानियों का ब्योरेवार विश्लेषण तो मैं नहीं दे सकती ,पर स्मृति के आधार पर यह जरुर कह सकती हूँ कि उस समय भी मैं इनके लेखन से प्रभावित हुई थी |इनका लेखन हैवी जरुर है ,पर इनके भीतर लेखकीय ईमानदारी बहुत है ,जो इनकी ओर आकर्षित करती है |फॉर एग्जाम्पल - पढने /लिखने का आनंद जीवन के अन्य सजीव आनद (बच्चे को खिलाना ,या मित्र से बतियाना ) से किस्मी तौर पर अलग है इसकी विवेचना शायद फ्योदोर ने ही की है |अन्यथा लेखको की प्रजाति आत्ममुग्ध लोगो की प्रजाति होती है |दो अक्षर पढ़कर ये लोग खुदा के भी काबू के बाहर हो जाते है |
उस संकलन में कई कहानिया थी जो अच्छी लगी थी |क्लासिक लेखन जिसे कहते है ,वह इनकी हरेक रचना में दिखता है |
एक कहानी थी (मैं अपने आप को कहने से रोक नहीं पा रही हूँ )
उसमे आभिजात्य वर्ग के उस पात्र की जैसी दुर्गति दिखाई है ,वह एक एग्जामपल ही है |एक कहानी को शुरू करने से पहले उन्होंने कहानी की टेक्निक के बारे में लिखा है |'सिल्वरी नाइट्स ' कहानी के वातावरण की प्रभावोत्पादकता बेहतरीन है |खैर .... )
कहानी ओर कहानीपन -3
कहानियों के बारे में भी आमजन में अलग-अलग धारणाएं देखने में आती हैं|कभी किसी महान इंसान के जीवन की प्रशंसा करते हुए लोग कहते हैं 'जी इनका जीवन तो एक कहानी है ' | उनका इशारा उस जीवन की शु रुआत,मध्य,अवसान की तार्किकता ,ऊंचाई ,गहराई ,रोचकता ,प्रेरणा की ओर होता है |
तो कभी किसी आदमी के हल्केपन को दिखाने के लिए भी लोग कहते हैं 'जी इसकी बातों का क्या ?इसका तो का म ही कहानी कहना है 'अर्थात कहानियों की झूठी मनघडंत कल्पनाशीलता की लोग निंदा भी करते हैं |
ये दो धारणाएं इस विधा के तत्वों की ओर बड़ा जरुरी इशारा करती हैं |
पहली धारणा कहती है की रोचकता (मनोरन्जन तत्व )की ओर उन्मुखता इन्सानो की स्वाभाविक फितरत है |सपाट सत्य से ज्यादा लोग रंगीन ,हरी-भरी ,रसपूर्ण गलियों में चलना ज्यादा पसंद करते है |
दूसरी धारणा कहती है की सच्चे ,कमेरे लोग (और यह लाजिमी है की वे अवश्य ही प्रभावशाली होंगे |उनकी प्रभावशीलता जगत में ऐसे मानक स्थापित करेगी कि आमजन को और कहानीकारों को भी उनकी पसंद की परवाह करनी ही पड़ेगी |)मनोरंजन के लिए अर्थात केवल मनोरंजन के लिए वे सत्य से समझौता नहीं करते |मनोरजंन की चाह रखते हुए भी वे चाहते हैं कि उन्हें कहानियों (अर्थात सम्पूर्ण साहित्य ही ) से कुछ अलग प्रकार के जीवन सत्य ,स्वभाव सत्य की प्राप्ति हो |
साहित्य में इन दो प्रकार की रुचियों ने साहित्य की श्रेष्टता के मानक स्थापित किये हैं |एक ओर क्लासिक साहित्य है ,दुसरी ओर लोकप्रिय साहित्य है |लोकप्रिय को क्लासिक से कमतर समझा जाता है |
आजकल लोकप्रिय साहित्य को प्रतिष्ठित करने की कवायद ;दरअसल क्योकि सत्ता ही लोक (जनता )के हाथों में चली गयी है तो साहित्य क्यों नहीं ,इसी जरुरत का विस्तार है |
हाँ तो बात चल रही थी कहानी ओर कहानीपन की -
a cup of tea के बाद मुझे एक और कहानी याद आई जो मैंने हिंदुस्तान अख़बार में पढ़ी थी |किसी ईरानी कथाकार की थी | अब तो न कहानी का नाम याद है न लेखक का |बस इतना याद है की वह एक चिडिया के परिवार को आधार बनाकर संयुक्त परिवार के मेलजोलपन को बताती थी\ ठीक थी |अच्छी थी |हलकी थी |(मुझे ज्यादातर हलकी कहानिया ही पसंद आती है ) .............contd
तो कभी किसी आदमी के हल्केपन को दिखाने के लिए भी लोग कहते हैं 'जी इसकी बातों का क्या ?इसका तो का म ही कहानी कहना है 'अर्थात कहानियों की झूठी मनघडंत कल्पनाशीलता की लोग निंदा भी करते हैं |
ये दो धारणाएं इस विधा के तत्वों की ओर बड़ा जरुरी इशारा करती हैं |
पहली धारणा कहती है की रोचकता (मनोरन्जन तत्व )की ओर उन्मुखता इन्सानो की स्वाभाविक फितरत है |सपाट सत्य से ज्यादा लोग रंगीन ,हरी-भरी ,रसपूर्ण गलियों में चलना ज्यादा पसंद करते है |
दूसरी धारणा कहती है की सच्चे ,कमेरे लोग (और यह लाजिमी है की वे अवश्य ही प्रभावशाली होंगे |उनकी प्रभावशीलता जगत में ऐसे मानक स्थापित करेगी कि आमजन को और कहानीकारों को भी उनकी पसंद की परवाह करनी ही पड़ेगी |)मनोरंजन के लिए अर्थात केवल मनोरंजन के लिए वे सत्य से समझौता नहीं करते |मनोरजंन की चाह रखते हुए भी वे चाहते हैं कि उन्हें कहानियों (अर्थात सम्पूर्ण साहित्य ही ) से कुछ अलग प्रकार के जीवन सत्य ,स्वभाव सत्य की प्राप्ति हो |
साहित्य में इन दो प्रकार की रुचियों ने साहित्य की श्रेष्टता के मानक स्थापित किये हैं |एक ओर क्लासिक साहित्य है ,दुसरी ओर लोकप्रिय साहित्य है |लोकप्रिय को क्लासिक से कमतर समझा जाता है |
आजकल लोकप्रिय साहित्य को प्रतिष्ठित करने की कवायद ;दरअसल क्योकि सत्ता ही लोक (जनता )के हाथों में चली गयी है तो साहित्य क्यों नहीं ,इसी जरुरत का विस्तार है |
हाँ तो बात चल रही थी कहानी ओर कहानीपन की -
a cup of tea के बाद मुझे एक और कहानी याद आई जो मैंने हिंदुस्तान अख़बार में पढ़ी थी |किसी ईरानी कथाकार की थी | अब तो न कहानी का नाम याद है न लेखक का |बस इतना याद है की वह एक चिडिया के परिवार को आधार बनाकर संयुक्त परिवार के मेलजोलपन को बताती थी\ ठीक थी |अच्छी थी |हलकी थी |(मुझे ज्यादातर हलकी कहानिया ही पसंद आती है ) .............contd
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