२८-११-१३
स्विद्रिगाईलोव ने आत्महत्या कर ली |
जैसे कई फ़िल्मकार किसी सीन का महत्व दिखाने के लिए उसे कुछ देर तक स्क्रीन पर स्टिल रखते है (eg तारे जमीं पर फिल्म में दर्शील का पानी पर पड़ते हुए रोशनी के टुकड़े को देखना ),वैसे ही दोस ने भी इस भयानक अंत के लिए स्विदरी के उस दिन के क्रियाकलाप ,उसका अकेलापन ,अकेलेपन की भयानकता ,व्यवहार के अजनबीपन को काफी खींचा है |
उपन्यास तो पूरा हो गया और यह रहा लेखा -जोखा -
अपराध और दंड एक विचारात्मक -आलोचनात्मक यथार्थपूर्ण उपन्यास है जिसमे रस्कोलनिकोव (रोद्या ) के माध्यम से इस बात पर विचार किया गया है कि आखिर अपराध है क्या ? और उसका दंड क्या हो ?
जब समाज की बुनावट ऐसी हो जिसमे उपलब्ध साधन कुछ व्यक्तियों के इर्द-गिर्द हो सिमट जाएं ,तब अपराध कि सही व्याख्या क्या हो ?यह उपन्यास जिन बातों को बेहद असरदार ढंग से उठाता है वह हैं -
पर क्या यह संभव है कि सामान्य तर्कशक्ति तथा बुद्धि से युक्त व्यक्ति अपने चारों ओर की तर्कहीनता को नज़रन्दाज़ करके सिर्फ जीवन का वरण करे ? रुसी कहानी यहाँ खत्म होती है |मैं समझती हूँ भारतीय कहानी यहाँ से शुरू होती है | उपर्युक्त प्रश्न का उत्तर है - हाँ |अकेले अपने दम पर महासमुद्र पार करने वाले होते हैं ,परन्तु विरले होते है |भारत की दर्शन परम्परा इस महाप्रशन की गंगोत्री में से निकली है |
उपन्यास के high points हैं जहाँ दोस बेहद सफल हैं -
भाषा बहुत चुस्त है (अनुवाद में भी) सीन-निर्माण ,पात्रों का आना जाना ,सीन बदलाव ,आकस्मिकता ,नाटकीयता रोचकता का निर्माण करती है |
स्विद्रिगाईलोव ने आत्महत्या कर ली |
जैसे कई फ़िल्मकार किसी सीन का महत्व दिखाने के लिए उसे कुछ देर तक स्क्रीन पर स्टिल रखते है (eg तारे जमीं पर फिल्म में दर्शील का पानी पर पड़ते हुए रोशनी के टुकड़े को देखना ),वैसे ही दोस ने भी इस भयानक अंत के लिए स्विदरी के उस दिन के क्रियाकलाप ,उसका अकेलापन ,अकेलेपन की भयानकता ,व्यवहार के अजनबीपन को काफी खींचा है |
उपन्यास तो पूरा हो गया और यह रहा लेखा -जोखा -
अपराध और दंड एक विचारात्मक -आलोचनात्मक यथार्थपूर्ण उपन्यास है जिसमे रस्कोलनिकोव (रोद्या ) के माध्यम से इस बात पर विचार किया गया है कि आखिर अपराध है क्या ? और उसका दंड क्या हो ?
जब समाज की बुनावट ऐसी हो जिसमे उपलब्ध साधन कुछ व्यक्तियों के इर्द-गिर्द हो सिमट जाएं ,तब अपराध कि सही व्याख्या क्या हो ?यह उपन्यास जिन बातों को बेहद असरदार ढंग से उठाता है वह हैं -
- व्यक्ति की साधारणता और असाधारणता (मैंने अपनी लाइफ में कुछ लोग ऐसे देखे है जो स्वाभिमानी थे | जिनके भीतर आग थी ,सम्मान के साथ जीने कि और जिन्होंने इसके लिए कड़ी मेहनत ,अनुशासन ,बुद्धि ,कौशल का उपयोग किया |ऐसे लोग अक्सर विशेष भावनाशील ,संवेदनशील,नाजुक दिल होते है |वे अपने जीवन के रास्ते स्वयं निकलते हैं |उनका जीवन संघर्ष जीवन की परिस्थितिओं के बीच में से निकलता है | शायद ऐसे ही लोगो को असाधारण कहते होंगे | )
- ईश्वर में अनास्था (निष्क्रिय आस्थावाद मनुष्यों को कितना निरीह और भयभीत बना देता है ,इसका प्रमाणिक चारित्रिक चित्रण इस उपन्यास की ऐसी उपलब्धि है ,जिससे यह all time क्लासिक बना ही रहेगा | वह स्थान इससे कोई छीन नहीं सकता है |)
पर क्या यह संभव है कि सामान्य तर्कशक्ति तथा बुद्धि से युक्त व्यक्ति अपने चारों ओर की तर्कहीनता को नज़रन्दाज़ करके सिर्फ जीवन का वरण करे ? रुसी कहानी यहाँ खत्म होती है |मैं समझती हूँ भारतीय कहानी यहाँ से शुरू होती है | उपर्युक्त प्रश्न का उत्तर है - हाँ |अकेले अपने दम पर महासमुद्र पार करने वाले होते हैं ,परन्तु विरले होते है |भारत की दर्शन परम्परा इस महाप्रशन की गंगोत्री में से निकली है |
उपन्यास के high points हैं जहाँ दोस बेहद सफल हैं -
- पोर्फिरी और रोद्या का चोर-पुलिस का मानसिक खेल
- कटरीना द्वारा आयोजित मृत-भोज का वर्णन -वर्ग भेद ,भेद से उत्पन्न स्थितियां ,मानसिकता
- रोद्य का अकेलापन ,मानसिक दशा का सूक्ष्म विवरणात्मक वर्णन ,तनाव ,तनाव का असर ,hallucinations ,अनिश्चित मानसिक अवस्था (अर्थात उपन्यास के शीर्षक दंड की पूरी प्रक्रिया तो वह पहले ही भुगत चूका है |)
- सारा केन्द्रीकरण एकमात्र रोद्या पर कर दिया गया है |वह जो कह दे ,जो कर दे ,जो न कर दे -वही ठीक है |
- रजुमिखिन एक जीवंत पात्र है और कारण समझ में नहीं आता कि क्यों उपन्यासकार ने इस पात्र को विकसित नहीं किया ,मात्र इसलिए कि वह बोद्धिक नहीं था |बल्कि रोद्या के मुकाबले इस पात्र को अधिक प्रभावशाली बनाया जा सकता था ताकि पाठकों के पास पहले से ही अपना ऑप्शन चुनने का मौका रहे |पर रोद्या को अधिक प्रभावशाली दिखाकर पाठकों को मजबूर किया गया कि वे रोद्या की नाकामी को अंत तक झेले |जिस निष्कर्ष तक दोस अंत में पहुंचे है और जो महज ३-४ पैरा में निपटाया गया है वह निष्कर्ष रजुमिखिन के रूप में उपन्यास में पहले से मौजूद था |बस अगर उपन्यासकार का ध्यान उस ओर गया होता तो |तब वे बेहतरीन जीवन स्थितियां रचकर इस उपन्यास को एकांत बौद्धिक होने से बचा सकते थे|अब तो लगता है कि निष्कर्ष बौद्धिक ही रह जाएगा क्योकि खून के आखिरी कतरे तक का तनाव झेल चुकने ,बेकारी ,शारीरिक कमजोरी तथा निकम्मेपन के कारण लगता नहीं कि रोद्या ८ साल की जेल काटकर दोबारा नॉर्मल जीवन जी सकेगा |
- रोद्या और सोन्या साहित्यिक पात्र है ,जिन्हें साहित्यकार अपने मानस में रचते है |वे ही स्त्री -पुरुषों को ऐसा व्यक्तित्व देते है | पुरुष -स्वाभिमानी,बौद्धिक ,विचारवान ,दयालू ,कष्ट्सहिष्णु |स्त्री -कोमल ,लज्जावान ,आंतरिक पवित्रता की दीप्तिवाली ,आभामयी,तेजमयी,प्रेममयी |
भाषा बहुत चुस्त है (अनुवाद में भी) सीन-निर्माण ,पात्रों का आना जाना ,सीन बदलाव ,आकस्मिकता ,नाटकीयता रोचकता का निर्माण करती है |
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