Thursday, July 14, 2016

पॉज -1

मेरी एक बुरी आदत है |सोचा अभी कह दूँ , बाद की बातचीत में ये एंगल भी साइड बाई साइड चलता रहेगा |
.....................
मेरे जन्म से जैन हूँ | इसे संयोग कहिये या एक प्रकार की परम्परा से जुडाव ,कि ,मेरे जीवन में जैनिज़्म का प्रभाव शुरू से रहा है | शुरू से हमारे घर के आसपास स्थानक थी ,तो जैन साधू-साध्वियों से वास्ता रहा |यह प्रयत्नज भी रहा होगा कि बड़ों ने सोचा होगा कि घर स्थानक के आसपास ही लेते हैं ,धार्मिक चर्या के परिपालन में आसानी रहेगी | बीच के कई बार यह क्रम टूटा भी ,कि , कई बार हम दूर भी रहे | (दिल्ली में तो किराए के घर में थे |अब तो अपना है ,दोनों जगह |मायका भी ,ससुराल भी ) पर वह  अधिकतर साल दो साल या अधिक से अधिक 3-4 साल के लिए | फिर वापस संयोग जुड़ जाता था |
शुरू में तो यह साधू-साध्वियों के दर्शन तक सीमित था | जैसे अपने बड़ों के साथ चले गले ,दर्शन करके वापस आ गए |मम्मी कहती है कि तेरे बाबा (गन्नौर में ) तुझे 'अठन्नी दूंगा ' कहकर स्थानक ले जाते थे | उस समय ,समझ तो क्या थी ,पर संत अच्छे लगते थे | खासकर गुरनीजी के यहाँ शाम को भजन सुनते थे  ,तो कई स्तुतियाँ मुझे बचपन में ही याद हो गयी थी |पीतमपुरा (मैं ६ या ७ वी  में होंगी ) में हमने सामायिक के ९ पाठ ,कुछ बोल वगैरह सीखे थे | पर मेरे जीवन में जैनिज़्म का विशेष जुडाव १९९७ में हुआ ,जब सेक्टर -3 में सेठ जी और भगवन जी का चातुर्मास हुआ | उस दौरान गुरूजी के प्रवचनों के माध्यम से अपने धर्म के कई कांसेप्ट से परिचित हुई | भगवन जी की गुरु धारना भी ली  |सीखने की लगन भी जागी | वीर  स्तुति (प्राकृत ) याद की थी |और भी कई बातें थी ............
बाद में शास्त्रों के स्वाध्याय का क्रम चला (जो की आज  भी जारी है )....
इन सब बातों को यहाँ कहने का मकसद ये है कि मैं पाठकों के सामने अपने माइंड का रेफरेन्स बताना चाहती हूँ |
हर एक इंसान का एक रेफरेन्स होता है | मानी जिस पर वो टिका होता है ,जिस पर उसे विशवास होता है | यह कोई व्यक्ति भी हो सकता है ,परिवार भी ,एक व्यवस्था का ढांचा भी |
समय बदलने के साथ ये रेफरेंस बदलते भी रहते हैं |जैसे ब्याह  के अगले दिन से ही एक लड़की यह जान लेती  है (इंडिया में )कि अब ससुराल ही उसका घर है और उसका गुजारा अब यहीं होना है |रेफरेंस चेंज
मेरे जीवन के रेफरेंस  भी बदलते  रहे |
बचपन में मैं दादी -बाबा की ज्यादा सुनती थी ,क्योंकि देखिये ना ,घुमने के साथ साथ पैसा भी मिलता था | तो एक बच्चा क्यों विश्वास नहीं करेगा |
बाद में मुझ पर मेरे पिता का ज्यादा प्रभाव था |दिल्ली का खुला आसमान ,और चौड़ी सडकें ,मैंने देखी  जरुर पर पिता की उंगली पकडे हुए |
फिर जैसे अण्डों में से बच्चे निकलते हैं ,आसमान को देखते हैं ,अपनी आखें मलकाते हैं  ,वैसे ही मैं भी स्कुल -कालेज -अक्षरों की नई -नई दुनिया देखी |नई -नई बातें सीखीं |पर मेरा रेफरेंस हमेशा मेरे पिता ही थे |मेरे कभी ज्यादा दोस्त भी नहीं बने |इस बात को कुछ भी कह लो |मेरे अन्दर हिम्मत नहीं थी या आज में याद करूँ ,तो वे कभी ज्यादा क्रूर नहीं थे | authoritative थे ,पर किसी का व्यक्तित्व कुचल दें ,ऐसे नहीं थे |
पर अक्षरों के कारण एक अलग रेफरेन्स सेंटर था ,जो मेरे अन्दर develop हो रहा था ,या कहूँ ,१८-२० साल की उम्र तक मैं कई रेफरेंसों के जाल में उलझ चुकी थी |सही क्या ? गलत क्या ? इसका मुझे ज्यादा अंदाज नहीं था |...............................
फिर सेठजी मिल गए | उनके पास बैठना ऐसा था कि किसी झील के किनारे आ बैठे हों |उनकी शांत -दांत छवि केवल दर्शन मात्र से सारे संताप हर लेती थी |
आप कहोगे भक्ति है |
मैं कहूँगी 'हाँ भक्ति है |'
तो जीवन में ,गुरु के रूप में एक नए शक्तिशाली रेफरेन्स ने प्रवेश किया |
पर गुरु से मेरी संलग्नता केवल शास्त्रों की आज्ञा लेने और स्वाध्याय में कठिनाई निवारण तक रही |क्योंकि भगवन और सेठजी ,दोनों ही उम्र में तो मेरे दादाजी के समकक्ष बैठते है |अत; पर्सनल प्रॉब्लम कभी पूछी नहीं | कई लोगों से गुरुओं का जुडाव काफी पर्सनल  हो जाता है |(बल्कि ज्यादातर लोग अपनी घरेलु समस्याओं के कारण ही ज्यादा जुड़ते हैं |यह भी हमारे (हमारे क्या ,सभी जगह यही हाल है )समाज का सच है |अस्तु )
अब भगवन जी का तो देवलोक हो चूका हैं ,सेठजी ने तैयारी कर ली  है (उनकी संलेखना चल रही है |गोहाना जैन स्थानक में ) तो जीवन किस पर टिका है ?
अब जीवन गुरु के नाम पर टिका है |तुलसी ने लिखा है -राम से भी बढ़कर राम का नाम है |एक बार मैंने भगवन से सवाल पूछ लिया था (जी हाँ ,मूर्खताएं मैंने कम नहीं की हैं ) तो वे हंसकर बोले ,गुरु तो वही रहेगा |आज याद करती हूँ कि कितनी गहरी बात थी |
और टिका है शास्त्र स्वाध्याय पर |मुझे जैन शास्त्रों पर अगाध श्रद्धा है |इतनी बुद्धि तो कहाँ है की सभी समझ लूँ पर फिर भी कोशिश करने में तो हर्ज नहीं | ..................contd    
   

No comments:

Post a Comment