Sunday, July 17, 2016

कहानीपन -6

25-3-14
सविता पाठक की हिस्टीरिया ठीक थी |
फलाना -ढिमकाना   की आलू -चालू  bull shit .
ढिमकाना  फलाना  की  चालू आलू bull shit .
............ bull shit .
इसके बाद ऐसा हुआ की मैंने कम ज्ञात या अज्ञात  लेखकों की कहानियों पर हाथ लगाना ही छोड़ दिया |पता नहीं क्या बबाल निकल आएगा |इसके बाद अधिकतर  मैं रेफरेन्स के आधार पर ही पढने लगी |जैसे फेसबुक पर किसी लेखक की प्रशंसा देखी या कुछ इसी तरह |
२-५-१४
मार्केज की कहानी mamma's funeral पढ़ी |अच्छी लगी |ये तरीका है सही कहानियां कहने का |जीवन के भीतर की गन्दगी को ऐसे छांट कर रख देते हैं |
इनकी गाँव वाली (अफवाह ) कहानी सो सो थी |
(मार्केज पर कई टिपण्णी आगे भी हैं |चलो इन्हें आगे ही देखेंगे )
२-७-१४
मुक्तिबोध की तीन  कहानियां पढ़ी -काठ का सपना ,जंक्शन और क्लाड इथरली |ठीक ही थीं |जो कविताओं में लिखते हैं ,वही कहानियों में घड दिया है |आदर्शवादी आत्मा की बेचैनी |दार्शनिक चिंताओं की लेखकीय परिणिति |मजा नी आया |
१४-७- १४
इस्मत चुगताई की कई कहानियां पढ़ी |लिहाफ ,अंग्रेजों भारत छोडो ,जड़ें ,चौथी का जोड़ा |आजादी के आसपास मुस्लिम समाज की दास्तानें कहने के ढंग में आत्मीयता है | कहानियों में सब कुछ है | मार्मिकता ,हंसी-चुहल ,व्यंग्य ,तठस्थता  ,घटनाओं की डिटेलिंग |
२७-७ १४
रबीन्द्रनाथ टैगोर का गोरा पढना शुरू किया है | ७ भाग पढ़ लिए है |२ भाग तक तो खूब इम्प्रेस हुई थी ,पर तीसरे तक आते आते इसका plot कुछ कुछ jane austen के pride and prejudice से मिलता जुलता सा लगा |खैर
भारतीयता पर विचार गहन तो बहुत है ,पर देखो | आगे क्या ?
चरित्रांकन की समझ अच्छी है |एक दम ऐसी कि बिलकुल तीर भेदी नज़र की तरह सारी  असलियत खोल कर रख देती है |बरसात ,बरसाती आकाश ,बुँदे ,उस मौसम का गीलापन अच्छा व्यंजित किया है | 

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