जैन शास्त्रों के विषय ,आजकल की साइंस की भांति ,टेक्नीकल ज्यादा हैं | जैसे बाहर की दुनिया (पाठक गौर करें इस शब्दावली पर ) में धर्म के खिलाफ जो आवाजें सुनाई देती हैं ,उनमे प्रमुख रूप से यह बात होती है की औरतों के दमन ,जाति व्यवस्था आदि को सुदृढ़ करने में धार्मिक शास्त्रों की बहुत भूमिका है | किन्ही विशेष धार्मिक प्रतीकों के पीछे लोगों का उन्माद और पागलपन कोई इग्नोर करने वाली बातें तो नहीं हैं |ये बातें सच ही होंगी |
जैनी तो ,हाल-फ़िलहाल तक ,इन बीमारीओं से(थैंक गॉड )बचे हुए हैं |यहाँ तो हमने किसी गुरु के मुख से स्त्री विरोधी या दलित विरोधी बातें नहीं सुनी |हाँ अनुशासित करने की भाषा अवश्य सुनी है |खैर
लेकिन सम्प्रदायवाद इनमे भी कम नहीं ,पर ये बेचारे आपस में उलझ कर ही अपनी गर्मी का शमन कर लेते हैं |
जैन शास्त्रों के विषय ,मुख्यत ;,चार अनुयोगों में विभाजित है |चरणानुयोग ,करणानुयोग ,कथानुयोग और गणितानुयोग |ये समझ लीजिये कि सारी हिस्ट्री ,जिओग्राफी ,बॉटनी ,फिजिक्स ,साहित्य ,कला ,भाषा विज्ञान इनमे समाया है |
इसलिए इन शास्त्रों का अध्ययन मेरे लिए वैसा ही है ,जैसे मैं अन्य लेखकों की किताबें पढ़ती हूँ | शास्त्र भी किताबें ही तो हैं |
बस एक फर्क है |कि इनमे लिखी बातों की मुझे श्रद्धा है | ऐसा नहीं कि मुझे हर बात पढ़ते ही समझ में आ जाती है या मुझे कोई बात गलत नहीं लगती पर जैन शास्त्रों में लिखी बातों को मैं काटती नहीं हूँ |मैं यही समझती हूँ कि हो सकता है मुझे अभी समझ नहीं आ रही हो |सोचती रहती हूँ ,गुनती रहती हूँ |कभी मौका लगता है तो किसी गुरु के यहाँ शंका निवारण कर लेती हूँ |
इनके अध्ययन से ही चीजों को ग्रहण करने का मेरा एक रेफरेंस बन गया है |इनमे जो भी विषय हैं -गति ,
जीव, जीव का लक्षण ,योग ,उपयोग ,कर्म ,काल इत्यादि -उन विषयों के आधार पर ही मेरी थॉट प्रोसेस काम करती है |
फॉर एग्जाम्पल -अभी दोस का जिक्र आया था ,तो उनके उपन्यास में मैंने हिसाब लगाया कि (तारीख वही है- २८-११-१३ )सत्य (जो मेरे रेफरेन्स के मुताबिक जैन शास्त्रों में वर्णित सत्य है ) और काव्य सत्य की खाई को यह उपन्यास इस बिंदु पर तो पूरा पाट देता है कि व्यक्ति के कर्मों का कर्ता व्यक्ति स्वयं है और वही भोक्ता भी ,ईश्वर नहीं है |(ये सब लिखते हुए मुझे कितनी हंसी आ रही है ,बता नहीं सकती ) बेहद तार्किक ,विचारोत्तेजक ढंग से उपन्यास सामजिक ताने-बाने की क्रूर स्थितियों में फंसे ईश्वर भीरु लोगो की बेचारगी और निष्क्रिय आस्था की व्यर्थता तथा inevitable अंत को सामने रखता है कि एक बार तो दृढ विश्वासी का विशवास भी हिल जाए (गौर करना इस बात में एक रचना के उद्देश्य और इम्पैक्ट की बात आ गयी है ) इस बिंदु पर यह एक पुरुष लेखक की दिमागी ऐयाशी नहीं है ,बल्कि सच्चाई से टकराने की एक ईमानदार कोशिश है |हाँ ,निष्कर्ष से असहमति हो सकती है |(टिपण्णी क्लोज )
जैन दर्शन भी ईश्वर के अस्तित्व को उस तरह नहीं मानता ,कि वह कहीं समुद्र में लेटा है और लक्ष्मीजी उनके पैर दबा रही हैं एटसेट्रा |
अब ज़रा इस बात को रोद्या की मां के नजरिये से देखें |अगर उसका ये विश्वास है की एक दिन सब ठीक हो जाएगा ,पर कुछ ठीक हुआ नहीं तो (उसके विशवास के मुताबिक )इस बात को ऐसे भी तो कह सकते हैं कि अगर रोद्या की नौकरी लग जाती तब तो सब कुछ ठीक हो ही जाना था |पर लड़का ईश्वर का द्वेषी निकला और इसी बात का दंड उन्होंने भुगता |
तो सत्य का निर्णय कैसे हो ?
रोद्य का विश्वास ठीक है या उसकी मां का |तेरा सत्य सही है या मेरा |
पर कोई सत्य तो ऐसा होगा जो तेरे -मेरे मानने से नहीं ,बल्कि सत्य होने से सत्य है -उसे कोई माने या नहीं |वह बदलता नहीं है |
जैन दर्शन में या किसी भी किताब में ,मैं इसी सत्य की खोज करती हूँ |
आप कहोगे कि यह तो सरासर गलत है |अपनी दार्शनिक मान्यताओं को साहित्यिक आलोचना में आरोपित करना तो पूर्वग्रह हुआ |
नहीं ऐसा नहीं है |..contd
जैनी तो ,हाल-फ़िलहाल तक ,इन बीमारीओं से(थैंक गॉड )बचे हुए हैं |यहाँ तो हमने किसी गुरु के मुख से स्त्री विरोधी या दलित विरोधी बातें नहीं सुनी |हाँ अनुशासित करने की भाषा अवश्य सुनी है |खैर
लेकिन सम्प्रदायवाद इनमे भी कम नहीं ,पर ये बेचारे आपस में उलझ कर ही अपनी गर्मी का शमन कर लेते हैं |
जैन शास्त्रों के विषय ,मुख्यत ;,चार अनुयोगों में विभाजित है |चरणानुयोग ,करणानुयोग ,कथानुयोग और गणितानुयोग |ये समझ लीजिये कि सारी हिस्ट्री ,जिओग्राफी ,बॉटनी ,फिजिक्स ,साहित्य ,कला ,भाषा विज्ञान इनमे समाया है |
इसलिए इन शास्त्रों का अध्ययन मेरे लिए वैसा ही है ,जैसे मैं अन्य लेखकों की किताबें पढ़ती हूँ | शास्त्र भी किताबें ही तो हैं |
बस एक फर्क है |कि इनमे लिखी बातों की मुझे श्रद्धा है | ऐसा नहीं कि मुझे हर बात पढ़ते ही समझ में आ जाती है या मुझे कोई बात गलत नहीं लगती पर जैन शास्त्रों में लिखी बातों को मैं काटती नहीं हूँ |मैं यही समझती हूँ कि हो सकता है मुझे अभी समझ नहीं आ रही हो |सोचती रहती हूँ ,गुनती रहती हूँ |कभी मौका लगता है तो किसी गुरु के यहाँ शंका निवारण कर लेती हूँ |
इनके अध्ययन से ही चीजों को ग्रहण करने का मेरा एक रेफरेंस बन गया है |इनमे जो भी विषय हैं -गति ,
जीव, जीव का लक्षण ,योग ,उपयोग ,कर्म ,काल इत्यादि -उन विषयों के आधार पर ही मेरी थॉट प्रोसेस काम करती है |
फॉर एग्जाम्पल -अभी दोस का जिक्र आया था ,तो उनके उपन्यास में मैंने हिसाब लगाया कि (तारीख वही है- २८-११-१३ )सत्य (जो मेरे रेफरेन्स के मुताबिक जैन शास्त्रों में वर्णित सत्य है ) और काव्य सत्य की खाई को यह उपन्यास इस बिंदु पर तो पूरा पाट देता है कि व्यक्ति के कर्मों का कर्ता व्यक्ति स्वयं है और वही भोक्ता भी ,ईश्वर नहीं है |(ये सब लिखते हुए मुझे कितनी हंसी आ रही है ,बता नहीं सकती ) बेहद तार्किक ,विचारोत्तेजक ढंग से उपन्यास सामजिक ताने-बाने की क्रूर स्थितियों में फंसे ईश्वर भीरु लोगो की बेचारगी और निष्क्रिय आस्था की व्यर्थता तथा inevitable अंत को सामने रखता है कि एक बार तो दृढ विश्वासी का विशवास भी हिल जाए (गौर करना इस बात में एक रचना के उद्देश्य और इम्पैक्ट की बात आ गयी है ) इस बिंदु पर यह एक पुरुष लेखक की दिमागी ऐयाशी नहीं है ,बल्कि सच्चाई से टकराने की एक ईमानदार कोशिश है |हाँ ,निष्कर्ष से असहमति हो सकती है |(टिपण्णी क्लोज )
जैन दर्शन भी ईश्वर के अस्तित्व को उस तरह नहीं मानता ,कि वह कहीं समुद्र में लेटा है और लक्ष्मीजी उनके पैर दबा रही हैं एटसेट्रा |
अब ज़रा इस बात को रोद्या की मां के नजरिये से देखें |अगर उसका ये विश्वास है की एक दिन सब ठीक हो जाएगा ,पर कुछ ठीक हुआ नहीं तो (उसके विशवास के मुताबिक )इस बात को ऐसे भी तो कह सकते हैं कि अगर रोद्या की नौकरी लग जाती तब तो सब कुछ ठीक हो ही जाना था |पर लड़का ईश्वर का द्वेषी निकला और इसी बात का दंड उन्होंने भुगता |
तो सत्य का निर्णय कैसे हो ?
रोद्य का विश्वास ठीक है या उसकी मां का |तेरा सत्य सही है या मेरा |
पर कोई सत्य तो ऐसा होगा जो तेरे -मेरे मानने से नहीं ,बल्कि सत्य होने से सत्य है -उसे कोई माने या नहीं |वह बदलता नहीं है |
जैन दर्शन में या किसी भी किताब में ,मैं इसी सत्य की खोज करती हूँ |
आप कहोगे कि यह तो सरासर गलत है |अपनी दार्शनिक मान्यताओं को साहित्यिक आलोचना में आरोपित करना तो पूर्वग्रह हुआ |
नहीं ऐसा नहीं है |..contd
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