६-१२-१३
निराला की कहानी लिली और व्यंग्य श्रीमती गजानंद शास्त्रानी पढ़े |कहानी ठीक थी (उस समय के भारतीय परिवार के सन्दर्भ में ),व्यंग्य भी ठीक था |बाल कहानियां ,ऐसा लगा कि श्रुत परम्परा में पहले से हैं |
(बीच की कई टिपण्णी स्किप कर रही हूँ ,वे कहानियों पर हैं भी नहीं | जस्ट यह बताने के लिए की पढने में इतना गैप नहीं आता | )
4-3-१४
आज एक कहानी पढ़ी -मनोज पांडे की ''पुरोहित जिसने मछलियाँ पाली ''| आदि से अंत तक रामदत्त की जिंदगी का वर्णन ही कर दिया |खासी औपन्यासिक सी थी |अच्छी नहीं लगी |जी ख़राब हो गया |पर वो शायद कथ्य के चुनाव के कारण (इस कहानी में कुछ पोर्शन चाइल्ड अब्यूस पर है ) था |अंत बिलकुल बेमजा था | idealistic .कुनेन की गोली खिलाने के बाद कोई जलेबी कैसे दिखा सकता है ?
पर यह है की मनोज की भाषा एकदम सहज है |तुरंत समझ में आने वाली |कोई टेक्निकेलिटी नहीं |स्थितियों की रचना भी सहज है |स्वाभाविक सी | और कहते -कहते बीच में जिंदगी के फलसफे पर जो एकाध जगह गंभीर हो जाते हैं ,सो वह भी अच्छा ही लगता है |
५-3-१४
मनोज की एक कहानी और पढ़ी ''वह बुढा जो शायद कभी था ही नहीं ''|एक और पढ़ी थी पहले -लड़की की हंसी |शीर्षक लम्बे रखते हैं |
यह कहानी ठीक थी |ईश्वर सम्बन्धी मान्यताओं ,अंधविश्वासों ,सम्प्रदायों के खोखलेपन को प्रस्तुत
करती है |ठीक थी |मनोज की चिंताएं और प्रस्तुतीकरण का ढंग अच्छा है |
पत्नी और छुट्टी का दिन -यह कहानी भी मनोज की थी | कहानी में कुछ भी नहीं |बल्कि कहिये कथ्य या कथानक तो है ही नहीं ;पर फिर भी पढने लायक है क्योकि नायक की मनस्थितियों और भाषा से पाठक (पुरुष पाठक रिलेट कर सकता है )
नोट ;यह टिपण्णी बताती हैं की कई बार भाषा या कहने के ढंग से भी पाठक कहानी का रस ले लेता है |
१६-3-१४
अमरकांत की पोखरा पढ़ी |समझ ही नहीं आई |कहानीपन क्या था ?
निराला की कहानी लिली और व्यंग्य श्रीमती गजानंद शास्त्रानी पढ़े |कहानी ठीक थी (उस समय के भारतीय परिवार के सन्दर्भ में ),व्यंग्य भी ठीक था |बाल कहानियां ,ऐसा लगा कि श्रुत परम्परा में पहले से हैं |
(बीच की कई टिपण्णी स्किप कर रही हूँ ,वे कहानियों पर हैं भी नहीं | जस्ट यह बताने के लिए की पढने में इतना गैप नहीं आता | )
4-3-१४
आज एक कहानी पढ़ी -मनोज पांडे की ''पुरोहित जिसने मछलियाँ पाली ''| आदि से अंत तक रामदत्त की जिंदगी का वर्णन ही कर दिया |खासी औपन्यासिक सी थी |अच्छी नहीं लगी |जी ख़राब हो गया |पर वो शायद कथ्य के चुनाव के कारण (इस कहानी में कुछ पोर्शन चाइल्ड अब्यूस पर है ) था |अंत बिलकुल बेमजा था | idealistic .कुनेन की गोली खिलाने के बाद कोई जलेबी कैसे दिखा सकता है ?
पर यह है की मनोज की भाषा एकदम सहज है |तुरंत समझ में आने वाली |कोई टेक्निकेलिटी नहीं |स्थितियों की रचना भी सहज है |स्वाभाविक सी | और कहते -कहते बीच में जिंदगी के फलसफे पर जो एकाध जगह गंभीर हो जाते हैं ,सो वह भी अच्छा ही लगता है |
५-3-१४
मनोज की एक कहानी और पढ़ी ''वह बुढा जो शायद कभी था ही नहीं ''|एक और पढ़ी थी पहले -लड़की की हंसी |शीर्षक लम्बे रखते हैं |
यह कहानी ठीक थी |ईश्वर सम्बन्धी मान्यताओं ,अंधविश्वासों ,सम्प्रदायों के खोखलेपन को प्रस्तुत
करती है |ठीक थी |मनोज की चिंताएं और प्रस्तुतीकरण का ढंग अच्छा है |
पत्नी और छुट्टी का दिन -यह कहानी भी मनोज की थी | कहानी में कुछ भी नहीं |बल्कि कहिये कथ्य या कथानक तो है ही नहीं ;पर फिर भी पढने लायक है क्योकि नायक की मनस्थितियों और भाषा से पाठक (पुरुष पाठक रिलेट कर सकता है )
नोट ;यह टिपण्णी बताती हैं की कई बार भाषा या कहने के ढंग से भी पाठक कहानी का रस ले लेता है |
१६-3-१४
अमरकांत की पोखरा पढ़ी |समझ ही नहीं आई |कहानीपन क्या था ?
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