Monday, July 11, 2016

पोस्ट कमेंट्स -अपराध और दंड

यह तो थी  इस उपन्यास पर लिखी कुछ अनौपचारिक टिपण्णीयां ;
कुछ अन्य  विचारणीय बिंदु ;
यह आलोचना कि रोद्या ,सोन्या जैसे पात्र साहित्यिक हैं ,सही होते हुए भी ;इनमे एक अन्य विचारणीय पक्ष और भी है |लोग कहते हैं कि रचनाओं में लेखकों का अपना जीवन होता है | लेखक क्यूँ लिखता हैं ? इस प्रश्न की  भी अलग अलग थियोरियां हैं |कोई कहते हैं (सुधा अरोरा )कि उन्हें रिलीफ मिलता है ,कोई कहते हैं (सआदत हसन मंटो )कि रोटी के लिए लिखता हूँ | अभिव्यक्ति वाली थ्योरी तो है ही |
इन थिओरियों से अलग ज़रा इस बात पर भी गौर करें कि किसी कहानी में एक पक्षकार तो होता ही है |अर्थात कोई भी कहानी किसी एक नजरिये से पेश की  जाती है |यह नजरिया लेखक का ही होगा | उस नजरिये का वाहक पात्र स्वयं उस कहानी में मौजूद हो भी सकता है ,नहीं भी |पर उसे पहचानना मुश्किल नहीं होता |
इस उपन्यास में रोद्या लेखक के पक्ष का वाहक पात्र है |(यह तो स्पष्ट है ही )
अब रोद्या का जीवन कितना स्वयं लेखक के जीवन से मिलता -जुलता है ,ऐसे तथ्य तो अन्य साक्ष्यों से जुटाए जा सकते है |
पर एक बात है -दोस का समय रूस में मार्क्सवादी चिंतन के उभार का समय था ,जिसके फलस्वरूप वहां लाल क्रांति भी हुई |अर्थात गहरी उथल-पुथल का समय |एक लेखक के लिए अपने समय की हलचलों को इग्नोर करना संभव नहीं होता |बल्कि मैं कहूँगी कि लेखन के क्षेत्र में कालजयी रचनाओं के तैयार होने का सबसे उत्तंम समय यही होता है |
लेखन कार्य मूलतः चिन्तनात्मक कार्य है |यह एनर्जी अलग प्रकार की  होती है | इसका सम्बन्ध व्यक्ति की  विचार शक्ति से है |विचारने का कार्य अधिकांश sitting का काम है ,जो की सामान्य पाठकों को बेहद उबाऊ ,अक्रियाशील ,बोरिंग सा लगता है |परन्तु इस कार्य का भी अपना महत्व होता  है |
दूसरी बात है कि - किसी भी प्रकार की  एनर्जी श्रेष्ट या हीन नहीं होती | यह तो उस पर्टिकुलर समय की बात है कि उस युग में कौन सी एनर्जी को सम्मानित किया जाता है |eg आजकल गंभीर ज्ञान के विद्वानों की उतनी पूछ नहीं है |
दोस का समय गंभीर चिंतकों के सम्मान का युग था | स्वयं दोस ने अपनी रचनाओं में विद्वानों के प्रति गहरा  सम्मान दर्शाया है |उपन्यास में रोद्या की माँ ,उसकी सतत बेकारी के बावजूद ,उसकी क्षमता पर कभी संदेह नहीं करती |(हमारे यहाँ ऐसा नहीं है | यहाँ अगर किसी  उच्च शिक्षित को नौकरी न मिले तो घरवाले समझेंगे ,ये ही नालायक है |)
रोद्या की  नाकामी दोस की नाकामी हो सकती है | हो सकता है कि उन्होंने किसी दुसरे प्रकार का जीवन जीना चाहा हो  |परन्तु रोदया के माध्यम से वे  जो स्थितियों की इतनी बारीकी तक पहुंचे हैं और समस्या को इतनी गहराई तक जाना है कि इन्ही सब चीजों को समझने में एक साहित्यकार (अथवा कहें कि एक संवेदनशील व्यक्ति ,साहित्यकार तो वह बाद में बनता है  ) की उम्र गुज़र जाती है समाधान तो कहाँ से लायें ? समस्या की  पेचीदगी को सुलझा दिया ,यही क्या कम है |
ऐसी कहानियों को मैं तीव्र भावावेग (आलोचनात्मक )वाली 'बंद '(कि लेखक एक प्रकार के भावावेग में बंद है ,उससे बाहर निकलने के लिए छटपटा रहा है )कहानियां कहती हूँ |



No comments:

Post a Comment