Tuesday, September 13, 2016

कहानीपन -16

टिप्पणियों का सिलसिला अब ख़त्म होने को है |दो -चार और हैं ,इन्हें भी निपटा लेते हैं |
27 -11 -14
मृणाल पाण्डेय की कहानियों की किताब अकेडमी की लाइब्रेरी से लाई थी |अब तक एक पसंद आयी -शरण्य की ओर |बहुत क्लिष्ट लिखती हैं |
14-1 -15

  • मृदुला गर्ग को पढ़ा |ठीक था |लाइट हैं |
  • अशोक सकेसरिया की कहानी मोटर पार्ट्स का एजेंट पढ़ी ,अच्छी लगी |
  • विनोद शुक्ल की कहानी रुपये अच्छी लगी |
  • मृणाल की और भी कहानियां अच्छी लगीं |सुर् जी  ,रूबी .........बहुत क्लिष्ट हैं |
6-2-15
विनोद शुक्ल की कहानियों की किताब महाविद्यालय लायी थी |उनका स्टाइल सरल ,satirical तथा जिंदगी के भीतर गुंथा हुआ सा है |जिंदगी के ब्योरे देते -देते read between the lines की गुंजाईश बहुत है |कहे हुए से अधिक अनकहा असरदार है |
12 -3 -15
अकेडमी में शर्मीला वोहरा जालान की कहानी फिनिक्स पढ़ी |अच्छी लगी |
8 -7 -15
फेसबुक पर प्रभात जी की वाल पर शाह की कंजरी पढ़ी तो अमृता के सधेपन और भाषा ने तुरंत खींच लिया |नेट पर और ढूंढा तो गद्य कोष में कई रचनाएँ दिखीं |रसीदी टिकट इत्यादि |साहिर के साथ उनके प्रेम की बातें ,कविताएँ इत्यादि |
अब उनके निबंधों और कहानियों की एक किताब लाई |तो अब पूरा पढ़ा है |इनके भीतर एक आग सी है |अमृता के युग में आम जनों का जीवन देखे तो बड़ी बेचारगी ,एक चक्कर में गति करते हुए लोगों का जड़ जीवन है |उनका युग आज़ादी की आग से धधकता हुआ युग था ,पर आश्चर्य है कि उन्होंने अपना रास्ता व्यक्तिगत स्वतंत्रता का चुना |वे नारी की स्वतंत्रता और प्रेम के अधिकार की बात अपने साहित्य में कहती हैं |
in between comments -एक जगह अमृता ने कहा है की मेरे  साहित्य का हश्र वही होगा जो नाजायज बच्चों का होता है | क्यों ?
ऐसा क्यों कहा होगा अमृता ने |
अगर हम उनके लेखन और उन पर लिखे हुए लेखन को पढ़ें (बल्कि  जरुरत ही नहीं ,अमृता ने खुद ऐसे हवाले अपनी आत्मकथा में दे दिए हैं ) ,तो उनकी इस बात के मर्म को समझना मुश्किल नहीं है |उन्होंने लगभग 25 साल के बाद अपनी शादी तोड़ी |जिसे चाहा ,उसका साथ भी नहीं मिला |पर उनमें एक  आग थी |समाज की सड़ी -गली रिवायतें न मानने की आग |
पर इसकी कीमत चुकानी पड़ती है |अमृता की आग भी आखिर विस्फोटक होकर उसे ही लील गयी ,और उसका जीवन एक राख बन  कर रह गया |पर अमृता हारी नहीं |वह चलती रही |और चलने की निरंतरता ने आखिर उसे इल्मियत (ज्ञान )के महत्त्व से परिचित कराया |उसकी आवाज़ स्वतंत्रता की ,विद्रोह के साहस  की आवाज़ बन  गयी |अपनी लकीर ,अपनी किस्मत खुद लिखने वाली |
पर्सनली कहूँ तो मुझे इनके विषयों से असहमति हो सकती है ,पर इनका लिटरेरी टेस्ट बहुत बढ़िया है | i really liked her style and taste .
30 -7-15
चन्द्रकिरण सोनेरेक्सा की कहानियां एक चक्र में घूमते लोगों की कहानियां हैं |बचपन ,जवानी ,शादी ,काम -धंधा ,बच्चे ,मरण का चक्र |
इनके पात्र सवाल नहीं करते |अपने यथार्थ को देखते नहीं ,बस ,अनवरत परिस्थितिओं के अनुरूप हिचकोले खाते हुए, बहते चले जाते हैं ;छीजते ,टूटते ,बूढ़े होते ,ख़त्म होते चले जाते हैं |
इनकी कहानियों का सबसे विलक्षण तत्व है -इनकी भाषा |
23-9-15
विमल पाण्डेय की कहानी उत्तर प्रदेश की खिड़की पढ़ी |अच्छी थी |नायक की तीन दुनियाएं है -एक घर की ,एक वर्कप्लेस की ,एक उसके प्यार की |इन दुनियां के कांफ्लिक्ट्स की |फलक बहुत बड़ा रखा है |खासकर राजनीति को जबरदस्ती घुसेड़ा है |हो सकता है ,यह भाव हो कि हमारी दुर्दशा का कारण राजनीति है |भाषा अच्छी थी |satirical ,hilarious ,एकदम समझ में आने वाली |
शीषक खासा व्यंजक बन  गया है | उत्तर प्रदेश की झांकी (अर्थात खिड़की )दिखाती एक उम्दा कहानी |
हरे प्रकाश उपाध्याय की नाच पढ़ी |कम शब्दों में एक पर्टिकुलर टाइप के लोगों की पर्टिकुलर टाइप  की मानसिकता को अच्छा उकेरा है |

 

Monday, September 12, 2016

कहानीपन -15

9-10-14
एलिस मुनरो की कहानियाँ पढ़ी |
red dress -शीर्षक का औचित्य तो मुझे समझ नहीं आया |क्योंकि कहानी की सेंट्रल घटना तो वह पार्टी है |खैर ..
मुनरो का कहानी कहने का तरीका काफी अलग है |एक तो अधिकतर फर्स्ट पर्सन नेरैटिव स्टाइल में लिखती हैं तो कहानी की फॉर्म में यकायक चुस्ती आ जाती है |परिवेश ,पात्र ,चरित्र की रुपरेखा की डिटेलिंग  पर ज्यादा (शब्द ) खर्च नहीं करना पड़ता |
दुसरे मुनरो का स्टाइल कुछ ज्यादा ही चुस्त है |घटनाओं का ब्यौरा देने ,डिटेल्स के प्रभाव , पर , तुरंत उनसे बाहर आकर एक डिसपैशनेट कमेन्ट करना उनका स्टाइल है |

  • she does not take a second to reach to conclusion .
  • फिर कहानी का एक एक वाक्य का उपयोग सार्थक बात कहने के लिए करती हैं |as if something is boiling inside her .
  • particularly इस कहानी में मुझे वह प्वाइंट सबसे interesting लगा ,जब वह लड़की (नायिका के स्कुल में फ्रेशेर्स पार्टी है ,इसके लिए वह अपनी मां  से जिद करके एक लाल ड्रेस बनवा कर पहन कर जाती है ) पार्टी में किसी लड़के के साथ नृत्य कर पाने की इच्छा को रोके खड़ी थी और ऑलमोस्ट सिक फील कर रही थी (क्योंकि कोई भी उस पर ध्यान नहीं दे रहा था ,एक किशोर मन में उठने वाली भावनाओं की तेजी  )कि तभी उसे किसी दूसरी लड़की ने बुला लिया और एक अलग जगह जाकर उन्होंने सिगरेट पी और तत्काल वे उस बॉल रूम के प्रभावों के घरे से बाहर आ गए |(इच्छा के भीतर होना और बाहर आना का अद्भुत एग्ज़ाम्प्ल है )
  • i guess munro has had been independent right through early age .
  • इन्हें भी नोबेल मिला है |और ये देखना कितना दिलचस्प है न , की सर्जनात्मकता की कोई सीमा ,कोई परिभाषा नहीं होती |आसमान जैसी अनंतता में उड़ना भी  सर्जनात्मकता है ,और किसी बात की गूढता को हौले से खोलना भी  सर्जनात्मकता है |
17-10 -14
मार्क ट्वेन की कहानी भाग्य पढ़ी |अच्छी लगी |दोबारा पढूंगी |
30-10-14
आज  मुनरो की दूसरी कहानी  पढ़ी -पेशन |ठीक थी  |उनके यहाँ जब लड़कियां जवानी में ही इंडिपेंडेंट रहती हैं ,तो वे अपनी शादी ,प्यार ,साथी के बारे में स्वयं सोचें ,जाने ,प्रयोग करें ,आगे बढ़ें ;तो इस तरह की कहानियां निकलना unexpected नहीं है |लेकिन अच्छा है ,लेखिका का अपने  दिल को जानना और उसे बोल्डली कहने की हिम्मत रखना |कहानी में कनाडा की लाइफ ,डिनर्स ,बुक्स ,गॉसिप्स अच्छे दिखाए हैं |i like munro's style very much .it is very fast ,decision taking .very confident characters ,speaking and knowing one's
mind exactly .
कहानी में नील की मृत्यु हो गयी और मौरी को भी ग्रेस ने रिजेक्ट कर दिया ,पर फिर भी ग्रेस के अकेले हो जाने की चिंता पाठक को नहीं सताती क्योंकि ग्रेस जैसी इंडिपेंडेंट ,thoughtful और searching-true-love- in -her-life -girl  के लिए पाठक को विश्वास है कि यह अपना कुछ न कुछ कर ही लेगी |यहाँ ,इंडिया , जैसी बेचारगी का ठप्पा  नहीं लगेगा
|इस कहानी में ग्रेस का प्यार को जानना ,नील का केरेक्टर इतना highlighting है कि इसके आगे अंत कुछ लगता ही नहीं |
31-10 -14
इनकी एक और कहानी पढ़ी -deep holes |समझ नहीं आई |जब २-२ ,3-3, शादियाँ आम हो तो उनके बीच क्या इंटिमेसी बचेगी |पर यह सब तो अब इंडिया में भी हो रहा है |

Sunday, September 11, 2016

कहानीपन -14

22-9 -14
आज सुनीता जैन की आत्मकथा पढ़ी -शब्द्काया |पढने का चाव इस प्रकार बन गया की सुधा अरोरा के किसी इंटरव्यू में किन्ही सुनीता का जिक्र आया था |अब वे जैन थी या नहीं ,इसी कन्फ्यूज़न में पढ़ गयी |बाद में दोबारा देखा तो वे सुनीता देशपांडे निकली |खैर  ...
सुनीता जैन को पढना  भी बुरा नहीं रहा |एक तो जैनियों की हिंदी साहित्य में उपस्थिति की वैसे भी उत्सुकता रहती है ,फिर कहानी के पहले भाग की भाषा सहज लगी तो पढ़ती ही चली गयी |
लेखिका ने अपने संघर्ष को साफगोई से बयान किया है |विशेषकर इनका अपने कालेज की दो अध्यापिकाओं से आकर्षण वाला भाग मुझे ज्यादा अच्छा लगा |अपने जीवन में मीनू मैडम का किस्सा याद  आ गया |रामसिंह वाला चैप्टर ठीक तो था पर इसमें रामसिंह का अलग से कोई व्यक्तित्व नहीं उभरा |ऐसा लगा कागज पर उतार कर लेखिका किसी भार से मुक्त हो रही है |
अमेरिका में डिग्री पाने की जद्दोजहद भी प्रेरणास्पद थी |
आत्मकथा में निजी संबंधो का एक व्यक्तित्व बनता है ,वह इस किताब में गायब है |सास से सम्बन्ध ,पति -बच्चों से सम्बन्ध पर इन्होने अधिक नहीं कहा है  |
संस्कृत शास्त्री वाला किस्सा ज्यादा ही खिंच गया |
मुनिश्री वाला प्रसंग ठीक था |पर नीरस लगा |
अशोक वाजपेयी प्रसंग ठीक था ,हिंदी के हालात दिखाने के लिए |सब यही बताते हैं |प्रकाशकों ,लेखकों के व्यव्हार पर लेखिका की टिप्पणियाँ धारदार हैं |
नौकरी ,इंटरव्यू  वाला प्रसंग भी ठीक था |
कुल 8 प्रसंग है |लेखिका का भाषा प्रेम ,भाषा का व्यक्तित्व निर्माण में योगदान इत्यादि प्रसंग लाजवाब है |गर्मी की छुट्टियों में पुस्तकें पढने की प्रेरणा देना अच्छी सलाह है |
एक जाने -पहचाने परिवेश के बारे में पढना सुखद रहा |
25 -9-14
सुधा अरोरा की कहानी '................भरवां करेले 'में पंडाइन शब्द का प्रयोग पात्र के सजीव चित्रण के लिए बहुत उपयुक्त है |इस शब्द के साथ सीधे पल्ले की साड़ी ,स्थूल का्य ,बीच की मांग निकली .सिंदूर ,कसी हुई चोटी ,बिंदी लगाये हुए महिला का चित्र साक्षात साकार हो उठता है |हिंदी की शक्ति |क्या इस तरह की व्यंजना गुप्ताइन ,या रस्तोगन शब्दों से की जा सकती है |
comments -सुधा अरोड़ा के साहित्य पर और कोई टिप्पणी नहीं है |कमाल है ,मैंने कहीं कुछ भी नहीं लिखा ;जबकि ये मेरी प्रिय कहानीकारों में से हैं  |हो सकता है ,ऐसा इसलिए .कि मैं इन्हें अभी तक डिकोड नहीं कर पायी होंगी |
27 -9-14
हिंदी में प्रोफेशनल एटमोस्फेयर ,मनोभावों के चित्रण वाली कहानिया नहीं है |ज्ञान संवेदना का विषय नहीं बना है ,बना भी है तो विडम्बना ,नोस्टेल्जिया के रूप में |


Friday, September 9, 2016

कहानीपन-13

पोस्ट जारी ..........
रही अश्लीलता की बात तो मैं इसे अश्लील नहीं मानती |एक इन्सान बिना मेकअप के ; पास ,अति पास से जैसा होता है ;सआदत ने उसे वैसा ही पेश किया है |साहित्य सम्बन्धी किसी भी निषेधों को उन्होंने अपने अनुभव की सच्चाई पर हावी नहीं होने दिया |इस कहानी को ही लो -ईश्वर सिंह का गिल्ट उस पर उस समय ही हावी होता होगा ,अन्यथा तो वह एक सामान्य इन्सान था |लेखक को इस वर्णन से दो शब्द क्लीयर करने थे |पत्ते फेंटना -रति क्रीडा ,पत्ते चलना -पेंटरेशन |हमारे समाज में सेक्स सम्बन्धी शब्दावली का इस्तेमाल खुले में करना वर्जित है |इसलिए लोगों ने अपने अपने लेवल के हिसाब से कूट भाषा बना ली है |लोगों तक उनकी कहानिया उनकी भाषा में पहुंचाना लेखक की सर्जनात्मक आवश्यकता है |
स्याह हाशिये -छोटे instances हैं |सचमुच सआदत का वक्त बहुत बुरा था |
post comments -सआदत का दौर वह था ,जब समूची मानवता का कोई एक हिस्सा मर गया था |जैसे किसी मौत के अवसर पर औरतें इकठ्ठी होती हैं ,तो किसी अत्यधिक गमजदा औरत को रोना नहीं आता ,तो बाकि औरतें अपने वचनों से उसे रुलाने का प्रयास करती है कि यह रो लेगी तो इसका दर्द भीतर जमेगा नहीं ,सदमा नहीं बैठेगा |मुझे लगता है सआदत का साहित्य उस कठिन दौर के दर्द को फूट बाहर निकालने का एक साहित्यिक प्रयास है |रिलीफ थेरेपी सोर्ट ऑफ़ |
बाकी जो इन्होने कहा की 'रोटी के लिए लिखता हूँ ' ,तो यह इनकी अति विनम्रता ही है |कुछ लोग , संतत्व की हद तक पहुंचे हुए ,इतने गहरे विनम्र हो जाते है कि उन्हें अपना दिया तो दिखता ही नहीं ,कुछ रोटी के टुकड़ों या कपड़ों की इतनी ग्लानि मानते हैं |
मेरे गुरु प्रवचनों में कहा करते कि जो तुम्हारी रोटी खाते हैं ,उसका कर्ज चुकता भी तो करना है |इन लोगों का कोई इलाज नहीं |
18-9-14
नीलम जैन की एक कहानी अभिव्यक्ति पर पढ़ी |अंतिम यात्रा | अमेरिका में एक बूढी अपनी अंतिम यात्रा में किसी ओल्ड एज होम में जा रही है |इस पर वह टेक्सी वाले के साथ पूरा शहर घूम रही है |घूम क्या रही है ,मानो दोबारा यादों में जी रही है |टेक्सी वाले के लिए भी जानी पहचानी निर्जीव गलियां एक नई  सजीव अर्थवत्ता से भर उठती हैं |
कहानी तो ठीक लगी पर ऐसी कहानिया एक वृहतर पाठक वर्ग में इस मीठी मुस्कान से स्वीकार की जाती है कि हाँ मैडम ठीक कह रहे हो |यह  मीठी मुस्कान इस बात का प्रूफ होती है कि मैडम को जिन्दगी की क्रूर सच्चाइयों का पता नहीं है |सचमुच एक दरिया-ए -अहसास है जो हमारे आस पास ही उबल रहा है |इससे दो-चार हुए बिना हम जान नहीं पायेंगे की जिंदगी क्या है ? सत्य क्या है ?
 दरिया-ए -अहसास या दरिया-ए -कामना ?

Thursday, September 8, 2016

कहानीपन -12

5 -9 -14
आज सआदत की कई कहानियां पढ़ी -

  1. टोबा टेक सिंह -लगता है साहित्य जगत में ये इसी कहानी से ज्यादा फेमस हैं |इंटरनेट पर सर्च की तो author of toba teksingh नाम से कई रिज़ल्ट निकले |ठीक थी |
  2. खोल दे -ठीक थी |बंटवारे की हैवानियत में लोगों पर सदियों का पागलपन तारी हो गया था |
  3. टिटमार का कुत्ता - भी वही ,जड़ पागलपन को दिखाती है |
  4. बू -कहानी अच्छी लगी |स्त्री-पुरुष के रिश्ते की नैसर्गिकता को पेश किया है |
ठंडा गोश्त -इस कहानी ने मुझे सबसे ज्यादा चौंकाया |बंटवारे की विभीषिका पर लिखने वाले ढेरों लोग हुए हैं पर यह सबकी अपनी अपनी तबियत की बात है कि वे उन अनुभवों में से क्या ढूंढ कर  लाते हैं | जब दिल के तार ही कुचल दिए गए हो तो संगीत कहाँ से फूटेगा और खाली पीढ़ियों की रक्षा के लिए कब तक कोई कलाकार अपने अनुभव सत्य से समझौता करके भावभीनी दुनिया रच सकता है |
भीष्म साहनी और सआदत के अनुभवों में कितना फर्क है |पागलपन और बर्बरता भीष्म ने भी देखी | फिर भी उनमे कुछ मानवीयता की रोशनी बची रही जो की वे हरनामसिंह (तमस में )जैसा किरदार रच पाए |यह भी उस दौर का एक सच था कि उस  भीषण आग में भी कुछ लोगों ने हिन्दू-मुस्लिम से ऊपर उठकर मानवीयता दिखाई होगी | मूल्यों की क्षीण रेखा भीष्म के यहाँ बची है |
पर सआदत के यहाँ मनुष्य गोश्त हो गया है |एक दुसरे को नोचते लोग जानवर दिखाई देते है (क्या  जानवर ऐसे होते हैं, यह भी एक वाजिब प्रश्न हो सकता है ?मगर क्या  करें |शब्दों की मज़बूरी है |और क्या कहें ? )   |इसमें स्त्री -पुरुषों के बीच शरीर संबंधों पर यह पागलपन भयावह लगता है |इस कहानी ने इसलिए मुझे चौंकाया |
ईश्वर सिंह ने 6 जने क़त्ल कर दिए थे फिर उस लड़की के मृत शरीर का ही उसे क्या अफ़सोस लगा ?
 पर नहीं  !!!!यही तो बात है इंसान की |
 उस लड़की को उसने मारना नहीं भोगना चाहा था ,पर वह खुद मर गयी या वह मरी हुई ही उठा लाया ,भावना की इतनी सी हलचल ने ईश्वर सिंह के समूचे व्यक्तित्व में ऐसी ठसता भर दी की वह न हैवान ही बना और न इन्सान ही बचा |कहीं बीच में ही ठंडा पड  गया |भावनाओं के उबाल में एक साथ 10 क़त्ल कर डालना आसान है पर एक लड़की की अनाम मौत झिंझोड़ देती है |ठंडा गोश्त ईश्वर सिंह के भीतर उठते हुए हैवान के ठंडेपन की कहानी है |
in between comment - आप कहोगे हैवान का  ठंडापन ? उसने 6 लोग मार डाले ,क्या अब भी उसके हैवान बनने में कोई कसर है ?
मैं कहूँगी -हाँ  | हैवान का  ठंडापन |
अगर हम इस कहानी को ध्यान से पढ़ें तो हमें दिखाई देगा की कहानीकार ने भी ईश्वर सिंह के प्रति अ -सहानुभूती नहीं दिखाई है |ईश्वर सिंह और उसकी बीवी एक साधारण सरदार दंपति हैं जो ,घर के बाहर हो रहे इतने बड़े बवाल में ,अपना हाथ साफ करने में कोई बुराई नहीं देखते |उसकी बीवी तो लूटे हुए गहने पाकर खुश होती है |उसे ईश्वर के किसी और लड़की के साथ मुह मारने में भी कोई ऐतराज नहीं |दोनों के बीच 'गुनहगारी की परस्पर इजाजत देने वाला '(थैंकयू मार्केज ) एक अनाम समझौता है |
ये स्वाभिमान ,अस्मिता ,शुचिता  के प्रश्न पढ़े -लिखों की सरदर्दिया हैं |आम लोग तो खाओ-पीयो-मौज मारो के सिद्धांत पे जीता है |
सआदत को इसलिए इस आदमी से अ-सहानुभूती नहीं ,क्योंकि वे जानते हैं कि ,अन्यथा यह आदमी कितना मासूम है ; क्योंकि वे स्वयं उनमे से एक हैं ,उन्होंने इस आदमी को करीब से ,बहुत करीब से देखा है ,जाना है |
वे जानते हैं कि ,अगर इस पर यह पागलपन तारी न होता तो ,लाश के साथ गन्दा काम करना तो दूर यह आदमी तो उसे छूने से भी डरता |यह तो वो आदमी है ,जो किसी को कन्धा देकर आये ,तो नहाता है |किसी अनजानी लाश को भी दूर से प्रणाम करके वाहे गुरु का नाम याद करता है |
मगर हाय !!!
हाय!!!हाय!!!!
क्या हो गया इसे !!!!
क्यों असफुद्दीन(काल्पनिक नाम ) ने मिलापे(काल्पनिक नाम )   की बेटी को मारा |मिलापा  क्यों अपने पिंड के दस लोगों को लेकर चढ़ आया |हाय !!हाय!!
क्यों सरदार जगजीत सिंह (किसी स्थानीय नेता का काल्पनिक नाम )ने ऐन वक्त पर कायरता दिखाई और आग बुझाने की बजाय ,भाग खड़े  हुए |हाय !!हाय!!
क्यों जिन्ना ने गाँधी जी की बात नहीं मानी ?
कहाँ तक सोचें?क्या क्या सोचें ?
दिमाग फेल हो गया जी |
बेचारी फूल जैसी लड़की कैसी उघाड़ी झाड़ियों में पड़ी पाई गयी |हाय ! उसका कैसा सलोना चेहरा था! कैसा गोरा रंग था ! कितने सुन्दर नैन-नक्श थे ! कैसा लम्बा कद था! बदन क्या गठीला था !कैसे चढ़े हुए ,गठीले उरोज थे !
सआदत का साहित्य अपने समय का करुण -करुणतम विलाप है |contd



Monday, September 5, 2016

कहानीपन -11

मार्केज पर आखिरी टिप्पणी मैंने यह लिखी -
तो इन कहानियों को पढना दिलचस्प तो था ,परन्तु किसी दृष्टि के अभाव में आखिर ये कहानियां एक गल रहे ,नग्न समाज को ही तो दिखाती है ,जिन्हें पढ़कर कोई उर्जा नहीं मिलती |
मार्केज सही कहते हैं आलोचकों को इग्नोर करना चाहिए ,इन्हें संतुष्ट करना असंभव है |चाहे मैं ही क्यों न हूँ |
हा!हा!हा!
यूँ ही नोबल नहीं मिला !!!!
4-9-14
सआदत का साहित्य डाउनलोड किया |मैं क्यूँ लिखता हूँ पर बोले कि रोटी के लिए लिखता हूँ |घरेलु औरतें इंस्पायर नहीं करती पर तवायफों की बेचैनियाँ बेचैन  करती हैं |मैं कहानीकार नहीं जेबकतरा हूँ |
साफगोई अच्छी है |वस्तुतः अपने आप से यही सच्चाई आदमी को आगे बढाती है |



Sunday, September 4, 2016

मार्केज-8

' एलिवेटर से उतरते  सत्रह शव ' तो पूरी वर्णनात्मक है |एक बूढी ईसाई औरत अपने बूढ़े  के मरने पर कोई मन्नत पूरी करने ,पहली बार अपने घर से अकेली निकली है|उसकी समुद्री यात्रा ,होटलों रेस्टोरेंटों के वर्णन ,सड़कों के वर्णन हैं |इस किरदार को बयां करने में लेखक की दिलचस्पी शायद यह रही होगी कि वे पाठकों को याद दिलाएं की ऐसी धर्म भीरु औरतें भी होती हैं |
अपने यहाँ की किसी पुरानी पंडाइन या शर्माजी सोर्ट ऑफ कोई वर्णन समझ लीजिये |ऐसे कई लोगों की कहानी का भी पाठक वर्ग होता है |इस तरह के किरदार नोस्टेल्जिया बड़ी कुशलता से  क्रिएट करते है |
 'संत ' का नायक अपनी आस्था को जी रहा है |ईसाईयों में संत की पदवी देना ,एक सांस्थानिक परिपाटी है |इस कहानी के नायक की बेटी का शव अर्सा बाद भी सडा नहीं |तो उसे उसके चमत्कार पर यकीं हुआ ,और वह उसे संत की पदवी दिलाने रोम ले आया |
यह कहानी उसके अंतहीन  प्रयास और प्रतीक्षा को दिखाती है |
देखा जाए कहानी में कुछ भी नहीं |मजा कैसे आएगा ?पर ऐसी कहानी में भी ,कुछ युवा विद्यार्थियों के क्रियाकलापों और हरकतों को जोड़कर लेखक  ने इस कहानी को fultush मसाला कहानी बना दिया है ,बिना साहित्यिकता से समझौता किये |
' सोई सुंदरी की हवाई उड़ान ' imperial blue whisky की ad  - men will be men का कहानी संस्करण समझिये |एक गुदगुदाती हुई मीठी 'हार्मलेस 'कहानी |इसमें जापानी मिथक कथा का उपयोग मुझे कहानी के अनुभव को रिच बनाने की दृष्टि से बहुत पसंद आया |
' प्रकाश पानी समान है ' में बच्चों के नज़रिये से जीवन में '  झाँका ' गया है |
 'मैं सपने बेचती हूँ 'की स्त्री को अहसास हुआ कि उसके पास कुछ पराशक्ति है .तो उसने इसी को अपना बिजनेस बना लिया | वे कोई नौसिखिये लेखक होते हैं ,जो मृत्यु को एक शॉकिंग डिवाइस की तरह इस्तेमाल करते हैं |वे पहले किरदार की मज़बूरी दिखाएँगे ,फिर धीरे धीरे उसके समझौते गिनाएँगे ,उन समझौतों में रपटती बेचारे किरदार की ज़िन्दगी का अवसादपूर्ण अंत मृत्यु !!!!!
मार्केज़ पहले पैरा में ही बता देते हैं कि यह फलां इस प्रकार मरा |पर उसने जीवन क्या जीया ? इस बात को वे खोल खोल के ,रस ले ले कर बताते हैं ,कि पाठक को इत्मिनान रहता है कि मरी तो मरी ,अपनी जिंदगी तो जी गयी |
मार्केज की कला का जादू -लोगों को जानने और समझने की उनकी अदम्य जिज्ञासा में है |
जादू की बात कही थी |वह भी बता दूँ |
 इनकी कहानी है -' बर्फ में  जमी तुम्हारे लहू की लकीर ' ,जिसके नाम पर इस संग्रह का नाम है |इस कहानी में वर्णन चल रहा है कि किस तरह नायक -नायिका मिले ,उनमे प्यार हुआ , उन्होंने प्यार को एक्सप्लोर किया और दो महीने की गर्भवती नायिका शादी के बाद फर्स्ट नाइट  व्यतीत करने मेड्रिड से  पेरिस जा रहे हैं ,कार से |उनके घरवालों ने होटल बुक करा रखा है |दोनों उस देश के शाही खानदानों के बच्चे है |
नायिका के हाथ की उंगली में काँटा चुभ गया और किसी ऐसी नस में चुभा की वह सफ़र उसका अंतिम सफ़र साबित हुआ |उसे बराबर होश है अपने जख्म का |महंगी गाड़ी ,पीछे की सीट पर पड़े महंगे उपहार ,उसका  महंगा ओवरकोट | पर हाइवे पर रात के समय ,चिकित्सा कहाँ मिलेगी ?
और ऐसे ही समय ,जब वे दो जन ,किसी डाक्टर को भी देख रहे है ,उन्हें यह भी ख्याल है की पेरिस पहुंच जाएँ ,रात का समय है ,बर्फ पडनी शुरू हो गयी है -
"फिर वो ,हाल के पिछले  दिनों की बाबत ,काफी देर से आह्वान करते आ रहे स्वप्नों में जा डूबी ,और ,किसी ऐसे दुस्वप्निल प्रभाव से चौंककर उठी मानो कार पानी में चल रही हो ,तब यद्यपि खूब विलम्ब से ,याद आया उंगली पर रुमाल बंधा है |उसने डैशबोर्ड के बीच लगी प्रदीप्त घडी में देखा वक्त तीन से ऊपर है ,अन्दाजिया गणना कर समझ पाई कि वे बोर्ड्यु ही नहीं एन्गाऊलिमे और पोइतिएर्स भी पार कर लोआयर के जल प्लावित बाँध की बाजू में चल रहे हैं |धुंध में से छनी चांदनी बिखरी हुई थी और चीड की असंख्य पत्तियों के बीच से दुर्गों,किलों,गढ़ियों की स्याह छायाकृतियों दिखाई दे रही थी मानो परीकथाओं में से निकल कर सामने आ गयी हों |इलाके से भली भांति परिचित नेना -दाकोंते ने अनुमान लगाया वे पेरिस से कोई तीन घंटे ही दूर होंगे ....
इस वर्णन में जादू कहाँ है ?
चांदनी और चीड की पत्तियों में?
पर वे तो होती हैं |ये तो रियल है |
फिर ?
जादू है .इन अलग -अलग प्रकार की वास्तविकताओं को ब्लेंड करने में ,उन्हें मिलाने में |
वास्तविकता को फैला कर उसे और अधिक सघन और रिच बनाने में |       

Saturday, September 3, 2016

मार्केज -7

'मैं तो बस फोन करने आयी 'की मारिया की  बदनसीबी देखिये | किसी शाम अपने घर से दूर निकली  यह औरत गलती से पागलों को ले जाने वाली गाड़ी से लिफ्ट ले लेती है और 'गलती' से (जो की वहां की व्यवस्था की यांत्रिकता की भयावहता का एक पक्ष दिखता है )पागल ही समझ कर भर्ती कर ली  जाती है |
उसे एक फोन करना था बस ,अपने हसबैंड को बताने के लिए ,पर वह फोन कर नहीं पाती |
उधर दिन बीतते -बीतते पति का  उसके किसी और के साथ भाग जाने का शक गहरा होता जाता है ,क्योंकि मारिया पहले भी दो पति छोड़ चुकी है |
और इस तरह ,मारिया जब फाइनली फोन करने में कामयाब हो भी जाती है ,तब प्रत्युत्तर में किसी की परवाह से भरे प्यार बरसाते शब्द सुनने के बजाय उसे घृणा से भरे रंडी शब्द सुनने को मिलते हैं ;तब उस पर क्या बीती होगी ,पाठक ज़रा कल्पना करें |
पर जीवटता  इन लोगों में पक्की है |मारिया ने जब देखा की उसका मुर्ख पति भी उसे पागल ही समझ रहा है ,तो उसने उसे भी भूलने में देर नहीं लगाईं |जेल का माल खाकर उसने तो अपना वज़न बढाया और मस्त हो गयी |  
इस कहानी को पढ़ते हुए मैं सोच रही थी कि मरिया जैसी पात्र की कल्पना इंडिया में किस प्रकार संभव है |ये लोग ऐसे पात्र और ऐसी स्थितियों की रचना कर सकते हैं ,क्योंकि इनके पारिवारिक -सामाजिक ढांचे ख़त्म हो चुके हैं |पर ये कहानियां वैयक्तिक साहस को जरुर सेलिब्रेट करती  नज़र आती हैं |
मारिया दोस प्राजेरेज़ ' की मारिया एक वेश्या है |बड़ी छोटी उम्र में वह इस काम में डाल दी  गयी |उसने अपना सारा जीवन लगभग ऐसे ही बिताया |इस बीच उसे एक अराजकतावादी से प्रेम हुआ होगा ,जिसका अस्पष्ट इशारा कहानी में है |ऐसे ब्योरों को मार्केज कुछ वाक्यों में ही निपटा देते हैं ,क्योंकि पाठकों को मुख्य किरदार के बारे में कौन ?कहाँ?कैसे? जानने की दिलचस्पी  तो होती ही है |
मार्केज की असल दिलचस्पी किरदार के आज के ,वास्तविक जीवन को देखने में है (कहानीपन )
मारिया अपने आज के जीवन से लगभग संतुष्ट ही है |उसके एक ग्राहक ने उसे सलाह दी कि वह पैसे जोड़कर अपना घर बनाये ,ताकि बुढ़ापे में उसे किसी की मोहताजी न उठानी पड़े |मारिया ने अपना घर बनाया ,अच्छे से सजाया |एक कुत्ता है उसके पास ,नुई |
एक बार उसे ख्याल आया कि मेरी मौत के बाद लोगों को पता कैसे चलेगा ?तो इसके लिए उसने नुई को ट्रेन किया कि वह लोगों को बुला लाये ;उसकी कब्र पर हर इतवार जाकर रोये ,अपनी कब्र की वसीयत बनाई |यह कहानी इन्ही क्रियाकलापों में पूरी होती है ;पर साथ ही साथ मानवीय संवेदना के बारीक़ रेशों को पाठकों की स्मृति  में छोडती हुई कि देखों लोग कैसा जीवन जीते है  |और उनकी कैसी -कैसी इच्छाएँ हुआ करती है |
इस कहानी के कई हिस्से मुझे पसंद आये |
एक तो मुख्य किरदार ही काफी हंसमुख ,जहीन और उर्जावान है |
दूसरे वह हिस्सा ,जहाँ काउंट उसके यहाँ रोज़ शाम को आता है |वह सोफे पे बैठकर गाना सुनता है |वह उसके लिए खाना बनाती है |न्यूज़ सुनते है एटसेट्रा -खासा शांत ,प्रमोद्पूर्ण वर्णन है |
मार्केज जानते हैं -जीवन कहाँ है ?
जीवन है -बढ़िया खाने में ,घुमने में ,मित्रों की गपबाजी में ,उत्तेजनापूर्ण बहसों में ,उम्दा प्राकृतिक दृश्यों में ,रहस्य में ,रोमांच में ,अद्भुत में |आप फेसबुक देखिये | लोग किस प्रकार का जीवन शेयर करते हैं |इसी को वे अपनी कहानियों में रिक्रिएट करते है |
अगर कोई मुझसे मार्केज की कला के बारे में पूछे तो मैं कहूँगी कि वे शानदार ,एंटिक ,अद्भुत ,जीवंत 'जीवनानुभवों 'से भरी दुकान के मालिक हैं जो ग्राहक की फरमाइश पर तुरंत एक बढ़िया ,आनंददायक ,मजेदार  मिक्सचर पेश करने में माहिर कलाकार हैं |       

Thursday, September 1, 2016

मार्केज -6

दरअसल जब मैं सजीवता शब्द पर विचार करती हूँ ,तो यकीन  मानिये ,मैं विचार ही करती रह जाती हूँ ;किसी नतीजे पर नहीं पहुंच पाती |
इस संग्रह की कहानियों में मैंने सजीव पात्रों का जिक्र किया ,दरअसल तो वे दो -चार ही हैं |मारिया दोस प्राजेरेज़ की मारिया ही एक असली सजीव ,जिंदादिल ,जीवन्त  मुलट्टा (अनुवादक ने अनुवाद किया है ) है ,बाकि 'मैं तो बस फोन करने आयी' की मारिया तो परिस्थितियों से लडती हुई स्त्री ज्यादा है | संत के नायक का नायकत्व भी faded सा है | 
सच कहूँ ,इन कहानियों में अगर कोई सचमुच में सजीव ,जिंदादिल ,जीवंत है तो वे हैं स्वयं मार्केज |इनकी बयानगी का अंदाज इतना सजीव ,जीवंत और रिच है कि यह अंदाज ही पात्रों  की सारी  कमियों को छुपा लेता है ,अन्यथा इन कहानियों में ,इन पात्रों को पढने में  कोई मजा नहीं |
अब जरा देखिये -  'ठीक छह बजे रेस्टोरेंट के भीतर कदम रखती कोई स्त्री 'की स्त्री को |यह एक वेश्या है |इसका रोज़ का काम है की यह एक रेस्टोरेंट में शाम 6 बजे कुछ खाने आ बैठती है |क्योंकि उसका रोज़ का काम है ,सो मालिक से उसकी पहचान हो गयी है ,पहचान क्या मालिक खासा लट्टू है उस पर |(यहाँ तक आपको कहानी में कोई एक्स्ट्राऑर्डिनरी बात नहीं लगी होगी ) 
एक दिन उसने  अपने एक ग्राहक का मर्डर कर दिया ,तो उस दिन वह छः बजे से पहले पहुंच गयी | मर्डर करने के बाद दुकान के मालिक से उसने  यह फेवर माँगा की अगर पुलिस पूछे वह अपनी नेकनामी के बल पर उसका कुछ बचाव कर दे |
वह कौन है और किस तरह इस काम में आई ,इसका कोई जिक्र नहीं ,पर इस घटना के बाद उसे अपना फ्यूचर साफ दिख रहा है कि 'मानो एकाएक किसी विचित्र गर्त में ,गन्दी ,अज्ञात शक्लों से पटे  पड़े अंडरवर्ल्ड में जा डूबी हो' |(यहाँ तक भी ठीक है |मर्डर किया है तो यह तो होगा ही | )
मगर मर्डर करने का कारण देखिये -
'सुनो ,बताओ ,अगर किसी पुरुष के ,और उस जैसे कई पुरुषों के साथ रहने से वितृष्णा हो जाए और मैं उसे 
मार डालूं तो समाज को मुझे क्यों निकाल बाहर करना चाहिए ? (यह है  उसकी दीर्घ , इकठ्ठा हुई पीड़ा  )
उस दिन क्या हुआ था ?
'क्यों नहीं ,अगर स्त्री उस पुरुष को कपडे पहनते देखे क्योंकि सारी  दोपहर उसके संग रगडाती रही ,तब तो बाद में लगाये साबुन और सारे तौलिये भी स्त्री की देह से उसकी गंध मिटा नहीं सकते ?'
मिट जाती है ,रानी .........उसे मारना जरुरी नहीं |उसे बस जाने दो ,छोड़ दो |
क्यों छोड़ दू ,क्यों नहीं मारुँ अगर स्त्री उसे कहे ;घिन हो गयी है तुमसे ,तो पुरुष कपडे पहनना बंद कर फिर उस पर आ चढ़े ,चूमे ......?
कोई भद्र आदमी ऐसा कभी नहीं करेगा ?
लेकिन अगर करे तो ?..............अगर आदमी भद्र न हो और वैसा करे और स्त्री को उससे इतनी नफरत हो जाए कि ख़ुदकुशी करना चाहे ,या उसके गले चाकू उतार कर इस सबका अंत करने के सिवा उसे कोई राह न सूझे .तो ?'
.........................
...........................
..........................यह था मर्डर करने का कारण |घूम गयी न  संवेदना की चकरी दिल के अन्दर |हाय !क्या कहें ?निशब्द हैं |
इन्ही कृति साहित्यकारों के लिए धर्मवीर भारती ने कहा कि एक साहित्यकार चीजों को वहां से ,उस एंगल से देखता है ,जहाँ से कोई और नहीं देख सकता |
देह की शुचिता की इन्सान की जिम्मेदारी को यह कहानी बड़ी संवेदनशीलता से दिखाती है |

  

Wednesday, August 31, 2016

मार्केज -5

ये तो हुई उनकी कहानियों में अलग अलग प्रकार के पात्रों की मौजूदगी की बात। लेकिन मार्केज किरदारों को सिलेक्ट कैसे करते हैं ?
इस बात को जानने के लिए मैंने इस संग्रह की कहानियों को वर्गीकृत किया।

  1. ठीक छह बजे रेस्टोरेंट के भीतर कदम रखती कोई स्त्री 
  2. मैं तो बस फोन करने आयी 
  3. मैं सपने बेचती हूँ 
  4. बर्फ में  जमी तुम्हारे लहू की लकीर -   
  5.  ट्रामोंटाना 
  6. तपती  दुपहर में सुस्ताता मंगलवार 
  7. मिस फ़ोर्ब्स के ग्रीष्म के सुहावने दिन  -ये कहानियां दुखांत हैं।
पानी में डूब  मरा हुआ संसार का परम सुन्दर आदमी
एलिवेटर से उतरते  सत्रह शव 
सोई सुंदरी की हवाई उड़ान 
विशाल पंखों वाला अत्यंत बूढा आदमी 
मारिया दोस प्राजेरेज़ 
सफर सुहावना रहा ,मिस्टर प्रेजिडेंट -ये कहानियां सुखांत है। 
प्रकाश पानी समान है ,संत   -न सुखांत ,न दुखांत। 
इन कहानियों को  पढ़कर ,इनके पात्रों के बारे में एक बात जो सबसे ज्यादा आकर्षित करती है वह है इनकी अदम्य जिजीविषा  . 
मार्केज  को अदम्य जिजीविषा वाले ,सजीव ,जिंदादिल किरदार पसंद आते हैं। contd

Tuesday, August 30, 2016

मार्केज -4

15 -10-15
गेब्रियल मार्केज को पढ़ा। इंदु प्रकाश कानूनगो का अनुवाद -बर्फ पर तुम्हारे लहू की लकीर। अनुवाद तो ठीक था। काफी संभाला है।
NOW ABOUT the WRITER -क्योंकि मार्केज एक पत्रकार हैं ,तो घटनाओं के ब्यौरों में जाना ,एक यात्रा वृत्तांत के समान  वर्णन करते चलना ,उनका पेशा ही है तो यह उनके लिए कठिन नहीं।
फॉर एग्जाम्पल - मैं तो सिर्फ फोन करने आयी कहानी में पागलघर के ब्यौरे ,बर्फ पर......... कहानी में यात्रा के ब्यौरे। यह सब कुछ इतना सटीक है की कहीं विश्वास न करने की कोई गुंजाईश ही नहीं।
बल्कि मार्केज  की तरह मैं भी हैरान हुई कि  इनके काम में आलोचकों को जादू कहाँ  से नज़र आ गया। ये ब्यौरे तो  वैसे ही हैं ,जैसे हम जर्नलिस्ट रिपोर्टों में पढ़ते हैं।
मगर जादू भी है। उसके बारे में भी बताऊंगी।
उनकी हर  कहानी में एक पात्र (अकेला ) है ,जो अपने आस पास के ब्यौरों से प्रभावित -अप्रभावित होता हुआ चल रहा है। असंबन्ध किसी इंसान को अकेला भी बना सकता है और जिज्ञासु भी ;यह इंसान पर निर्भर है।
मार्केज के अधिकतर पात्र अकेले हैं। मरिया ,सत्रह शव की प्रुदेन्शिआ ,प्रेजिडेंट। पर मार्केज जिज्ञासु हैं , अतः उनकी डिटेलिंग और सूक्ष्म ब्यौरों में वे गहराई तक गए हैं।ऐसा लगता है अपने जीवन के संघर्षों से नाउम्मीदी या अपेक्षाहीन स्थिति ने मार्केज को मानसिक रूप से ऐसे लेवल पर ला दिया है ,जो दूसरों के जीवन में दिलचस्पी लेता है ( जो की जीवन में ही दिलचस्पी की उसकी अदम्य जिज्ञासा को द्योतित करता है ,अतः ज्ञानी ) और देखता है की लोग कैसा जीवन जी रहे हैं ;वे क्यों उदास ,निराश ,आशावान हैं। अर्थात एक observer ,एक दर्शनी की हैसियत से वे अवलोकन करते हैं।
चूँकि एक पत्रकार का वास्ता कई तरह के लोगों से पड़ता है इसलिए अलग अलग तरह के लोगों से मिलना उनके लिए मुश्किल नहीं। CONTD

Wednesday, August 24, 2016

मार्केज -3

Q -क्या आपको लगता है नए लेखकों के लिए यह आम बात है कि वे अपने बचपन और अनुभवों को नज़रन्दाज करते है और बौद्धिक बनते हैं ,जैसे की शुरुआत  में आपने किया ?
A - नहीं ,बल्कि यह प्रक्रिया उलटी है लेकिन मुझे अगर किसी नए लेखक को सलाह देनी हो तो मैं कहूँगा कि एक लेखक को आपबीती से  शुरुआत  करनी चाहिए  |पाब्लो नेरुदा ने कविता में एक लाइन  कही है 'ईश्वर जब मैं गाऊँ ,तब मुझे (गाना )बनाने से बचाना ' |
यह बात मुझे बड़ी मजेदार लगती है कि मेरे काम को सबसे अधिक कल्पना के लिए सराहा गया जबकि सच यह है कि मेरे पूरे काम में एक लाइन भी ऐसी नहीं जो सच पर न टिकी हो |मुश्किल यह है कि कैरिबियन सच्चाई  किसी भी वायावी कल्पना से मिलती  जुलती है |
Q -   जर्नलिस्म ने आपके फिक्शन को कैसे प्रभावित किया ?
A - मुझे लगता है कि प्रभाव दोतरफा है |फिक्शन ने मेरी पत्रकारिता को साहित्यिक मूल्य (लिटरेरी वैल्यू ) दिया है और जर्नलिस्म ने मेरे फिक्शन को सच्चाई पर टिके रहने में मदद की है |
Q- (क्या )आप समझते हैं कि आलोचक आपको टाइप करते हैं या बड़ी सफाई से कैटेगराइज़ करते है |
A - आलोचक मेरे लिए सबसे बड़ा एग्जामपल हैं कि बौद्धिकतावाद क्या होता है | सबसे पहले ,वे एक थ्योरी लाएंगे कि लेखक को कैसा होना चाहिए |वे लेखक को उस मॉडल में फिट करने की कोशिश करेंगे ,जब वह नहीं होगा ,तब वे जबरन यह  कोशिश करेंगे |
मैं सिर्फ इसलिए उत्तर दे रहा हूँ क्योंकि आपने पूछा है नहीं तो मुझे ज़रा भी दिलचस्पी नहीं कि आलोचक मेरे बारे में क्या सोचते हैं ,मैंने बहुत सालों से किसी को पढ़ा नहीं है |वे दावा करते है कि वे लेखक और पाठक के बीच के सेतु हैं पर मैंने हमेशा  कोशिश की है कि मैं बहुत ही स्पष्ट और नपा -तुला लेखक रहूँ ,पाठक तक स्वयं पहुंचू कि किसी आलोचक के माध्यम से पहुँचने की जरूरत न पड़े |
अच्छा इन्टरव्यू है |पूरा ही अनुवाद कर दूंगी |

Tuesday, August 23, 2016

मार्केज -2

 Q -  वे नाम  बताएं जिन्होंने शुरुआत में आपको प्रभावित किया ?
A -american lost generation के लेखकों में सचमुच में मदद की कि मैं लघु कहानियों के प्रति मेरे बौद्धिक नजरिये से मुक्ति पा गया |मुझे लगा कि उनके साहित्य का जिंदगी से जो रिश्ता है वह  मेरी कहानियों में नहीं था |फिर एक घटना घटी जो नजरिये (में बदलाव )की दृष्टि से महत्वपूर्ण है |
यह बोगोताज़ों थी |9 अप्रैल १९४८ को जब एक राजनेता गीतन को गोली मार दी  गयी और बोगोटा के लोग गलियों में पागलों की तरह चिल्ला रहे थे ,मैं अपनी जगह पर था ,जब मैंने यह खबर सुनी ,मैं उस तरफ भागा पर  गीतन को हॉस्पिटल ले जाया जा रहा था |वापिस आते हुए ,लोगो ने गलियों पर कब्जा कर लिया था |वे प्रदर्शन कर रहे थे ,स्टोर लूट रहे थे ,बिल्डिंगे जला रहे थे |मैं भी उनमे शामिल हो गया |उस दोपहर और शाम को ,मुझे पहली बार लगा की मैं किस प्रकार के देश में रह रहा हूँ और मेरी लघु कहानियों का इससे कोई वास्ता नहीं है |फिर मुझे कॅरीबीयन में baranquilla में जाना पड़ा जहाँ मेरा बचपन बीता था | वहां मैंने महसूस किया कि मैंने किस प्रकार की जिंदगी जी है ,जानी है और जिसके बारे में लिखना चाहा है |
१९५०-५१ के दौरान एक घटना और  घटी जिसने मेरी साहित्यिक अभिरुचियों को प्रभावित किया |मेरी मां ने मुझे aracataca साथ चलने के कहा ,जहाँ मेरा जन्म हुआ था ,वह  घर बेचने के लिए जहाँ मेरे शुरू के साल निकले थे |जब मैं वहां गया तो पहले पहल यह काफी शौकिंग था क्योंकि अब मैं २२ साल का था और ८ साल की उम्र के बाद पहली बार वहां गया था   |कुछ भी नहीं बदला था ,पर मुझे लगा कि मैं उस गाँव को सिर्फ देख नहीं रहा था बल्कि अनुभूत कर रहा था ऐसे जैसे कि जो कुछ भी मैंने वहां देखा वह सब कुछ पहले ही लिखा जा चूका था और मैं सिर्फ पढ़ रहा था |और सभी व्यावहारिक कारणों से वह सब साहित्य में तब्दील हो गया था ,वह घर ,वे लोग ,वे यादें |मैं नहीं जानता उस समय तक मैंने faulkner को पढ़ा था या नहीं पर अब मैं जानता हूँ कि केवल faulkner की टेक्नीक से ही यह संभव था कि मैं  वह सब लिख पाता जो मैं  देख रहा था |वहां का वातावरण ,decandence उस गाँव की तपिश सब कुछ वैसी थी जैसी की मैंने faulkner  में महसूस की थी |वह एक केले के पौधों का क्षेत्र था जहाँ फ्रूट कम्पनियों के बहुत से अमरीकी रहते थे ,जिनसे वहां का वातावरण बहुत कुछ वैसा ही बन गया था जैसा मैंने deep south के लेखकों में पाया था |आलोचकों ने faulkner  के साहित्यिक प्रभाव की बातें कही हैं पर मैं इसे संयोग मानता हूँ |मुझे सिर्फ वैसा मैटिरियल मिला जो वैसे ही लिखा जा सकता था जैसा  faulkner  ने लिखा है |
गाँव की उस यात्रा के बाद मैंने पहला नॉवेल leaf storm लिखा |उस ट्रिप में मेरे साथ यह हुआ था की मुझे लगा था aracataca में जो भी मेरे बचपन में घटित हुआ था उसका साहित्यिक मूल्य है ,जिसे मैंने अब पहचाना है |उसके बाद मैंने leaf storm  लिखा तो मुझे लगा कि मैं लेखक बनना चाहता था और मुझे कोई रोक नहीं सकता है और बस एक काम बचा है करने के लिए कि मैं दुनिया का सर्वश्रेष्ठ लेखक बनूँ (इसे कहते हैं कॉन्फिडेंस )|ये १९५३ की बात है ,पर १९६७ से पहले तक मुझे रॉयल्टी मिलनी शुरू नहीं हुई थी जबकि मैं ८ में से ५ किताबे लिख चुका था | 

Friday, August 19, 2016

मार्केज़

पूरे इंटरव्यू का लिंक ये है -http://www.theparisreview.org/interviews/3196/the-art-of-fiction-no-69-gabriel-garcia-marquez
Q - सत्य और कल्पना में  संतुलन बनाने में क्या एक पत्रकार और उपन्यासकार की जिम्मेदारी अलग होती है ?
A - पत्रकारिता में तथ्य की एक चूक आपकी कार्य को पक्षपाती बना देती है। जबकि फिक्शन में एक सही तथ्य पूरे कार्य को वैधता प्रदान करता है। यही अंतर है। एक उपन्यासकार  जो चाहे , वो लिखे ;जब तक वह लोगो को अपने लिखे का यकीं दिला  सकता है। 
Q -आपने लिखने की शुरुआत कैसे की ?
A -ड्राइंग से। मैं कार्टून की ड्राइंग बनाता था। पढ़ना या लिखना शुरू करने से पहले मैं स्कुल में और घर में कॉमिक्स बनाता था। मजेदार बात यह है ,जो मैंने अब जानी ,की हाई स्कुल में मैं लेखक प्रसिद्द था ,जबकि सच यह था कि मैंने कभी कुछ नहीं लिखा था। यदि कभी  कोई इश्तहार या अपील लिखनी होती थी तो मुझे यह काम करना होता था क्योकि मैं लेखक समझा जाता था। जब मैं कॉलेज में गया तो मेरे दोस्तों के मुकाबले मेरी साहित्यिक पृष्टभूमि अच्छी थी। बोगोटा विश्वविद्यालय में ,नए लोग मेरे परिचय में आये और दोस्त बने। उनमे से कइयों ने मुझे समकालीन लेखकों से परिचित कराया। एक रात को मेरे दोस्त ने मुझे फ्रेंज काफ्का की लघु कहानियों की किताब दी। मैं अपनी जगह पर गया और मैं  the metamorphosis को पढ़ना शुरू किया। पहली लाइन पढ़ते ही मैं लगभग बिस्तर पर से उछल गया। मैं हैरान था। पहली लाइन थी -जैसे ही ग्रेगोर साम्सा अपने अस्थिर  सपनो से जागा ,उसने अपने आपको एक बड़े कीड़े के रूप में बिस्पर पर पड़े हुए पाया....... " जब मैंने यह लाइन पढ़ी तो मैंने सोचा मैं तो किसी ऐसे बन्दे को नहीं जानता जिसने इस प्रकार का लेखन निकाला हो ,अगर मैं जानता तो मैं अरसा पहले ही लिखना शुरू कर देता ,तो मैंने तुरंत लघु कहानियां लिखना शुरू कर दिया |वे अब बौद्धिक कहानियां थी क्योंकि वे मेरे  साहित्यिक अनुभव के आधार पर लिखी गयी थी और तब तक मिअने साहित्य और जीवन के बीच के लिंक को नहीं पकड़ा था | ये कहानियां बोगोटा के एक अख़बार el espectador के साहित्यिक सप्लीमेंट में छपती थी |उस समय सफल भी हुई थी -शायद इसलिए क्योंकि उस समय कोलंबिया में कोई भी बौद्धिक लघु कहानियां नहीं लिखता था |उस समय अधिकांशतः ग्रामीण और सामाजिक जीवन पर लिखा जाता था |जब मैंने अपनी पहली लघु कहानियां लिखी तो मुझे बताया गया कि उन पर जोयस का प्रभाव है |
Q- क्या आपने उस समय तक  जोयस को पढ़ा था ?
a - मैंने जोयस को कभी नहीं पढ़ा था ,तो मैंने ulysses पढना शुरू किया |मैंने स्पैनिश अनुवाद पढ़ा था |बाद में इसका इंग्लिश अनुवाद पढ़ा और पाया स्पैनिश अनुवाद बहुत बुरा था |लेकिन फिर भी इन सबसे मैंने आंतरिक मोनोलॉग की जरुरी टेक्निक सीखी -जो भविष्य में मेरे बहुत काम आई |ये टेक्निक मैंने वर्जिनिया वुल्फ में भी पायी और उनका इस्तेमाल का बेहतर ढंग मुझे ज्यादा पसंद आया |यद्यपि मैंने बाद में पाया कि यह टेक्निक तो किसी lazarillo de tormes के अनाम लेखक की इजाद है | (मार्केज़  के वाक्य बहूऊऊऊऊऊऊऊऊऊउत बड़े बड़े होते हैं  ) ..........contd   

Monday, August 15, 2016

Kahanipan -10

मार्केज थोड़ा लंबे चलेंगे। इन्हें अब निबटा ही लेते हैं।
इन पर एक टिपण्णी १५-१०-१५ की है। पर उससे पहले कुछ बातें।
फ्योदोर के उपन्यास वाली टिपण्णी में मैंने बंद कहानी की बात कही थी। मार्केज की कहानियाँ मुझे खुली कहानियां लगीं।
बंद -खुली से मेरा क्या मतलब है ,सुनो।
एक कहानी को पढ़ते हुए यह अंदाज तो लग ही जाता है की इसमें कहानीकार कहाँ छुपा बैठा है अर्थात सीधे शब्दों में कहूँ तो कि कहानीकार को उस कहानी का पता कैसे चला। वह स्वयं इस कहानी का भोक्ता है ,या वह साक्षी है। दोनों प्रकार की कहानियां बंद कहानिया है ,क्योंकि ऐसी कहानियों में लेखकों के निजी नजरिये ,अनुभव ,सुख-दुःख ,कमेंट्स गहनता से उभर कर आते हैं। इस प्रकार की कहानियों का प्रभाव गहन (हैवी )होता है। अब तक इस ब्लॉग में मैंने जितनी भी टिपण्णी लिखी ,उनमे हैवी वर्ड सबसे ज्यादा यूज़ किया होगा। इस तरह की कहानियों ऐसा प्रभाव इसलिए पैदा कर पाती हैं ,क्योकि यह या तो लेखक की स्वयं की आपबीती है या यह ऐसे इंसान की बात है जिससे वह अटैच है। इसलिए तीव्र भावोद्वेलन  ऐसी कहानियों की विशेषता होती है।
खुली कहानियों में कहानीकार (मसलन मार्केज की कहानियों में ,हम आगे देखेंगे ) मात्र द्रष्टा है। वह मुख्य पात्र से अटैच  नहीं है। मुख्य पात्र के जीवन में जो कुछ भी घटता है ,अच्छा या बुरा ,इससे वह ज़रा भी प्रभावित नहीं।
फिर उसे उस कहानी का पता कैसे चला ?
क्योंकि उसका पेशा ऐसा है , वह पत्रकार है ,की वह अलग अलग तरह के लोगों के संपर्क में आता है। उसे आना पड़ता है।
अपने संपर्क में आये लोगों की कहानियों का सेलेक्शन वह दिलचस्पी के आधार पर करता है ,की इस कहानी में ऐसी क्या खास बात है कि  इसे कहा जाए।
किरदार की दिलचस्पी उसे कहानी कहने के लिए प्रेरित करती है।
मगर इन सबके साथ उसका अपना जीवन भी है ,जो वह जी रहा है। यात्राएं करना ,यात्राओं के ब्यौरे ,होटलों के मेन्यू ,बार गर्ल्स के साथ छेड़छाड़ ,विभिन्न जगहों के प्रामाणिक ब्यौरे ,लोगो के व्यव्हार के सटीक आकलन करना ,विभिन्न प्रकार
की व्यवस्थाओं की बारीक़ समझ -अर्थात कुल मिला एक पत्रकार के पेशे की अनुभवगत पूंजी ,भी मार्केज ने अपनी कहानियों कहानियों में उड़ेल दी है। contd




Sunday, August 14, 2016

kahanipan -9

४-९-१४
मार्केज की दो कहानियां पढ़ी।
१ दुनिया के सबसे सुन्दर आदमी का डूबना -अच्छी थी। in fact I really liked it .समुद्री किनारे बसे एक गाँवमे एक अपरिचित सुन्दर लाश के जरिये मनुष्यों पर सौन्दर्य ,शक्ति ,बनावट के प्रभाव (गहरे प्रभाव ) को मार्केज ने सादगी से कहा है। इनके कहने का ढंग बिलकुल सादा है। तरल। औरतों ,आदमियों,बच्चों की मानसिकता   में आसानी से प्रवेश कर जाते हैं। फिर भी कहानी पर अपनी पकड़ नहीं छोड़ते। इनकी कहानियों में समुद्र बहुत ज्यादा है। समुद्र संबंधी  ओब्सेर्वेशन्स अच्छी हैं। एक शांत ,ठहरी हुई मगर सजग गतिमान मानसिकता के द्वारा रची गयी कहानियां। 
२ ऐसे ही एक दिन - इस कहानी में गाँव के लोगों की सहज विश्वासी प्रकृति के परिप्रेक्ष्य में मिथकों के भय के प्रभाव को दिखाया है। यह कहानी मुझे इसलिए पसंद आयी कि किस प्रकार लोगों में अज्ञात के प्रति भय का एक स्वाभाविक अंश होता है। और उनके सारे क्रियाकलाप इस प्रवृति से संचालित होते हैं।  
इस सन्दर्भ में एक पर्सनल बात याद आ गयी। मेरे जन्म के अवसर पर छेदी वाले बाम्हन ने कहा की यह माँ की नहीं सुनेगी। यह बात मेरी मम्मी ने इस हद तक अपने दिल में बिठा ली कि  फिर खुद अपनी आँखों से देखना ही छोड़ दिया। फिर इस मिथ्या विश्वास की बुनियाद पर उनका व्यवहार मेरे प्रति रुखा होता चला गया। प्रत्युत्तर में मैं भी विरोधी होती चली गयी ,तो आख़िरकार वही बात सच होकर रही। अन्यथा क्या वे कभी देख पायीं कि मैंने उन्हें जितना obey किया उतना किसी ने भी नहीं किया। पर चेतन - अवचेतन में मिथकों ,अज्ञात भयों की सत्ता इतनी गहरी होती है कि इंसान खुद अपनी आँखों  से देखना भूल जाते हैं। 
यह तो है की मानव सत्ता का एक हिस्सा अज्ञात ही रहता है। धर्म का मानवों पर इस बुरे असर को ,जब मैं सोचती हूँ तो सोच में पड जाती हूँ। पर कोई चारा नहीं। अलप सत्व वाले वाले मनुष्यों पर यह होगा ,कोई निदान नहीहै। 

Saturday, August 13, 2016

कहानीपन -8

१९ - 3- १४
पता नहीं यह टिपण्णी कैसे रह गयी |
वृन्दावन लाल  वर्मा की कहानियां पढ़ी |अच्छी  थी| कहानी को इतिहास में ले जाने से एक ऑटोमेटिक फायदा यह होता  है पाठक प्रिपेयर हो जाता है ,कहानीपन का मज़ा लेने के लिए |कि चलो सेटअप हमारे समय का नहीं है तो हमें अपने समय की मुसीबतों के पेंचो में उलझना नहीं पड़ेगा |बस दूर बैठे मज़ा लेते रहो |
वर्मा की टेक्निक अच्छी है ,पैनी है |चारित्रिक रूपांकन पैना है |मितकथन से काम लेते हैं  | ओवरव्यू टाइप |
post comments - प्रिय पाठक ,एक वह  वक्त था जब कहानीकार   कहानीकार होता था और पाठक पाठक |कहानी कही और मजमा समेट दिया |लेखक अपने घर राजी ,पाठक अपने घर राजी |आजकल  के पाठक तो घर में ही घुसे चले आते हैं |आधुनिक जिंदगी के अकेलेपन ने लेखकों की जिम्मेवारी बढा दी है |क्या करें ,कोई चारा नहीं |करना पड़ेगा |अस्तु
२३-८-१४
रघुवीर सहाय की कहानी पढ़ी -किले में औरत |ठीक थी |हिंदी साहित्यकार का पक्ष यह है कि वह आदमी को ,आदमियत को जानता है |पर नहीं जानता आदमी की लालसाओं को या जानकर भी मानना नहीं चाहता |क्योकि परम्परा द्वारा प्राप्त राजमार्ग का जब पता है तो इन्सान बीहड़ों में क्यों धक्के खाता है ,यह बात हिंदी साहित्यकार के समझ के बाहर की बात है |इसलिए बयानगी का अंदाज बेहद डाईसेक्टिंग ,तटस्थ ,निर्मम होता है |
पर यह अंदाज अपने स्टैंड की दृढ़ता में कितना ही ठोस हो ,पर आधुनिक भोगी पाठकों को हज़म कराना बहुत कठिन है |
३१-८-१४
रघुवीर की कई कहानियां और भी पढ़ी |ग्यारहवीं कहानी ,रास्ता इधर है ,मुठभेड़ |हमेशा हैवी जोंन  में रहते हैं | ये तेवर कविता में तो खप जाता है 'गंभीर ' कवि का दर्जा दिलाने के लिए पर कहानियों में नहीं |कहानियों में यूँ आदि से अंत तक तनावपूर्ण खिंचाव सहन नहीं होता |मनोरंजन तो चाहिए |   

Friday, August 12, 2016

note

बेटे का बर्थडे तो हुआ ,पर फंक्शन नहीं। अस्तु
चलो काम शुरू करते हैं। 
इस ब्लॉग के साथ मेरा एक ब्लॉग और भी है ,इल्ली। आगे उस ब्लॉग पर भी मैटर  शेयर करुँगी।
कहानीनामा पर प्रोफेशनल मैटर और इल्ली पर पर्सनल -प्रोफेशनल।
इल्ली -यह नाम मैंने इस ब्लॉग  इसलिए रखा ,क्योंकि यह नाम मुझे सबसे ज्यादा डिफाइन करता है। इल्ली कहतें हैं ,कैटरपिल्लर को। एक कीड़ा जो अपनी खोल में पड़ा पड़ा दुनिया भर की चीजें  खाता रहता है -सेब ,पत्ते ,कीड़े ,कुछ भी। मैं भी ऐसी ही थी। अपनी सुरक्षित हद की जिंदगी में जो भी विचार ,अनुभव मिला , खा लिया।
फिर एक वक्त्त  ऐसा भी आया की मुझे लगा ,अब मैं अपनी खोल से बाहर आकर दुनिया को अपने रंग-बिरंगे पंख दिखाऊँ  ,पर हिंदी में तितली शब्द के साथ सामाजिक रूप से अति गतिशील महिलाओं की अर्थछाया जुडी है ,जो की मुझे पसंद नहीं है। इसलिए इल्ली को मैंने इल्ली ही रहने दिया। वैसे यह इल्ली तितली से भी ज्यादा रंग-बिरंगी है (होप सो ). 

Wednesday, August 3, 2016

note

दिसम्बर में घर  की रेनोवेशन का जो काम शुरू हुआ था ,वह  अब कम्प्लीशन  पर है। इसलिये इन दिनों सुपर बिजी हूँ। + नेट की सेटिंग वगैरह सब डिस्टर्ब है. ये भी आईपैड से लिखा है। ११ अगस्त को बेटे का बर्डे है। सो शायद फंक्शन करेंगे ,भंडारा सॉर्ट  ऑफ़।
विल कम सून। 

Tuesday, July 19, 2016

vinay vachan

कहने से पहले ,कहने का हक़ ,अर्जित करना चाहिए। next post -next month

Monday, July 18, 2016

कहानीपन -7

8-8-14
आज गोरा ख़त्म कर लिया |गोरा का जैसा चरित्र शुरू किया था ,वैसा अंत नहीं किया |उसके क्रिस्तान होने के रहस्य को ही एकमात्र विस्फोटक कारण बताकर उसके पूर्व अर्जित व्यक्तित्व को इस प्रकार उडा देना 'अकुशल ' लगा |
अच्छे उपन्यास के तत्व -दोस और रवीन्द्रनाथ के दोनों नावेल्स को कम्पेयर करके ये बातें निकाली |

  1. मुख्य पात्र अक्सर बौद्धिक ही रखते है | |एक गौण पात्र साथ में लगा देते हैं |पर गोरा में विनय का पात्र ऐसा गौण भी नहीं है |
  2. नायिका का अतीव कोमल और अक्सर नायक के समकक्ष होना -सुन्दरता ,कोमलता,बुद्धि की तीक्षणता ,धैर्य ,तनुता ,पैने नक्श (अर्थात जिस समय सौन्दर्य के जैसे मानक स्थापित होते हैं ,उनमे से चुन चुन कर गुणों को नायक-नायिका में आरोपित करना )
  • एक ओर सुचरिता हिंदुत्व में ढली जा रही है ,दूसरी और गोरा खुद ब्रह्म बनने चल  पड़ा है|
  • आनंदमयी का चरित्र ठीक था |
  • हरिमोहिनी के चरित्र के उतार चढाव अधिक विश्वसनीय थे |
  • कैलाश का इमारत का निरीक्षण elizabeth का darsy के country side villa के  निरीक्षण जैसा लगा |
  • रवीन्द्र का पक्ष समझ नहीं आया |गोरा के चरित्र में हिंदुत्व की ऐसी गौरवमयी वीर्यवान छवि प्रतिष्ठित करके फिर उसी ढुलमुलपन की और झुक पड़ना  ;क्या है ? (अगर धर्म के स्वयंसेवक इस तरह नारी के मोह में विचलित होकर फिसलते गए तो धर्म रक्षक सेना का क्या होगा ? )
  • प्रकृति का पक्ष इनका बहुत स्ट्रोंग है |लगता है वर्षा ऋतु कवि  की प्रिय ऋतु है |राजर्षि की शुरुआत भी वहीँ से की है |
१४-८-१४
 राजर्षि शुरू किया था |अच्छा चल रहा है |बालकों के साथ राजा की क्रीडा के दृश्य अतिरंजित से हैं पर उस समय के (और वह भी भावुक हृदय बंगालियों के लिए ) पाठकों की मनोवृत्ति के अनुकूल हैं |

  • रस जगाने में कवि की प्रतिभा कुछ ज्यादा ही निखरती है |
  • प्रकृति निरीक्षण तथा उससे भी अधिक प्रकृति से उत्पन्न अन्तःप्रेरणा के दृश्य अद्भुत हैं |
  • प्रेमचंद को कठोर कहा जाता है |पात्रों को मनचाही दिशा में घुमाने में रवीन्द्र भी कम नहीं |
  • त्रिपुरा के राजा का इस तरह बिलकुल ही impractical दिखाना सही नहीं लगा |
  • भाषा तत्सम ,गंभीर ,शिष्ट हास्य परिनिष्ठित है |शिक्षित बंगाली रूचि के अनुकूल |
  • रसोत्पादक क्षमता  अच्छी है |
  • हिंदुत्व का प्रश्न, लगता है ,इनके लेखन का केन्द्रीय विषय है |

Sunday, July 17, 2016

कहानीपन -6

25-3-14
सविता पाठक की हिस्टीरिया ठीक थी |
फलाना -ढिमकाना   की आलू -चालू  bull shit .
ढिमकाना  फलाना  की  चालू आलू bull shit .
............ bull shit .
इसके बाद ऐसा हुआ की मैंने कम ज्ञात या अज्ञात  लेखकों की कहानियों पर हाथ लगाना ही छोड़ दिया |पता नहीं क्या बबाल निकल आएगा |इसके बाद अधिकतर  मैं रेफरेन्स के आधार पर ही पढने लगी |जैसे फेसबुक पर किसी लेखक की प्रशंसा देखी या कुछ इसी तरह |
२-५-१४
मार्केज की कहानी mamma's funeral पढ़ी |अच्छी लगी |ये तरीका है सही कहानियां कहने का |जीवन के भीतर की गन्दगी को ऐसे छांट कर रख देते हैं |
इनकी गाँव वाली (अफवाह ) कहानी सो सो थी |
(मार्केज पर कई टिपण्णी आगे भी हैं |चलो इन्हें आगे ही देखेंगे )
२-७-१४
मुक्तिबोध की तीन  कहानियां पढ़ी -काठ का सपना ,जंक्शन और क्लाड इथरली |ठीक ही थीं |जो कविताओं में लिखते हैं ,वही कहानियों में घड दिया है |आदर्शवादी आत्मा की बेचैनी |दार्शनिक चिंताओं की लेखकीय परिणिति |मजा नी आया |
१४-७- १४
इस्मत चुगताई की कई कहानियां पढ़ी |लिहाफ ,अंग्रेजों भारत छोडो ,जड़ें ,चौथी का जोड़ा |आजादी के आसपास मुस्लिम समाज की दास्तानें कहने के ढंग में आत्मीयता है | कहानियों में सब कुछ है | मार्मिकता ,हंसी-चुहल ,व्यंग्य ,तठस्थता  ,घटनाओं की डिटेलिंग |
२७-७ १४
रबीन्द्रनाथ टैगोर का गोरा पढना शुरू किया है | ७ भाग पढ़ लिए है |२ भाग तक तो खूब इम्प्रेस हुई थी ,पर तीसरे तक आते आते इसका plot कुछ कुछ jane austen के pride and prejudice से मिलता जुलता सा लगा |खैर
भारतीयता पर विचार गहन तो बहुत है ,पर देखो | आगे क्या ?
चरित्रांकन की समझ अच्छी है |एक दम ऐसी कि बिलकुल तीर भेदी नज़र की तरह सारी  असलियत खोल कर रख देती है |बरसात ,बरसाती आकाश ,बुँदे ,उस मौसम का गीलापन अच्छा व्यंजित किया है | 

Saturday, July 16, 2016

कहानीपन -5

१८-3-१४
उदय प्रकाश की कहानी 'अनावरण ' पढ़ी | ठीक थी |कहानी में यथार्थ स्थितिओं के कहने के ढंग में वर्णनात्मकता नहीं है ,इसलिए बड़े स्वाभाविक से लगते हैं |पाठकों के स्तर  को लेकर आश्वस्त से हैं |कहानी पढ़ती गयी |पर कुछ चौंकाने वाला सामने आ ही नहीं रहा था |एकदम सूचनात्मक ढंग से चल रही थी |कि ,पर ,उनके बीच ही यह उजागर हुआ कि अनावरण उस व्यवस्था और सिस्टम का है जो आदर्शों के खोखलेपन को ढो  रही है | अच्छी थी |एंड को तार्किक ढंग से संभाल नहीं पाए |
(इनकी दो टिपण्णी और हैं ,इकठ्ठा ही लिख देती हूँ )
२५-3-१४
उदय प्रकाश की कहानी 'अरेबा -परेबा  ' पढ़ी | ठीक थी | पर सपाट कथनात्मक ढंग से बच्चे की मासूमियत को खींचा सा गया है |९-१० साल के लड़के इतने मासूम भी नहीं होते |घटनात्मक क्रम जबरदस्ती की उत्सुकता पैदा करने के लिए रचा गया है |अंत वही फिलोस्फिकल |पवित्र , मासूम के  लुप्त होने का संताप |
१६-4-१४
उदय प्रकाश की कहानी 'जज साब ' पढ़ी | ठीक थी | बल्कि अच्छी लगी |बिलकुल आज के परिवेश को कहानी में रूपायित करती यथार्थवादी कहानी |जिंदगी की लत पर है |वह जो है कि  लोग आदी हो जाते हैं एक जैसी जिंदगी ,आदतों ,कपड़ों और भाषा के |कहानी में सच्चाई है ....|लगभग किसी भी तरह का भाव उत्पादन नहीं करती .....पर अपनी सच्चाई से ;अंत में ; शायद उसांस जैसा कुछ निकले |पठाक सहमत हो कि हाँ ऐसा ही होता है ,यही इस कहानी की उपलब्धि है |
परिवेश की वर्णनात्मकता में मेक्डोनाल्ड ,बीकानेरवाला ,ट्वेंटी -ट्वेंटी जैसी बातचीत डालकर यथार्थ को ज्यों का त्यों रखा है |बिना किसी अतिरिक्त दवाब के |कोई व्यंग्य नहीं ,विरोध नहीं ,'साहित्यिक ' औजारों के शून्य पर फिर भी अत्यंत प्रभावी |
हिंदी पर भी चुटकियाँ ली  हैं |लेखन होने की दुविधा को शेयर किया है |पर आम पाठक के लिए यह सुविधाजनक नहीं होता |
कुमार अनुपम की कविता 'बातूनी लोग ' का कहानी संस्करण लगता है |
पर शीर्षक  'जज साब ' क्यों रखा | ज़िन्दगी की लत होना चाहिए था |
पर इस तरह के जीने को लत क्यों कह रहे है | जीना तो जीना है |may be passionlessness के लिए कहा होगा |

पॉज़ -3

रेफरेंस वाली बात भी अच्छी निकल आई |यह बात तो है की रोज लिखने का अभ्यास बनाया जाए तो कई बार अनजाने में ही अच्छे पॉइंट्स निकल आते हैं |
कई लोगों के लिए उनकी भाषा ,एक जैसा रहन -सहन ,माहौल उनके रेफरेंस होते हैं | दे फील कम्फर्टेबल |
खैर ..
इस रेफरेंस के कारण मुझे खुद पर इतना भरोसा होता है कि मैं तो किसी से भी जीत लूंगी |कोई भी मेरे सामने क्या टिकेगा ? रजिया गुन्डों में नहीं फंसी बल्कि गुंडे ये सोचेंगे कि ये किस रजिया के सामने फंस गए |जो भी है |अपनी एक आदत की बात मैंने यहाँ शेयर करी |
शायद आगे की बातचीत में प्रसंगों के सन्दर्भ में यह ज्यादा क्लीअर होगी |
अब आगे बढ़ते हैं |  

Friday, July 15, 2016

पॉज़ -२

जैन शास्त्रों के विषय ,आजकल की साइंस की भांति ,टेक्नीकल ज्यादा हैं | जैसे बाहर की दुनिया (पाठक गौर करें इस शब्दावली पर ) में धर्म के खिलाफ जो आवाजें सुनाई देती हैं ,उनमे प्रमुख रूप से यह बात होती है की औरतों के दमन ,जाति व्यवस्था आदि को सुदृढ़ करने में धार्मिक शास्त्रों की बहुत भूमिका है | किन्ही विशेष धार्मिक प्रतीकों के पीछे लोगों का उन्माद और पागलपन कोई इग्नोर करने वाली बातें तो नहीं हैं |ये बातें सच ही होंगी |
जैनी तो ,हाल-फ़िलहाल तक ,इन बीमारीओं से(थैंक गॉड )बचे हुए हैं |यहाँ  तो हमने किसी गुरु के मुख से स्त्री विरोधी या दलित विरोधी बातें नहीं सुनी |हाँ अनुशासित करने की भाषा अवश्य सुनी है |खैर
लेकिन सम्प्रदायवाद इनमे भी कम नहीं ,पर ये बेचारे आपस में उलझ कर ही अपनी गर्मी का शमन कर लेते हैं |
 जैन शास्त्रों के विषय ,मुख्यत ;,चार अनुयोगों में विभाजित है |चरणानुयोग ,करणानुयोग ,कथानुयोग और गणितानुयोग |ये समझ लीजिये कि सारी  हिस्ट्री ,जिओग्राफी ,बॉटनी ,फिजिक्स ,साहित्य ,कला ,भाषा विज्ञान इनमे समाया है |
इसलिए इन शास्त्रों का अध्ययन मेरे लिए वैसा ही है ,जैसे मैं अन्य लेखकों की किताबें पढ़ती हूँ | शास्त्र भी  किताबें ही तो हैं |
बस एक फर्क है |कि इनमे लिखी बातों की मुझे श्रद्धा है | ऐसा नहीं कि मुझे हर बात पढ़ते ही समझ में आ जाती है या मुझे कोई बात गलत नहीं लगती पर जैन शास्त्रों में लिखी बातों को मैं काटती नहीं हूँ |मैं यही समझती हूँ कि हो सकता है मुझे अभी समझ नहीं आ रही हो |सोचती रहती हूँ ,गुनती रहती हूँ |कभी मौका लगता है तो किसी गुरु के यहाँ शंका निवारण कर लेती हूँ |
इनके अध्ययन से ही चीजों को ग्रहण करने का मेरा एक रेफरेंस बन गया है |इनमे जो भी विषय हैं -गति ,
जीव, जीव का लक्षण ,योग ,उपयोग ,कर्म ,काल इत्यादि -उन विषयों के आधार पर ही मेरी थॉट प्रोसेस काम करती है |
फॉर एग्जाम्पल -अभी दोस का जिक्र आया था ,तो उनके उपन्यास में मैंने हिसाब लगाया कि (तारीख वही है- २८-११-१३ )सत्य (जो मेरे रेफरेन्स के मुताबिक जैन शास्त्रों में वर्णित सत्य है ) और काव्य सत्य की खाई को यह उपन्यास इस बिंदु पर तो पूरा पाट देता है कि व्यक्ति के कर्मों का कर्ता व्यक्ति स्वयं है और वही भोक्ता भी ,ईश्वर नहीं है |(ये सब लिखते हुए मुझे कितनी हंसी आ रही है ,बता नहीं सकती ) बेहद तार्किक ,विचारोत्तेजक ढंग से उपन्यास सामजिक ताने-बाने की क्रूर स्थितियों में फंसे ईश्वर भीरु लोगो की बेचारगी और निष्क्रिय आस्था की व्यर्थता तथा inevitable अंत को सामने रखता है कि एक बार तो दृढ विश्वासी का विशवास भी हिल जाए (गौर करना इस बात में एक रचना के उद्देश्य और इम्पैक्ट की बात आ गयी है ) इस बिंदु पर यह एक पुरुष लेखक की दिमागी ऐयाशी नहीं है ,बल्कि सच्चाई से टकराने की एक ईमानदार कोशिश है |हाँ ,निष्कर्ष से असहमति हो सकती है |(टिपण्णी क्लोज )
जैन दर्शन भी ईश्वर के अस्तित्व को उस तरह नहीं मानता ,कि वह  कहीं समुद्र में लेटा  है और लक्ष्मीजी उनके पैर दबा रही हैं एटसेट्रा |
 अब ज़रा इस बात को रोद्या की मां के नजरिये से देखें |अगर उसका ये विश्वास है की एक दिन सब ठीक हो जाएगा ,पर कुछ ठीक हुआ नहीं तो (उसके विशवास के मुताबिक )इस बात को ऐसे भी तो कह सकते हैं कि अगर रोद्या की नौकरी लग जाती तब तो सब कुछ ठीक हो ही जाना था |पर लड़का ईश्वर का द्वेषी निकला और इसी बात का दंड उन्होंने भुगता |
तो सत्य का निर्णय कैसे हो ?
रोद्य का विश्वास ठीक है या उसकी मां का |तेरा सत्य सही है या मेरा |
पर कोई सत्य तो ऐसा होगा जो तेरे -मेरे मानने से नहीं ,बल्कि सत्य होने से सत्य है -उसे कोई माने या नहीं  |वह  बदलता नहीं है |
 जैन दर्शन में या किसी भी किताब में  ,मैं इसी सत्य की खोज करती हूँ |
आप कहोगे कि यह तो सरासर गलत है |अपनी दार्शनिक मान्यताओं को साहित्यिक आलोचना में आरोपित करना तो पूर्वग्रह हुआ |
नहीं ऐसा नहीं है |..contd  
  

Thursday, July 14, 2016

पॉज -1

मेरी एक बुरी आदत है |सोचा अभी कह दूँ , बाद की बातचीत में ये एंगल भी साइड बाई साइड चलता रहेगा |
.....................
मेरे जन्म से जैन हूँ | इसे संयोग कहिये या एक प्रकार की परम्परा से जुडाव ,कि ,मेरे जीवन में जैनिज़्म का प्रभाव शुरू से रहा है | शुरू से हमारे घर के आसपास स्थानक थी ,तो जैन साधू-साध्वियों से वास्ता रहा |यह प्रयत्नज भी रहा होगा कि बड़ों ने सोचा होगा कि घर स्थानक के आसपास ही लेते हैं ,धार्मिक चर्या के परिपालन में आसानी रहेगी | बीच के कई बार यह क्रम टूटा भी ,कि , कई बार हम दूर भी रहे | (दिल्ली में तो किराए के घर में थे |अब तो अपना है ,दोनों जगह |मायका भी ,ससुराल भी ) पर वह  अधिकतर साल दो साल या अधिक से अधिक 3-4 साल के लिए | फिर वापस संयोग जुड़ जाता था |
शुरू में तो यह साधू-साध्वियों के दर्शन तक सीमित था | जैसे अपने बड़ों के साथ चले गले ,दर्शन करके वापस आ गए |मम्मी कहती है कि तेरे बाबा (गन्नौर में ) तुझे 'अठन्नी दूंगा ' कहकर स्थानक ले जाते थे | उस समय ,समझ तो क्या थी ,पर संत अच्छे लगते थे | खासकर गुरनीजी के यहाँ शाम को भजन सुनते थे  ,तो कई स्तुतियाँ मुझे बचपन में ही याद हो गयी थी |पीतमपुरा (मैं ६ या ७ वी  में होंगी ) में हमने सामायिक के ९ पाठ ,कुछ बोल वगैरह सीखे थे | पर मेरे जीवन में जैनिज़्म का विशेष जुडाव १९९७ में हुआ ,जब सेक्टर -3 में सेठ जी और भगवन जी का चातुर्मास हुआ | उस दौरान गुरूजी के प्रवचनों के माध्यम से अपने धर्म के कई कांसेप्ट से परिचित हुई | भगवन जी की गुरु धारना भी ली  |सीखने की लगन भी जागी | वीर  स्तुति (प्राकृत ) याद की थी |और भी कई बातें थी ............
बाद में शास्त्रों के स्वाध्याय का क्रम चला (जो की आज  भी जारी है )....
इन सब बातों को यहाँ कहने का मकसद ये है कि मैं पाठकों के सामने अपने माइंड का रेफरेन्स बताना चाहती हूँ |
हर एक इंसान का एक रेफरेन्स होता है | मानी जिस पर वो टिका होता है ,जिस पर उसे विशवास होता है | यह कोई व्यक्ति भी हो सकता है ,परिवार भी ,एक व्यवस्था का ढांचा भी |
समय बदलने के साथ ये रेफरेंस बदलते भी रहते हैं |जैसे ब्याह  के अगले दिन से ही एक लड़की यह जान लेती  है (इंडिया में )कि अब ससुराल ही उसका घर है और उसका गुजारा अब यहीं होना है |रेफरेंस चेंज
मेरे जीवन के रेफरेंस  भी बदलते  रहे |
बचपन में मैं दादी -बाबा की ज्यादा सुनती थी ,क्योंकि देखिये ना ,घुमने के साथ साथ पैसा भी मिलता था | तो एक बच्चा क्यों विश्वास नहीं करेगा |
बाद में मुझ पर मेरे पिता का ज्यादा प्रभाव था |दिल्ली का खुला आसमान ,और चौड़ी सडकें ,मैंने देखी  जरुर पर पिता की उंगली पकडे हुए |
फिर जैसे अण्डों में से बच्चे निकलते हैं ,आसमान को देखते हैं ,अपनी आखें मलकाते हैं  ,वैसे ही मैं भी स्कुल -कालेज -अक्षरों की नई -नई दुनिया देखी |नई -नई बातें सीखीं |पर मेरा रेफरेंस हमेशा मेरे पिता ही थे |मेरे कभी ज्यादा दोस्त भी नहीं बने |इस बात को कुछ भी कह लो |मेरे अन्दर हिम्मत नहीं थी या आज में याद करूँ ,तो वे कभी ज्यादा क्रूर नहीं थे | authoritative थे ,पर किसी का व्यक्तित्व कुचल दें ,ऐसे नहीं थे |
पर अक्षरों के कारण एक अलग रेफरेन्स सेंटर था ,जो मेरे अन्दर develop हो रहा था ,या कहूँ ,१८-२० साल की उम्र तक मैं कई रेफरेंसों के जाल में उलझ चुकी थी |सही क्या ? गलत क्या ? इसका मुझे ज्यादा अंदाज नहीं था |...............................
फिर सेठजी मिल गए | उनके पास बैठना ऐसा था कि किसी झील के किनारे आ बैठे हों |उनकी शांत -दांत छवि केवल दर्शन मात्र से सारे संताप हर लेती थी |
आप कहोगे भक्ति है |
मैं कहूँगी 'हाँ भक्ति है |'
तो जीवन में ,गुरु के रूप में एक नए शक्तिशाली रेफरेन्स ने प्रवेश किया |
पर गुरु से मेरी संलग्नता केवल शास्त्रों की आज्ञा लेने और स्वाध्याय में कठिनाई निवारण तक रही |क्योंकि भगवन और सेठजी ,दोनों ही उम्र में तो मेरे दादाजी के समकक्ष बैठते है |अत; पर्सनल प्रॉब्लम कभी पूछी नहीं | कई लोगों से गुरुओं का जुडाव काफी पर्सनल  हो जाता है |(बल्कि ज्यादातर लोग अपनी घरेलु समस्याओं के कारण ही ज्यादा जुड़ते हैं |यह भी हमारे (हमारे क्या ,सभी जगह यही हाल है )समाज का सच है |अस्तु )
अब भगवन जी का तो देवलोक हो चूका हैं ,सेठजी ने तैयारी कर ली  है (उनकी संलेखना चल रही है |गोहाना जैन स्थानक में ) तो जीवन किस पर टिका है ?
अब जीवन गुरु के नाम पर टिका है |तुलसी ने लिखा है -राम से भी बढ़कर राम का नाम है |एक बार मैंने भगवन से सवाल पूछ लिया था (जी हाँ ,मूर्खताएं मैंने कम नहीं की हैं ) तो वे हंसकर बोले ,गुरु तो वही रहेगा |आज याद करती हूँ कि कितनी गहरी बात थी |
और टिका है शास्त्र स्वाध्याय पर |मुझे जैन शास्त्रों पर अगाध श्रद्धा है |इतनी बुद्धि तो कहाँ है की सभी समझ लूँ पर फिर भी कोशिश करने में तो हर्ज नहीं | ..................contd    
   

Tuesday, July 12, 2016

कहानीपन ? रजिया फंस गयी गुंडों में

६-१२-१३
निराला की कहानी लिली और व्यंग्य श्रीमती गजानंद शास्त्रानी पढ़े |कहानी ठीक थी  (उस समय के भारतीय परिवार के सन्दर्भ में ),व्यंग्य भी ठीक था |बाल कहानियां ,ऐसा लगा कि श्रुत परम्परा में पहले से हैं |
(बीच की कई टिपण्णी स्किप कर रही हूँ ,वे कहानियों पर हैं भी नहीं | जस्ट यह बताने के लिए की पढने में इतना गैप नहीं आता | )
4-3-१४
आज एक कहानी पढ़ी -मनोज पांडे की ''पुरोहित जिसने मछलियाँ  पाली ''| आदि से अंत तक रामदत्त की जिंदगी का वर्णन ही कर दिया |खासी औपन्यासिक सी थी |अच्छी नहीं लगी |जी ख़राब हो गया |पर वो शायद कथ्य के चुनाव के कारण (इस कहानी में कुछ पोर्शन चाइल्ड अब्यूस पर  है ) था |अंत बिलकुल बेमजा था | idealistic .कुनेन  की गोली खिलाने के बाद कोई जलेबी कैसे दिखा सकता है ?
पर यह है की मनोज की भाषा एकदम सहज है |तुरंत समझ में आने वाली |कोई टेक्निकेलिटी नहीं |स्थितियों की रचना भी सहज है |स्वाभाविक सी | और कहते -कहते बीच में जिंदगी के फलसफे पर जो एकाध जगह गंभीर हो जाते हैं ,सो वह  भी अच्छा ही लगता है  |
५-3-१४
मनोज की एक कहानी और पढ़ी ''वह  बुढा जो शायद कभी था ही नहीं ''|एक और पढ़ी थी पहले -लड़की की हंसी |शीर्षक लम्बे रखते हैं |
यह कहानी ठीक थी |ईश्वर सम्बन्धी मान्यताओं ,अंधविश्वासों ,सम्प्रदायों  के खोखलेपन को प्रस्तुत
करती है |ठीक थी |मनोज की चिंताएं और प्रस्तुतीकरण का ढंग अच्छा है |
पत्नी और छुट्टी का दिन  -यह कहानी भी मनोज की थी | कहानी में कुछ भी नहीं |बल्कि कहिये  कथ्य या कथानक तो है ही नहीं ;पर फिर भी पढने लायक है क्योकि नायक की मनस्थितियों और भाषा से पाठक (पुरुष पाठक रिलेट कर सकता है )
नोट ;यह टिपण्णी  बताती हैं की कई बार भाषा या कहने के ढंग से भी पाठक कहानी का रस ले लेता है |
१६-3-१४
अमरकांत की पोखरा पढ़ी |समझ ही नहीं आई |कहानीपन क्या था ?

Monday, July 11, 2016

पोस्ट कमेंट्स -अपराध और दंड

यह तो थी  इस उपन्यास पर लिखी कुछ अनौपचारिक टिपण्णीयां ;
कुछ अन्य  विचारणीय बिंदु ;
यह आलोचना कि रोद्या ,सोन्या जैसे पात्र साहित्यिक हैं ,सही होते हुए भी ;इनमे एक अन्य विचारणीय पक्ष और भी है |लोग कहते हैं कि रचनाओं में लेखकों का अपना जीवन होता है | लेखक क्यूँ लिखता हैं ? इस प्रश्न की  भी अलग अलग थियोरियां हैं |कोई कहते हैं (सुधा अरोरा )कि उन्हें रिलीफ मिलता है ,कोई कहते हैं (सआदत हसन मंटो )कि रोटी के लिए लिखता हूँ | अभिव्यक्ति वाली थ्योरी तो है ही |
इन थिओरियों से अलग ज़रा इस बात पर भी गौर करें कि किसी कहानी में एक पक्षकार तो होता ही है |अर्थात कोई भी कहानी किसी एक नजरिये से पेश की  जाती है |यह नजरिया लेखक का ही होगा | उस नजरिये का वाहक पात्र स्वयं उस कहानी में मौजूद हो भी सकता है ,नहीं भी |पर उसे पहचानना मुश्किल नहीं होता |
इस उपन्यास में रोद्या लेखक के पक्ष का वाहक पात्र है |(यह तो स्पष्ट है ही )
अब रोद्या का जीवन कितना स्वयं लेखक के जीवन से मिलता -जुलता है ,ऐसे तथ्य तो अन्य साक्ष्यों से जुटाए जा सकते है |
पर एक बात है -दोस का समय रूस में मार्क्सवादी चिंतन के उभार का समय था ,जिसके फलस्वरूप वहां लाल क्रांति भी हुई |अर्थात गहरी उथल-पुथल का समय |एक लेखक के लिए अपने समय की हलचलों को इग्नोर करना संभव नहीं होता |बल्कि मैं कहूँगी कि लेखन के क्षेत्र में कालजयी रचनाओं के तैयार होने का सबसे उत्तंम समय यही होता है |
लेखन कार्य मूलतः चिन्तनात्मक कार्य है |यह एनर्जी अलग प्रकार की  होती है | इसका सम्बन्ध व्यक्ति की  विचार शक्ति से है |विचारने का कार्य अधिकांश sitting का काम है ,जो की सामान्य पाठकों को बेहद उबाऊ ,अक्रियाशील ,बोरिंग सा लगता है |परन्तु इस कार्य का भी अपना महत्व होता  है |
दूसरी बात है कि - किसी भी प्रकार की  एनर्जी श्रेष्ट या हीन नहीं होती | यह तो उस पर्टिकुलर समय की बात है कि उस युग में कौन सी एनर्जी को सम्मानित किया जाता है |eg आजकल गंभीर ज्ञान के विद्वानों की उतनी पूछ नहीं है |
दोस का समय गंभीर चिंतकों के सम्मान का युग था | स्वयं दोस ने अपनी रचनाओं में विद्वानों के प्रति गहरा  सम्मान दर्शाया है |उपन्यास में रोद्या की माँ ,उसकी सतत बेकारी के बावजूद ,उसकी क्षमता पर कभी संदेह नहीं करती |(हमारे यहाँ ऐसा नहीं है | यहाँ अगर किसी  उच्च शिक्षित को नौकरी न मिले तो घरवाले समझेंगे ,ये ही नालायक है |)
रोद्या की  नाकामी दोस की नाकामी हो सकती है | हो सकता है कि उन्होंने किसी दुसरे प्रकार का जीवन जीना चाहा हो  |परन्तु रोदया के माध्यम से वे  जो स्थितियों की इतनी बारीकी तक पहुंचे हैं और समस्या को इतनी गहराई तक जाना है कि इन्ही सब चीजों को समझने में एक साहित्यकार (अथवा कहें कि एक संवेदनशील व्यक्ति ,साहित्यकार तो वह बाद में बनता है  ) की उम्र गुज़र जाती है समाधान तो कहाँ से लायें ? समस्या की  पेचीदगी को सुलझा दिया ,यही क्या कम है |
ऐसी कहानियों को मैं तीव्र भावावेग (आलोचनात्मक )वाली 'बंद '(कि लेखक एक प्रकार के भावावेग में बंद है ,उससे बाहर निकलने के लिए छटपटा रहा है )कहानियां कहती हूँ |



अपराध और दंड -3

२८-११-१३
स्विद्रिगाईलोव ने आत्महत्या कर ली |
जैसे कई फ़िल्मकार किसी सीन का महत्व दिखाने के लिए उसे कुछ देर तक  स्क्रीन पर स्टिल रखते है (eg तारे जमीं पर फिल्म में दर्शील का पानी पर पड़ते हुए रोशनी के टुकड़े को देखना ),वैसे ही दोस ने भी इस भयानक अंत के लिए स्विदरी के उस दिन के क्रियाकलाप ,उसका अकेलापन ,अकेलेपन की  भयानकता ,व्यवहार के  अजनबीपन को काफी खींचा है |
उपन्यास तो पूरा हो गया और यह रहा लेखा -जोखा -
अपराध और दंड एक विचारात्मक -आलोचनात्मक यथार्थपूर्ण उपन्यास है जिसमे रस्कोलनिकोव (रोद्या ) के माध्यम से इस बात पर विचार किया गया है कि आखिर अपराध है क्या ? और उसका दंड क्या हो ?
जब समाज की  बुनावट ऐसी हो जिसमे उपलब्ध साधन कुछ व्यक्तियों के इर्द-गिर्द हो सिमट जाएं ,तब अपराध कि सही व्याख्या क्या हो ?यह उपन्यास जिन बातों  को बेहद असरदार ढंग से उठाता है वह हैं -

  1. व्यक्ति की साधारणता और  असाधारणता (मैंने अपनी लाइफ में कुछ लोग ऐसे देखे है जो स्वाभिमानी थे | जिनके भीतर आग थी ,सम्मान के साथ जीने कि और जिन्होंने  इसके लिए कड़ी मेहनत ,अनुशासन ,बुद्धि ,कौशल का उपयोग किया |ऐसे लोग अक्सर विशेष भावनाशील ,संवेदनशील,नाजुक दिल  होते है |वे अपने जीवन के रास्ते स्वयं निकलते हैं |उनका जीवन संघर्ष जीवन की  परिस्थितिओं के बीच में से निकलता है | शायद ऐसे ही लोगो को असाधारण कहते होंगे | )
  2. ईश्वर में अनास्था (निष्क्रिय आस्थावाद मनुष्यों को कितना निरीह और भयभीत बना देता है ,इसका प्रमाणिक चारित्रिक चित्रण इस उपन्यास की  ऐसी उपलब्धि है ,जिससे यह all time क्लासिक बना ही रहेगा | वह स्थान इससे कोई छीन नहीं सकता है |)
रोद्या क्रम दर क्रम जीवन के महत्वपूर्ण प्रश्नो से जूझता ,अपनी परीक्षा निर्ममता से करता है पर अंत में किसी निष्कर्ष तक नहीं पहुंच पता सिवाय इसके कि अंतत जीवन ही स्वीकार्य है |अर्थात रोद्या को रजुमिखिन बन जाना चाहिए - वह पात्र जो अब तक रोद्या की गुरु-गंभीर छवि के आगे हल्का ,अगंभीर लगता था
पर क्या यह संभव है कि सामान्य तर्कशक्ति तथा बुद्धि से युक्त व्यक्ति अपने चारों ओर की  तर्कहीनता को नज़रन्दाज़ करके सिर्फ जीवन का वरण करे ? रुसी कहानी यहाँ खत्म होती है |मैं समझती हूँ भारतीय कहानी यहाँ से शुरू होती है | उपर्युक्त प्रश्न का उत्तर है - हाँ |अकेले अपने दम पर महासमुद्र पार करने वाले होते हैं ,परन्तु विरले होते है |भारत की दर्शन परम्परा इस महाप्रशन की गंगोत्री में से निकली है |
उपन्यास के high  points हैं जहाँ दोस बेहद सफल हैं -

  1. पोर्फिरी और रोद्या का चोर-पुलिस का मानसिक खेल 
  2. कटरीना द्वारा आयोजित मृत-भोज का वर्णन -वर्ग भेद ,भेद से उत्पन्न स्थितियां ,मानसिकता 
  3. रोद्य का अकेलापन ,मानसिक दशा का सूक्ष्म विवरणात्मक वर्णन ,तनाव ,तनाव  का असर ,hallucinations ,अनिश्चित मानसिक अवस्था (अर्थात उपन्यास के शीर्षक दंड की  पूरी प्रक्रिया तो वह पहले ही भुगत चूका है |)
उपन्यास के low points

  1. सारा केन्द्रीकरण एकमात्र रोद्या पर कर दिया गया है |वह जो कह दे ,जो कर दे ,जो न कर दे -वही ठीक है |
  2. रजुमिखिन एक जीवंत पात्र है और कारण समझ में नहीं आता कि क्यों उपन्यासकार ने इस पात्र को विकसित नहीं किया ,मात्र इसलिए कि वह बोद्धिक नहीं था |बल्कि रोद्या के मुकाबले इस पात्र को अधिक प्रभावशाली बनाया जा सकता था ताकि पाठकों के पास पहले से ही अपना ऑप्शन चुनने का मौका रहे |पर रोद्या को अधिक प्रभावशाली दिखाकर पाठकों को मजबूर किया गया कि वे रोद्या की नाकामी को अंत तक झेले |जिस निष्कर्ष तक दोस अंत में पहुंचे है और जो महज ३-४ पैरा में निपटाया गया है वह निष्कर्ष रजुमिखिन के रूप में उपन्यास में पहले से मौजूद था |बस अगर उपन्यासकार का ध्यान उस ओर गया होता तो |तब वे बेहतरीन जीवन स्थितियां  रचकर इस उपन्यास को एकांत बौद्धिक होने से बचा  सकते थे|अब तो लगता है कि निष्कर्ष बौद्धिक ही रह जाएगा क्योकि खून के आखिरी कतरे तक का तनाव झेल चुकने ,बेकारी ,शारीरिक कमजोरी तथा निकम्मेपन के कारण लगता नहीं कि रोद्या ८ साल की जेल काटकर दोबारा नॉर्मल जीवन जी सकेगा |  
  3. रोद्या और सोन्या साहित्यिक पात्र है ,जिन्हें साहित्यकार अपने मानस में रचते है |वे ही स्त्री -पुरुषों को ऐसा  व्यक्तित्व देते है | पुरुष -स्वाभिमानी,बौद्धिक ,विचारवान ,दयालू ,कष्ट्सहिष्णु |स्त्री -कोमल ,लज्जावान ,आंतरिक पवित्रता की दीप्तिवाली ,आभामयी,तेजमयी,प्रेममयी |


 भाषा बहुत चुस्त है (अनुवाद में भी) सीन-निर्माण ,पात्रों का आना जाना ,सीन बदलाव ,आकस्मिकता ,नाटकीयता रोचकता का निर्माण करती है |

Sunday, July 10, 2016

अपराध और दंड -2

२४-११-१३
७ भागो में से ६ पढ़ लिए हैं |समापन पहले पढ़ लिया है |उपन्यास में २ दर्दनाक मौतें हो चुकी हैं |एक क्लर्क की ,दूसरी उसकी पत्नी कटरीना की |रोद्या  की माँ समापन में मरी |वैसी ही दर्दनाक ,निराशापूर्ण |

  • कटरीना और उसकी मालकिन की rivarly अच्छी दिखाई गयी है |सचमुच एक दूसरे के पंजों में फंसी औरतें ऐसे ही बिहेव करती हैं |
  • क्लर्क की नौकरी छूटी तो वह  शराब क्यों पीने लगा ? (अनास्था ,अपने स्वयं के जीवन उद्देश्य के प्रति किंकर्तव्यविमूढ़ता लोगों को ऐसा ही बना देती है |
  • प्योत्र पेत्रोविच के रूप में धनी  वर्ग के अहंकार ,दंभ ,मक्कारी का चित्र खींचना दोस का highlight पॉइंट है |ऐसी एक कहानी भी पढ़ी थी |
  • क्या कारन है की प्रेमचंद की तरह दोस ने भी गरीब ,वंचित कमजोर और सामाजिक रूप से कुचले हुओं को सच्चा मानवीय ,नेकदिल,रहमदिल,संवेदनशील दिखाया है |चाहे रोद्या  हो ,उसकी माँ हो ,बहन हो या सोन्या हो |क्या  कुचले हुए लोगों की संवेदना 'प्रबल' हो जाती है ?what is the science behind it ? उपन्यास का tension -point बहुत high रखा गया है और इसकी कसावट कहीं भी ढीली नहीं पड़ी है |
  • ५वे भाग में रोद्या ने सोन्या के आगे वे कारण कहे ,जिनके वशीभूत होकर उसने बुढीया को मारा |इनमे सबसे प्रबलतम कारण यह था कि वह खुद को यह साबित करना  चाहता था कि वह  जूँ नहीं है ;साधारण नहीं है |  असाधारण है |अर्थात वह अपनी शक्तियों की आजमाइश (बुद्धि ,साहस ,जोखिम उठाने की क्षमता )करना चाहता था | दूसरे वह तार्किक रूप से इस बात से संतुष्ट हो चुका था कि उसकी स्थिति को ऊपर उठाने का भार स्वयं उसके ऊपर है ,ईश्वर पर नहीं |अर्थात ईश्वर पर अनास्था ने रोद्या को इतना दुस्साहसी बनाया |इसी कारण वह बुढ़िया की हत्या को तार्किक रूप से सही साबित  कर सका |उसे सोन्या,कटरीना,अपनी मांऔर बहन जैसी निष्क्रिय आस्थावादी औरतों से गहरी चिढ और नफरत है ,जो केवल अप्रतिरोधी सहनशक्ति के कारण दूसरों के लिए सतत दुःख का स्रोत हैं |
  • फिर रोद्या नाकाम क्यों हुआ ?ठीक यही प्रश्न वह अपने आप से पूछता है और इस नतीजे पर पहुँचता है कि वह 'कायर 'था |मैं भी यही मानती हूँ या कह लीजिये हत्या आखिर जुर्म है और ईश्वर  के इस कानून के खिलाफ जाने की हिम्मत लेखक में भी नहीं ,चाहे वह खुद ईश्वर को न मानता हो |
  • रोद्या की अनास्था क्लर्क की अनास्था से भिन्न है |
  • नरेश नदीम ने अनुवाद अच्छा किया है  |.....contd 

Saturday, July 9, 2016

अपराध और दंड

१६ -११ -१३
फ्योदोर दोस्तोव्यस्की का उपन्यास शुरू किया है 'अपराध और दंड '| ऑनलाइन(hindisamay.com)  | दूसरा भाग चल रहा है |रोद्या  ने बुढ़िया और उसकी बहन  को मार दिया है | आलोचनात्मक यथार्थपूर्ण वर्णन पढने का मज़ा ही कुछ और है |जगह जगह रोद्या  की मनस्थिति ,उसके क्रियाकलापों के सूक्ष्म ब्योरे ,घटनाओं की तार्किकता ,आकस्मिकता तथा सबसे बढ़कर पात्रों की व्यक्तिगत विशेषता को पहचानती अचूक दृष्टि ने मजबूर कर दिया है की एक- एक शब्द ध्यान  से पढूं |उसकी गहराई तक जाकर पढूं |may be जितनी  गहराई में डूबकर लिखा गया है |
रोद्या (मुख्य किरदार ) का अकेलापन ,खालीपन ,बेतरतीबी  ,संवेदनाओं का विश्लेषण अद्भुत है |फिर भी मैं इन सब से किंचित दुरी पर रहना manage कर लेती हूँ क्योकि मेरी परवरिश ,शिक्षा अलग वातावरण में हुए हैं -भारतीय  वातावरण में हुए हैं| और  यह जानना दिलचस्प है (चाहे किताबो के जरिये ही सही )कि कैसे होते हैं वे लोग जो भारतीय नहीं होते |
२०  -११- १३

  • तीसरा भाग चल रहा है |अब कुछ interest बनने लगा है |ठंडे ,शांतचित से बैठकर लिखना किसे कहते हैं ,यह कोई देखे |power of observance
  • russia में भी दो नामों का चलन है |प्रत्येक पात्र के दो नाम है  |
  • रोद्या के अकेलेपन की वजह उसका असफल प्रेम भी है |
  • रोद्य की बहन का गरिमापूर्ण वर्णन |इंडिया के कंगाल तो ऐसे नहीं देखे -may be -मेरा अनुभव ही क्या है ?-शायद education का असर हो -शायद इसीलिए वहां लाल क्रांति संभव हुई |
एक बात और -आकस्मिकता अर्थात घटना की घटिती किसी भी कहानी में सहेतुक होती है ;पर इसे मान लेने के कारण दोस में यह सहेतुक होते हुए भी संयोग लगती है जबकि प्रेमचंद में 'कलात्मक कारीगिरी '|फॉर एग्जाम्पल -रोद्य का लिजावेता को यह कहते सुनना कि उस रात बुधिया अकेली रहेगी |इस बात के संयोग को दोस ने घुमावदार भाषा में कहकर पठाक के मन में जमा दिया है |पर may be ,यह वह  बिंदु है जब रचना अपने रचना क्षेत्र से बाहर आकर यथार्थ जीवन क्षेत्र में प्रविष्ट होने का दावा करती है |एक ऐसा बिंदु जिसके भीतर रहता हुआ पाठक  सहसा खुले सिरे की ओर देखकर पल भर के लिए सचेत होता है |क्योकि क्या आखिर सचमुच का जीवन ऐसे संयोगो से रहित होता है ?क्या एक बिंदु पर आकर हम सब destiny में विश्वास नहीं करने लगते ?(यहाँ हम देखे कि क्लासिक होना क्या होता है )
२१-११-१३
चौथे भाग पर पहुच गयी |उफ़ !!!!!! रोद्या  का तनाव (क्या लेखक ने भी यही तनाव नहीं झेला होगा )

  • सपनो का कलात्मक उपयोग किया है | अब तक 3-4 बड़े सपने आ चुके हैं \एक घोड़ी वाला ,एक रोद्य के जन्म स्थान के परिवेश को दिखाता है ,तीसरा क़त्ल करने से पहले नदी के किनारे ,चौथा एक आदमी उसे हत्यारा बुला रहा है 
  • रोद्य गहन बुद्धिमान तथा विचारशील है |संवेदनशील भी |
  • रोद्य के अतिबुधिमान चरित्र के आगे रजुमिखिंन के साधारण पात्र की योजना पाठकों को अति गंभीरता के अटैक के बचने के लिए की गयी लगती है |
  •  रजुमिखिन को देखते ही मैं समझ गयी थी कि इसका टांका अ०दोत्या के साथ जुड़ेगा (सरसता की योजना )
  • देखें जिस खुले सिरे की बात आई है क्या वह  अंत में कहीं जाकर खुलेगा भी या एक अति कुशल पुरुष लेखक की दिमागी ऐयाशी निकलेगी जो पाठकों को अपनी मेधा ,प्रतिभा से चकित ,थकित ,आतंकित कर देना चाहता है | .............contd 

Thursday, July 7, 2016

कहानी और कहानीपन -4

इसके बाद याद आयी -सुधा अरोरा की 'एक औरत -तीन बटा  चार '  ,प्रेमचंद की 'सवा सेर गेंहू ' इत्यादि कहानियां |
ये वे कहानियां थी ,जिन्हें मैंने एक किसी दिन,  कहानी के कहानीपन पर विचार करते हुए यादों के कुएं से   निकाला था या यह कहना जयादा सही होगा की पानी को छेड़ने पर ये कहानियां अपने आप सतह  पर आ गयी थी |ये वे कहानियां थी जिन्हें मैं इग्नोर नहीं कर सकती थी /हूँ  , न आज और न कभी कल |क्यों ?इस बारे में बाद में बात करेंगे |
अब चलते है डायरी में लिखी तारीखवार एंट्रीज़ की ओर -कि जबसे मैंने पढे हुए पर टिपण्णी लिखना शुरू किया |
इससे पहले की एक टिपण्णी २४-१० -१३ की भी है पर वह मैं  स्किप कर रही हूँ |
क्यों ?
 मेरी मर्जी |
७-११-१३
मैत्रेयी  पुष्पा की कहानी पढ़ी 'गोमा हंसती है ' |ग्रामीण परिवेश है |साधारण से पात्र |कथ्य भी कुछ नहीं |पर कथनोपकथन (पात्रों के संवाद )विश्वसनीय है | गालियों का प्रयोग विश्वसनीय है  |भाषा ठीक है |बाकी ................|साधारण  वातावरण ओर साधारण स्थितियों में जन्मे पात्रों के जीवन लक्ष्य कितने साधारण होते है ,यह इस कहानी में देखा जा सकता है |
क्या बात है कि गोमा को किसी का डर नहीं है  ?लोकोपवाद का ,घर टूटने का |
१६-११ -१३
(फ्योदोर दोस्तोव्यस्की - बड़ी जल्दी आ गए है |खैर ...
शुरू करने से पहले बता दूँ की इनकी कहानियों की एक किताब मैंने पहले भी पढ़ी थी |शायद 2010 या ११ में |पर उस समय मैं पढ़ती थी |पढ़ कर लिखती नहीं थी |इसलिए उन कहानियों का ब्योरेवार विश्लेषण तो मैं नहीं दे सकती ,पर स्मृति के आधार पर यह जरुर कह सकती हूँ कि उस समय भी मैं इनके लेखन से प्रभावित हुई थी |इनका लेखन हैवी जरुर है ,पर इनके भीतर लेखकीय ईमानदारी बहुत है ,जो इनकी ओर आकर्षित करती है |फॉर एग्जाम्पल - पढने /लिखने का आनंद जीवन के अन्य सजीव आनद (बच्चे को खिलाना ,या मित्र से बतियाना ) से किस्मी तौर पर अलग है इसकी विवेचना शायद फ्योदोर ने ही की  है |अन्यथा लेखको की प्रजाति आत्ममुग्ध लोगो की प्रजाति होती है |दो अक्षर पढ़कर ये लोग खुदा के भी काबू के बाहर हो जाते है |
उस संकलन में कई कहानिया थी जो अच्छी लगी थी |क्लासिक लेखन जिसे कहते है ,वह  इनकी हरेक रचना में दिखता है |
एक कहानी थी (मैं अपने आप को कहने से रोक नहीं पा रही हूँ )
उसमे आभिजात्य वर्ग के उस पात्र की जैसी दुर्गति दिखाई है ,वह एक एग्जामपल ही है |एक कहानी को शुरू करने से पहले उन्होंने कहानी की टेक्निक के बारे में लिखा है |'सिल्वरी नाइट्स ' कहानी के वातावरण की प्रभावोत्पादकता बेहतरीन है |खैर ....  )
  

कहानी ओर कहानीपन -3

कहानियों के बारे में भी आमजन में अलग-अलग धारणाएं देखने में आती हैं|कभी किसी महान  इंसान के जीवन की प्रशंसा करते हुए लोग कहते हैं 'जी इनका जीवन तो एक कहानी है ' | उनका इशारा उस जीवन की शु रुआत,मध्य,अवसान की तार्किकता ,ऊंचाई ,गहराई ,रोचकता ,प्रेरणा की ओर होता है |
तो कभी किसी आदमी के हल्केपन को दिखाने के लिए भी लोग कहते हैं 'जी इसकी बातों का क्या ?इसका तो का म ही कहानी कहना है 'अर्थात कहानियों की झूठी मनघडंत कल्पनाशीलता की लोग निंदा भी करते हैं |
ये दो धारणाएं इस विधा के तत्वों की ओर बड़ा जरुरी इशारा करती हैं |
पहली धारणा  कहती है की रोचकता (मनोरन्जन तत्व )की ओर उन्मुखता इन्सानो की स्वाभाविक फितरत है |सपाट सत्य से ज्यादा लोग रंगीन ,हरी-भरी ,रसपूर्ण गलियों में चलना ज्यादा पसंद करते है |
दूसरी  धारणा  कहती है की सच्चे ,कमेरे लोग (और यह लाजिमी है की वे अवश्य ही प्रभावशाली होंगे |उनकी प्रभावशीलता जगत में ऐसे मानक स्थापित करेगी कि आमजन को और कहानीकारों को भी उनकी पसंद की परवाह करनी ही पड़ेगी |)मनोरंजन के लिए अर्थात केवल मनोरंजन के लिए वे सत्य से समझौता नहीं करते |मनोरजंन की चाह रखते हुए भी वे  चाहते हैं कि उन्हें कहानियों (अर्थात सम्पूर्ण साहित्य ही ) से कुछ अलग प्रकार के जीवन सत्य ,स्वभाव सत्य की प्राप्ति हो |
साहित्य में इन दो प्रकार की रुचियों ने साहित्य की श्रेष्टता के मानक  स्थापित किये हैं |एक ओर क्लासिक साहित्य है ,दुसरी ओर लोकप्रिय साहित्य है |लोकप्रिय  को क्लासिक से कमतर समझा जाता है |
आजकल लोकप्रिय साहित्य को प्रतिष्ठित करने की कवायद ;दरअसल क्योकि सत्ता ही लोक (जनता )के हाथों में चली गयी है तो साहित्य क्यों नहीं ,इसी जरुरत का विस्तार है |
हाँ तो बात चल रही थी कहानी ओर कहानीपन की -
a cup of tea के बाद मुझे एक और कहानी याद आई जो मैंने हिंदुस्तान अख़बार में पढ़ी थी |किसी ईरानी कथाकार की थी | अब तो न कहानी का नाम याद है न लेखक का |बस इतना याद है की वह एक चिडिया के परिवार को आधार बनाकर  संयुक्त परिवार के मेलजोलपन को बताती  थी\ ठीक थी |अच्छी थी |हलकी थी |(मुझे ज्यादातर हलकी कहानिया ही पसंद आती है ) .............contd

Monday, June 27, 2016

कहानीपन माने सही सही क्या ?

कहानीपन की खोज का प्रश्न मेरे भीतर इस तरह आया कि जब मैंने सोचा कि -
मुझे किस तरह की कहानियां लिखनी चाहिएं?
किस तरह की  कहानियां लोग पसंद करते हैं ?
या
खुद मुझे  किस तरह की  कहानियां लोग पसंद  हैं ?
जाहिर है इस खोज  में ,मैं पाठक थी ,लेखक थी ,आलोचक थी ;.........
तो इस तरह जब अपनी पढ़ी हुई कहानियों के कुएं (सटीक उपमा है ,क्योंकि कम पढ़ा है या कह लें ,सर्व काल और सर्व देशों के साहित्य सागर को देखते हुए यह किसी भी व्यक्ति की सीमा भी है   ) में डुबकी लगाई तो एक कहानी पकड़ में आई -ओ हेनरी की -a cup of tea .
छोटी सी कहानी है । मजेदार है । witty है ।
मोहतरमा को खरीददारी के दौरान एक गरीबनी मिल गयी । सहानुभूति में वह उसे घर ले आई । मियां ने देखा यह क्या बला गले पड़ गयी । मोहतरमा को समझाया तो वह उल्टे बहस में उलझने लगी । आखिर मियां  थक कर बोला -रख लो ।  देखने में भी  खासी सुन्दर है ।
बस्स।
लुगाई का तो मथ्था ठनक गया । उसने तो फ़ौरन उस औरत को एक कप चा पिलाके दफा करा । (दो जबान के लहजों में इस कहानी का सार पेश किया है और मुझे लगता है कि  दोनों मजेदार बने हैं )
इस कहानी का कहानीपन उस युक्ति में है जहाँ  एक घटना में औरत मन के रहस्य को पकड़ा गया है । मजेदार है । light है । हेवी नहीं है ।
इनकी और भी कहानियां हैं । ज्यादातर witty है |
तो कहानियों की पसंद का एक नुक्ता हाथ में आया - light
पर क्या मैं खुद ऐसी कहानियां लिख सकती हूँ ?
शायद नहीं या शायद हाँ (पर atleast अभी तो नहीं । ) 

Tuesday, June 14, 2016

कहानी का कहानीपन ,सही सही क्या ?

बी ए  spm college से की | वहाँ  वृन्दावन लाल वर्मा के उपन्यास और शरत चन्द्र के उपन्यास खूब पढ़े | बहुत से अंग्रेजी नावेल भी पढ़े |बल्कि एक समय ऐसा भी आया कि मैं हिंदी से उब गयी थी और इंग्लिश पढना ही पसंद करती थी |थर्ड इयर में ख्याल आया कि इतना कुछ पढ़ती हूँ ,पढ़कर भूल जाती हूँ |कभी कोई पूछ ले कि आपने क्या-क्या पढ़ रखा है तो क्या जवाब दूंगी ? तो ये सोचकर एक बार डायरी में लिस्ट बनाइ  |१३ किताबे याद आई -जिनमे शानी का काला जल ,गोर्की का माँ भी थी |बल्कि माँ उपन्यास की  तो उस समय में  मैंने छोटी-मोटी  समीक्षा भी लिखी थी |.......पर यह सब कुछ जल्द ही भूल-भाला गया|
.................
अब लगभग  २-३ साल से दोबारा लिखना शुरू किया था |अब वैसी दिखाने की /नुमाइश की  हसरतें बाकी नही रही |बल्कि अब तो कुछ अच्छा लगता है तो नोट कर लेती हूँ ,नहीं तो भूल जाती हूँ |भूल जाने का अब कोई दर्द  नहीं | बल्कि सोचती हूँ अच्छा है |दिमाग का बोझ कम हुआ |पढने का कोई प्रतिबन्ध नहीं है | कुछ भी पढ़ लूँ | पर टिकेगा वही ,जो स्ट्राइक करेगा | इस मामले में मैं खुद को एक  दुश्प्रसाद्य (hard to please)पाठक मानती हूँ |सचमुच एक लेखक के लिए मुझे प्रसन्न  करना अत्यंत कठिन है |लेखन-कर्म के प्रति मेरे आदर्श बहुत ऊँचे है | मैं स्वयं कैसी लेखक हूँ ,यह तो समय ही बताएगा |.....    
तो इस तरह एक बार ख्याल आया कि कहानी क्या होती है ?अर्थात कहानी का कहानीपन ,सही सही ,क्या -किस्मे होता है ?
जाहिर है इस प्रॉब्लम को थेओरीटिकली सोल्व करने चलती ,तो कई सारी  आलोचनात्मक किताबों की  भूल-भुलईया में फंस कर रह जाती |
तो मैंने एक ,स्वयं का ,आसान रास्ता निकाला कि याद किया कि मुझे कौन सी कहानियां पसंद हैं और क्यूँ ? -तो इससे मुझे अपनी पसंद का भी पता चल जाएगा और कहानीपन को भी जानने में आसानी होगी |
(next post -next weeek)
  

Thursday, June 9, 2016

शब्दों की दुनिया

अब तो मैं ये मानती हूँ कि बहुत ज्यादा पढना आपको  फिजिकली लेजी बना देता है |आपको बहुत कच्ची उम्र में 'जिंदगी क्या है ?'जैसे  जटिल प्रश्न में उलझा देता है |इस गुत्थी को सुलझाते -सुलझते ,आखिर आपके पास कोई चारा नही बचता की आप शब्दों की दुनिया (जंगल ,बियाबान ,रेगिस्तान ,गहन समुद्र ,अनत आकाश ,भयानक वन ) में पहुंच  जाए | बेशक ये स्वास्थ्य (आपके परिवार )के लिए हानिकारक है |
किसी ने सही कहा है कि अति हर चीज की बुरी होती है |खैर ..
पढने की  शुरुआत कॉमिक्स से हुई |प्राण की कोमिक्स से -चाचा चौधरी ,पिंकी ,बिल्लू ,रमन |सुपर कमांडो ध्रुव ,अमर चित्र कथा |इनके किरदार हमेशा हँसते  ,मुस्कुराते ,चलाचल तबियत के थे |ऐसा लगता था कि पढ़कर हमारी ज़िन्दगी में भी रवानगी सी आ गयी है (जो की, उस समय ,वास्तव में पढने से प्रसन्नता आदि भावों की रवानगी होती थी  ) खैर ....
सांतवी -आठवी तक मैंने जैन कथाएँ -केवल मुनि जी की (जिनमे मैंना सुंदरी ,गुणसागर ,धन्ना सेठ,अमर कुमार  ) पढ़ ली थी | (उपलब्धता के कारन ,क्योंकि पीतम पुरा में हमारा घर जैन स्थानक के सामने ही था |मेरे जीवन में यह संयोग हमेशा रहा | हमारे घर अधिकतर जैन स्थानक के आस-पास ही रहे | क्योंकि  पापा सोचते थे कि इससे धार्मिक रूटीन (चातुर्मास में गुरुओं के दर्शन ,प्रवचन सुनना इत्यादि )को फ़ॉलो करने में आसानी रहेगी |बिना उस रूटीन के लगता था कि  जीवन में कुछ अर्थपूर्ण ........नहीं हो रहा है |खैर ...... )
टेंथ तक मुझे ये रिअलाइज़ (कोन्शिअसली )हो गया था कि मैं शब्दों की दुनिया में पहुंच गयी हूँ | मैं यहाँ अकेली हूँ| यह  बहुत भयानक है | लेकिन मुझे चलना होगा | रास्ता निकालना हो होगा |  

कहानीनामा - कहानियों का लेखा जोखा

कई टाइम से सोच रही थी ,यह  ब्लॉग शुरू करने की ;आखिर अब समय आया |
जो कुछ भी पढ़ती हूँ उसके नोट्स डायरी में लिखती हूँ |यह ब्लॉग उसी लेखन का नतीजा है |
लिखने का ड्यूरेशन तय नहीं है | कभी हर दिन ,कभी हफ्ते में ,तो कभी महीने में भी कोई पोस्ट आ सकती है|
पाठक प्रतिक्रिया देकर उत्साह अवश्य बढाएं|