Wednesday, August 24, 2016

मार्केज -3

Q -क्या आपको लगता है नए लेखकों के लिए यह आम बात है कि वे अपने बचपन और अनुभवों को नज़रन्दाज करते है और बौद्धिक बनते हैं ,जैसे की शुरुआत  में आपने किया ?
A - नहीं ,बल्कि यह प्रक्रिया उलटी है लेकिन मुझे अगर किसी नए लेखक को सलाह देनी हो तो मैं कहूँगा कि एक लेखक को आपबीती से  शुरुआत  करनी चाहिए  |पाब्लो नेरुदा ने कविता में एक लाइन  कही है 'ईश्वर जब मैं गाऊँ ,तब मुझे (गाना )बनाने से बचाना ' |
यह बात मुझे बड़ी मजेदार लगती है कि मेरे काम को सबसे अधिक कल्पना के लिए सराहा गया जबकि सच यह है कि मेरे पूरे काम में एक लाइन भी ऐसी नहीं जो सच पर न टिकी हो |मुश्किल यह है कि कैरिबियन सच्चाई  किसी भी वायावी कल्पना से मिलती  जुलती है |
Q -   जर्नलिस्म ने आपके फिक्शन को कैसे प्रभावित किया ?
A - मुझे लगता है कि प्रभाव दोतरफा है |फिक्शन ने मेरी पत्रकारिता को साहित्यिक मूल्य (लिटरेरी वैल्यू ) दिया है और जर्नलिस्म ने मेरे फिक्शन को सच्चाई पर टिके रहने में मदद की है |
Q- (क्या )आप समझते हैं कि आलोचक आपको टाइप करते हैं या बड़ी सफाई से कैटेगराइज़ करते है |
A - आलोचक मेरे लिए सबसे बड़ा एग्जामपल हैं कि बौद्धिकतावाद क्या होता है | सबसे पहले ,वे एक थ्योरी लाएंगे कि लेखक को कैसा होना चाहिए |वे लेखक को उस मॉडल में फिट करने की कोशिश करेंगे ,जब वह नहीं होगा ,तब वे जबरन यह  कोशिश करेंगे |
मैं सिर्फ इसलिए उत्तर दे रहा हूँ क्योंकि आपने पूछा है नहीं तो मुझे ज़रा भी दिलचस्पी नहीं कि आलोचक मेरे बारे में क्या सोचते हैं ,मैंने बहुत सालों से किसी को पढ़ा नहीं है |वे दावा करते है कि वे लेखक और पाठक के बीच के सेतु हैं पर मैंने हमेशा  कोशिश की है कि मैं बहुत ही स्पष्ट और नपा -तुला लेखक रहूँ ,पाठक तक स्वयं पहुंचू कि किसी आलोचक के माध्यम से पहुँचने की जरूरत न पड़े |
अच्छा इन्टरव्यू है |पूरा ही अनुवाद कर दूंगी |

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