१९ - 3- १४
पता नहीं यह टिपण्णी कैसे रह गयी |
वृन्दावन लाल वर्मा की कहानियां पढ़ी |अच्छी थी| कहानी को इतिहास में ले जाने से एक ऑटोमेटिक फायदा यह होता है पाठक प्रिपेयर हो जाता है ,कहानीपन का मज़ा लेने के लिए |कि चलो सेटअप हमारे समय का नहीं है तो हमें अपने समय की मुसीबतों के पेंचो में उलझना नहीं पड़ेगा |बस दूर बैठे मज़ा लेते रहो |
वर्मा की टेक्निक अच्छी है ,पैनी है |चारित्रिक रूपांकन पैना है |मितकथन से काम लेते हैं | ओवरव्यू टाइप |
post comments - प्रिय पाठक ,एक वह वक्त था जब कहानीकार कहानीकार होता था और पाठक पाठक |कहानी कही और मजमा समेट दिया |लेखक अपने घर राजी ,पाठक अपने घर राजी |आजकल के पाठक तो घर में ही घुसे चले आते हैं |आधुनिक जिंदगी के अकेलेपन ने लेखकों की जिम्मेवारी बढा दी है |क्या करें ,कोई चारा नहीं |करना पड़ेगा |अस्तु
२३-८-१४
रघुवीर सहाय की कहानी पढ़ी -किले में औरत |ठीक थी |हिंदी साहित्यकार का पक्ष यह है कि वह आदमी को ,आदमियत को जानता है |पर नहीं जानता आदमी की लालसाओं को या जानकर भी मानना नहीं चाहता |क्योकि परम्परा द्वारा प्राप्त राजमार्ग का जब पता है तो इन्सान बीहड़ों में क्यों धक्के खाता है ,यह बात हिंदी साहित्यकार के समझ के बाहर की बात है |इसलिए बयानगी का अंदाज बेहद डाईसेक्टिंग ,तटस्थ ,निर्मम होता है |
पर यह अंदाज अपने स्टैंड की दृढ़ता में कितना ही ठोस हो ,पर आधुनिक भोगी पाठकों को हज़म कराना बहुत कठिन है |
३१-८-१४
रघुवीर की कई कहानियां और भी पढ़ी |ग्यारहवीं कहानी ,रास्ता इधर है ,मुठभेड़ |हमेशा हैवी जोंन में रहते हैं | ये तेवर कविता में तो खप जाता है 'गंभीर ' कवि का दर्जा दिलाने के लिए पर कहानियों में नहीं |कहानियों में यूँ आदि से अंत तक तनावपूर्ण खिंचाव सहन नहीं होता |मनोरंजन तो चाहिए |
पता नहीं यह टिपण्णी कैसे रह गयी |
वृन्दावन लाल वर्मा की कहानियां पढ़ी |अच्छी थी| कहानी को इतिहास में ले जाने से एक ऑटोमेटिक फायदा यह होता है पाठक प्रिपेयर हो जाता है ,कहानीपन का मज़ा लेने के लिए |कि चलो सेटअप हमारे समय का नहीं है तो हमें अपने समय की मुसीबतों के पेंचो में उलझना नहीं पड़ेगा |बस दूर बैठे मज़ा लेते रहो |
वर्मा की टेक्निक अच्छी है ,पैनी है |चारित्रिक रूपांकन पैना है |मितकथन से काम लेते हैं | ओवरव्यू टाइप |
post comments - प्रिय पाठक ,एक वह वक्त था जब कहानीकार कहानीकार होता था और पाठक पाठक |कहानी कही और मजमा समेट दिया |लेखक अपने घर राजी ,पाठक अपने घर राजी |आजकल के पाठक तो घर में ही घुसे चले आते हैं |आधुनिक जिंदगी के अकेलेपन ने लेखकों की जिम्मेवारी बढा दी है |क्या करें ,कोई चारा नहीं |करना पड़ेगा |अस्तु
२३-८-१४
रघुवीर सहाय की कहानी पढ़ी -किले में औरत |ठीक थी |हिंदी साहित्यकार का पक्ष यह है कि वह आदमी को ,आदमियत को जानता है |पर नहीं जानता आदमी की लालसाओं को या जानकर भी मानना नहीं चाहता |क्योकि परम्परा द्वारा प्राप्त राजमार्ग का जब पता है तो इन्सान बीहड़ों में क्यों धक्के खाता है ,यह बात हिंदी साहित्यकार के समझ के बाहर की बात है |इसलिए बयानगी का अंदाज बेहद डाईसेक्टिंग ,तटस्थ ,निर्मम होता है |
पर यह अंदाज अपने स्टैंड की दृढ़ता में कितना ही ठोस हो ,पर आधुनिक भोगी पाठकों को हज़म कराना बहुत कठिन है |
३१-८-१४
रघुवीर की कई कहानियां और भी पढ़ी |ग्यारहवीं कहानी ,रास्ता इधर है ,मुठभेड़ |हमेशा हैवी जोंन में रहते हैं | ये तेवर कविता में तो खप जाता है 'गंभीर ' कवि का दर्जा दिलाने के लिए पर कहानियों में नहीं |कहानियों में यूँ आदि से अंत तक तनावपूर्ण खिंचाव सहन नहीं होता |मनोरंजन तो चाहिए |
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