Tuesday, August 30, 2016

मार्केज -4

15 -10-15
गेब्रियल मार्केज को पढ़ा। इंदु प्रकाश कानूनगो का अनुवाद -बर्फ पर तुम्हारे लहू की लकीर। अनुवाद तो ठीक था। काफी संभाला है।
NOW ABOUT the WRITER -क्योंकि मार्केज एक पत्रकार हैं ,तो घटनाओं के ब्यौरों में जाना ,एक यात्रा वृत्तांत के समान  वर्णन करते चलना ,उनका पेशा ही है तो यह उनके लिए कठिन नहीं।
फॉर एग्जाम्पल - मैं तो सिर्फ फोन करने आयी कहानी में पागलघर के ब्यौरे ,बर्फ पर......... कहानी में यात्रा के ब्यौरे। यह सब कुछ इतना सटीक है की कहीं विश्वास न करने की कोई गुंजाईश ही नहीं।
बल्कि मार्केज  की तरह मैं भी हैरान हुई कि  इनके काम में आलोचकों को जादू कहाँ  से नज़र आ गया। ये ब्यौरे तो  वैसे ही हैं ,जैसे हम जर्नलिस्ट रिपोर्टों में पढ़ते हैं।
मगर जादू भी है। उसके बारे में भी बताऊंगी।
उनकी हर  कहानी में एक पात्र (अकेला ) है ,जो अपने आस पास के ब्यौरों से प्रभावित -अप्रभावित होता हुआ चल रहा है। असंबन्ध किसी इंसान को अकेला भी बना सकता है और जिज्ञासु भी ;यह इंसान पर निर्भर है।
मार्केज के अधिकतर पात्र अकेले हैं। मरिया ,सत्रह शव की प्रुदेन्शिआ ,प्रेजिडेंट। पर मार्केज जिज्ञासु हैं , अतः उनकी डिटेलिंग और सूक्ष्म ब्यौरों में वे गहराई तक गए हैं।ऐसा लगता है अपने जीवन के संघर्षों से नाउम्मीदी या अपेक्षाहीन स्थिति ने मार्केज को मानसिक रूप से ऐसे लेवल पर ला दिया है ,जो दूसरों के जीवन में दिलचस्पी लेता है ( जो की जीवन में ही दिलचस्पी की उसकी अदम्य जिज्ञासा को द्योतित करता है ,अतः ज्ञानी ) और देखता है की लोग कैसा जीवन जी रहे हैं ;वे क्यों उदास ,निराश ,आशावान हैं। अर्थात एक observer ,एक दर्शनी की हैसियत से वे अवलोकन करते हैं।
चूँकि एक पत्रकार का वास्ता कई तरह के लोगों से पड़ता है इसलिए अलग अलग तरह के लोगों से मिलना उनके लिए मुश्किल नहीं। CONTD

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