Wednesday, August 31, 2016

मार्केज -5

ये तो हुई उनकी कहानियों में अलग अलग प्रकार के पात्रों की मौजूदगी की बात। लेकिन मार्केज किरदारों को सिलेक्ट कैसे करते हैं ?
इस बात को जानने के लिए मैंने इस संग्रह की कहानियों को वर्गीकृत किया।

  1. ठीक छह बजे रेस्टोरेंट के भीतर कदम रखती कोई स्त्री 
  2. मैं तो बस फोन करने आयी 
  3. मैं सपने बेचती हूँ 
  4. बर्फ में  जमी तुम्हारे लहू की लकीर -   
  5.  ट्रामोंटाना 
  6. तपती  दुपहर में सुस्ताता मंगलवार 
  7. मिस फ़ोर्ब्स के ग्रीष्म के सुहावने दिन  -ये कहानियां दुखांत हैं।
पानी में डूब  मरा हुआ संसार का परम सुन्दर आदमी
एलिवेटर से उतरते  सत्रह शव 
सोई सुंदरी की हवाई उड़ान 
विशाल पंखों वाला अत्यंत बूढा आदमी 
मारिया दोस प्राजेरेज़ 
सफर सुहावना रहा ,मिस्टर प्रेजिडेंट -ये कहानियां सुखांत है। 
प्रकाश पानी समान है ,संत   -न सुखांत ,न दुखांत। 
इन कहानियों को  पढ़कर ,इनके पात्रों के बारे में एक बात जो सबसे ज्यादा आकर्षित करती है वह है इनकी अदम्य जिजीविषा  . 
मार्केज  को अदम्य जिजीविषा वाले ,सजीव ,जिंदादिल किरदार पसंद आते हैं। contd

Tuesday, August 30, 2016

मार्केज -4

15 -10-15
गेब्रियल मार्केज को पढ़ा। इंदु प्रकाश कानूनगो का अनुवाद -बर्फ पर तुम्हारे लहू की लकीर। अनुवाद तो ठीक था। काफी संभाला है।
NOW ABOUT the WRITER -क्योंकि मार्केज एक पत्रकार हैं ,तो घटनाओं के ब्यौरों में जाना ,एक यात्रा वृत्तांत के समान  वर्णन करते चलना ,उनका पेशा ही है तो यह उनके लिए कठिन नहीं।
फॉर एग्जाम्पल - मैं तो सिर्फ फोन करने आयी कहानी में पागलघर के ब्यौरे ,बर्फ पर......... कहानी में यात्रा के ब्यौरे। यह सब कुछ इतना सटीक है की कहीं विश्वास न करने की कोई गुंजाईश ही नहीं।
बल्कि मार्केज  की तरह मैं भी हैरान हुई कि  इनके काम में आलोचकों को जादू कहाँ  से नज़र आ गया। ये ब्यौरे तो  वैसे ही हैं ,जैसे हम जर्नलिस्ट रिपोर्टों में पढ़ते हैं।
मगर जादू भी है। उसके बारे में भी बताऊंगी।
उनकी हर  कहानी में एक पात्र (अकेला ) है ,जो अपने आस पास के ब्यौरों से प्रभावित -अप्रभावित होता हुआ चल रहा है। असंबन्ध किसी इंसान को अकेला भी बना सकता है और जिज्ञासु भी ;यह इंसान पर निर्भर है।
मार्केज के अधिकतर पात्र अकेले हैं। मरिया ,सत्रह शव की प्रुदेन्शिआ ,प्रेजिडेंट। पर मार्केज जिज्ञासु हैं , अतः उनकी डिटेलिंग और सूक्ष्म ब्यौरों में वे गहराई तक गए हैं।ऐसा लगता है अपने जीवन के संघर्षों से नाउम्मीदी या अपेक्षाहीन स्थिति ने मार्केज को मानसिक रूप से ऐसे लेवल पर ला दिया है ,जो दूसरों के जीवन में दिलचस्पी लेता है ( जो की जीवन में ही दिलचस्पी की उसकी अदम्य जिज्ञासा को द्योतित करता है ,अतः ज्ञानी ) और देखता है की लोग कैसा जीवन जी रहे हैं ;वे क्यों उदास ,निराश ,आशावान हैं। अर्थात एक observer ,एक दर्शनी की हैसियत से वे अवलोकन करते हैं।
चूँकि एक पत्रकार का वास्ता कई तरह के लोगों से पड़ता है इसलिए अलग अलग तरह के लोगों से मिलना उनके लिए मुश्किल नहीं। CONTD

Wednesday, August 24, 2016

मार्केज -3

Q -क्या आपको लगता है नए लेखकों के लिए यह आम बात है कि वे अपने बचपन और अनुभवों को नज़रन्दाज करते है और बौद्धिक बनते हैं ,जैसे की शुरुआत  में आपने किया ?
A - नहीं ,बल्कि यह प्रक्रिया उलटी है लेकिन मुझे अगर किसी नए लेखक को सलाह देनी हो तो मैं कहूँगा कि एक लेखक को आपबीती से  शुरुआत  करनी चाहिए  |पाब्लो नेरुदा ने कविता में एक लाइन  कही है 'ईश्वर जब मैं गाऊँ ,तब मुझे (गाना )बनाने से बचाना ' |
यह बात मुझे बड़ी मजेदार लगती है कि मेरे काम को सबसे अधिक कल्पना के लिए सराहा गया जबकि सच यह है कि मेरे पूरे काम में एक लाइन भी ऐसी नहीं जो सच पर न टिकी हो |मुश्किल यह है कि कैरिबियन सच्चाई  किसी भी वायावी कल्पना से मिलती  जुलती है |
Q -   जर्नलिस्म ने आपके फिक्शन को कैसे प्रभावित किया ?
A - मुझे लगता है कि प्रभाव दोतरफा है |फिक्शन ने मेरी पत्रकारिता को साहित्यिक मूल्य (लिटरेरी वैल्यू ) दिया है और जर्नलिस्म ने मेरे फिक्शन को सच्चाई पर टिके रहने में मदद की है |
Q- (क्या )आप समझते हैं कि आलोचक आपको टाइप करते हैं या बड़ी सफाई से कैटेगराइज़ करते है |
A - आलोचक मेरे लिए सबसे बड़ा एग्जामपल हैं कि बौद्धिकतावाद क्या होता है | सबसे पहले ,वे एक थ्योरी लाएंगे कि लेखक को कैसा होना चाहिए |वे लेखक को उस मॉडल में फिट करने की कोशिश करेंगे ,जब वह नहीं होगा ,तब वे जबरन यह  कोशिश करेंगे |
मैं सिर्फ इसलिए उत्तर दे रहा हूँ क्योंकि आपने पूछा है नहीं तो मुझे ज़रा भी दिलचस्पी नहीं कि आलोचक मेरे बारे में क्या सोचते हैं ,मैंने बहुत सालों से किसी को पढ़ा नहीं है |वे दावा करते है कि वे लेखक और पाठक के बीच के सेतु हैं पर मैंने हमेशा  कोशिश की है कि मैं बहुत ही स्पष्ट और नपा -तुला लेखक रहूँ ,पाठक तक स्वयं पहुंचू कि किसी आलोचक के माध्यम से पहुँचने की जरूरत न पड़े |
अच्छा इन्टरव्यू है |पूरा ही अनुवाद कर दूंगी |

Tuesday, August 23, 2016

मार्केज -2

 Q -  वे नाम  बताएं जिन्होंने शुरुआत में आपको प्रभावित किया ?
A -american lost generation के लेखकों में सचमुच में मदद की कि मैं लघु कहानियों के प्रति मेरे बौद्धिक नजरिये से मुक्ति पा गया |मुझे लगा कि उनके साहित्य का जिंदगी से जो रिश्ता है वह  मेरी कहानियों में नहीं था |फिर एक घटना घटी जो नजरिये (में बदलाव )की दृष्टि से महत्वपूर्ण है |
यह बोगोताज़ों थी |9 अप्रैल १९४८ को जब एक राजनेता गीतन को गोली मार दी  गयी और बोगोटा के लोग गलियों में पागलों की तरह चिल्ला रहे थे ,मैं अपनी जगह पर था ,जब मैंने यह खबर सुनी ,मैं उस तरफ भागा पर  गीतन को हॉस्पिटल ले जाया जा रहा था |वापिस आते हुए ,लोगो ने गलियों पर कब्जा कर लिया था |वे प्रदर्शन कर रहे थे ,स्टोर लूट रहे थे ,बिल्डिंगे जला रहे थे |मैं भी उनमे शामिल हो गया |उस दोपहर और शाम को ,मुझे पहली बार लगा की मैं किस प्रकार के देश में रह रहा हूँ और मेरी लघु कहानियों का इससे कोई वास्ता नहीं है |फिर मुझे कॅरीबीयन में baranquilla में जाना पड़ा जहाँ मेरा बचपन बीता था | वहां मैंने महसूस किया कि मैंने किस प्रकार की जिंदगी जी है ,जानी है और जिसके बारे में लिखना चाहा है |
१९५०-५१ के दौरान एक घटना और  घटी जिसने मेरी साहित्यिक अभिरुचियों को प्रभावित किया |मेरी मां ने मुझे aracataca साथ चलने के कहा ,जहाँ मेरा जन्म हुआ था ,वह  घर बेचने के लिए जहाँ मेरे शुरू के साल निकले थे |जब मैं वहां गया तो पहले पहल यह काफी शौकिंग था क्योंकि अब मैं २२ साल का था और ८ साल की उम्र के बाद पहली बार वहां गया था   |कुछ भी नहीं बदला था ,पर मुझे लगा कि मैं उस गाँव को सिर्फ देख नहीं रहा था बल्कि अनुभूत कर रहा था ऐसे जैसे कि जो कुछ भी मैंने वहां देखा वह सब कुछ पहले ही लिखा जा चूका था और मैं सिर्फ पढ़ रहा था |और सभी व्यावहारिक कारणों से वह सब साहित्य में तब्दील हो गया था ,वह घर ,वे लोग ,वे यादें |मैं नहीं जानता उस समय तक मैंने faulkner को पढ़ा था या नहीं पर अब मैं जानता हूँ कि केवल faulkner की टेक्नीक से ही यह संभव था कि मैं  वह सब लिख पाता जो मैं  देख रहा था |वहां का वातावरण ,decandence उस गाँव की तपिश सब कुछ वैसी थी जैसी की मैंने faulkner  में महसूस की थी |वह एक केले के पौधों का क्षेत्र था जहाँ फ्रूट कम्पनियों के बहुत से अमरीकी रहते थे ,जिनसे वहां का वातावरण बहुत कुछ वैसा ही बन गया था जैसा मैंने deep south के लेखकों में पाया था |आलोचकों ने faulkner  के साहित्यिक प्रभाव की बातें कही हैं पर मैं इसे संयोग मानता हूँ |मुझे सिर्फ वैसा मैटिरियल मिला जो वैसे ही लिखा जा सकता था जैसा  faulkner  ने लिखा है |
गाँव की उस यात्रा के बाद मैंने पहला नॉवेल leaf storm लिखा |उस ट्रिप में मेरे साथ यह हुआ था की मुझे लगा था aracataca में जो भी मेरे बचपन में घटित हुआ था उसका साहित्यिक मूल्य है ,जिसे मैंने अब पहचाना है |उसके बाद मैंने leaf storm  लिखा तो मुझे लगा कि मैं लेखक बनना चाहता था और मुझे कोई रोक नहीं सकता है और बस एक काम बचा है करने के लिए कि मैं दुनिया का सर्वश्रेष्ठ लेखक बनूँ (इसे कहते हैं कॉन्फिडेंस )|ये १९५३ की बात है ,पर १९६७ से पहले तक मुझे रॉयल्टी मिलनी शुरू नहीं हुई थी जबकि मैं ८ में से ५ किताबे लिख चुका था | 

Friday, August 19, 2016

मार्केज़

पूरे इंटरव्यू का लिंक ये है -http://www.theparisreview.org/interviews/3196/the-art-of-fiction-no-69-gabriel-garcia-marquez
Q - सत्य और कल्पना में  संतुलन बनाने में क्या एक पत्रकार और उपन्यासकार की जिम्मेदारी अलग होती है ?
A - पत्रकारिता में तथ्य की एक चूक आपकी कार्य को पक्षपाती बना देती है। जबकि फिक्शन में एक सही तथ्य पूरे कार्य को वैधता प्रदान करता है। यही अंतर है। एक उपन्यासकार  जो चाहे , वो लिखे ;जब तक वह लोगो को अपने लिखे का यकीं दिला  सकता है। 
Q -आपने लिखने की शुरुआत कैसे की ?
A -ड्राइंग से। मैं कार्टून की ड्राइंग बनाता था। पढ़ना या लिखना शुरू करने से पहले मैं स्कुल में और घर में कॉमिक्स बनाता था। मजेदार बात यह है ,जो मैंने अब जानी ,की हाई स्कुल में मैं लेखक प्रसिद्द था ,जबकि सच यह था कि मैंने कभी कुछ नहीं लिखा था। यदि कभी  कोई इश्तहार या अपील लिखनी होती थी तो मुझे यह काम करना होता था क्योकि मैं लेखक समझा जाता था। जब मैं कॉलेज में गया तो मेरे दोस्तों के मुकाबले मेरी साहित्यिक पृष्टभूमि अच्छी थी। बोगोटा विश्वविद्यालय में ,नए लोग मेरे परिचय में आये और दोस्त बने। उनमे से कइयों ने मुझे समकालीन लेखकों से परिचित कराया। एक रात को मेरे दोस्त ने मुझे फ्रेंज काफ्का की लघु कहानियों की किताब दी। मैं अपनी जगह पर गया और मैं  the metamorphosis को पढ़ना शुरू किया। पहली लाइन पढ़ते ही मैं लगभग बिस्तर पर से उछल गया। मैं हैरान था। पहली लाइन थी -जैसे ही ग्रेगोर साम्सा अपने अस्थिर  सपनो से जागा ,उसने अपने आपको एक बड़े कीड़े के रूप में बिस्पर पर पड़े हुए पाया....... " जब मैंने यह लाइन पढ़ी तो मैंने सोचा मैं तो किसी ऐसे बन्दे को नहीं जानता जिसने इस प्रकार का लेखन निकाला हो ,अगर मैं जानता तो मैं अरसा पहले ही लिखना शुरू कर देता ,तो मैंने तुरंत लघु कहानियां लिखना शुरू कर दिया |वे अब बौद्धिक कहानियां थी क्योंकि वे मेरे  साहित्यिक अनुभव के आधार पर लिखी गयी थी और तब तक मिअने साहित्य और जीवन के बीच के लिंक को नहीं पकड़ा था | ये कहानियां बोगोटा के एक अख़बार el espectador के साहित्यिक सप्लीमेंट में छपती थी |उस समय सफल भी हुई थी -शायद इसलिए क्योंकि उस समय कोलंबिया में कोई भी बौद्धिक लघु कहानियां नहीं लिखता था |उस समय अधिकांशतः ग्रामीण और सामाजिक जीवन पर लिखा जाता था |जब मैंने अपनी पहली लघु कहानियां लिखी तो मुझे बताया गया कि उन पर जोयस का प्रभाव है |
Q- क्या आपने उस समय तक  जोयस को पढ़ा था ?
a - मैंने जोयस को कभी नहीं पढ़ा था ,तो मैंने ulysses पढना शुरू किया |मैंने स्पैनिश अनुवाद पढ़ा था |बाद में इसका इंग्लिश अनुवाद पढ़ा और पाया स्पैनिश अनुवाद बहुत बुरा था |लेकिन फिर भी इन सबसे मैंने आंतरिक मोनोलॉग की जरुरी टेक्निक सीखी -जो भविष्य में मेरे बहुत काम आई |ये टेक्निक मैंने वर्जिनिया वुल्फ में भी पायी और उनका इस्तेमाल का बेहतर ढंग मुझे ज्यादा पसंद आया |यद्यपि मैंने बाद में पाया कि यह टेक्निक तो किसी lazarillo de tormes के अनाम लेखक की इजाद है | (मार्केज़  के वाक्य बहूऊऊऊऊऊऊऊऊऊउत बड़े बड़े होते हैं  ) ..........contd   

Monday, August 15, 2016

Kahanipan -10

मार्केज थोड़ा लंबे चलेंगे। इन्हें अब निबटा ही लेते हैं।
इन पर एक टिपण्णी १५-१०-१५ की है। पर उससे पहले कुछ बातें।
फ्योदोर के उपन्यास वाली टिपण्णी में मैंने बंद कहानी की बात कही थी। मार्केज की कहानियाँ मुझे खुली कहानियां लगीं।
बंद -खुली से मेरा क्या मतलब है ,सुनो।
एक कहानी को पढ़ते हुए यह अंदाज तो लग ही जाता है की इसमें कहानीकार कहाँ छुपा बैठा है अर्थात सीधे शब्दों में कहूँ तो कि कहानीकार को उस कहानी का पता कैसे चला। वह स्वयं इस कहानी का भोक्ता है ,या वह साक्षी है। दोनों प्रकार की कहानियां बंद कहानिया है ,क्योंकि ऐसी कहानियों में लेखकों के निजी नजरिये ,अनुभव ,सुख-दुःख ,कमेंट्स गहनता से उभर कर आते हैं। इस प्रकार की कहानियों का प्रभाव गहन (हैवी )होता है। अब तक इस ब्लॉग में मैंने जितनी भी टिपण्णी लिखी ,उनमे हैवी वर्ड सबसे ज्यादा यूज़ किया होगा। इस तरह की कहानियों ऐसा प्रभाव इसलिए पैदा कर पाती हैं ,क्योकि यह या तो लेखक की स्वयं की आपबीती है या यह ऐसे इंसान की बात है जिससे वह अटैच है। इसलिए तीव्र भावोद्वेलन  ऐसी कहानियों की विशेषता होती है।
खुली कहानियों में कहानीकार (मसलन मार्केज की कहानियों में ,हम आगे देखेंगे ) मात्र द्रष्टा है। वह मुख्य पात्र से अटैच  नहीं है। मुख्य पात्र के जीवन में जो कुछ भी घटता है ,अच्छा या बुरा ,इससे वह ज़रा भी प्रभावित नहीं।
फिर उसे उस कहानी का पता कैसे चला ?
क्योंकि उसका पेशा ऐसा है , वह पत्रकार है ,की वह अलग अलग तरह के लोगों के संपर्क में आता है। उसे आना पड़ता है।
अपने संपर्क में आये लोगों की कहानियों का सेलेक्शन वह दिलचस्पी के आधार पर करता है ,की इस कहानी में ऐसी क्या खास बात है कि  इसे कहा जाए।
किरदार की दिलचस्पी उसे कहानी कहने के लिए प्रेरित करती है।
मगर इन सबके साथ उसका अपना जीवन भी है ,जो वह जी रहा है। यात्राएं करना ,यात्राओं के ब्यौरे ,होटलों के मेन्यू ,बार गर्ल्स के साथ छेड़छाड़ ,विभिन्न जगहों के प्रामाणिक ब्यौरे ,लोगो के व्यव्हार के सटीक आकलन करना ,विभिन्न प्रकार
की व्यवस्थाओं की बारीक़ समझ -अर्थात कुल मिला एक पत्रकार के पेशे की अनुभवगत पूंजी ,भी मार्केज ने अपनी कहानियों कहानियों में उड़ेल दी है। contd




Sunday, August 14, 2016

kahanipan -9

४-९-१४
मार्केज की दो कहानियां पढ़ी।
१ दुनिया के सबसे सुन्दर आदमी का डूबना -अच्छी थी। in fact I really liked it .समुद्री किनारे बसे एक गाँवमे एक अपरिचित सुन्दर लाश के जरिये मनुष्यों पर सौन्दर्य ,शक्ति ,बनावट के प्रभाव (गहरे प्रभाव ) को मार्केज ने सादगी से कहा है। इनके कहने का ढंग बिलकुल सादा है। तरल। औरतों ,आदमियों,बच्चों की मानसिकता   में आसानी से प्रवेश कर जाते हैं। फिर भी कहानी पर अपनी पकड़ नहीं छोड़ते। इनकी कहानियों में समुद्र बहुत ज्यादा है। समुद्र संबंधी  ओब्सेर्वेशन्स अच्छी हैं। एक शांत ,ठहरी हुई मगर सजग गतिमान मानसिकता के द्वारा रची गयी कहानियां। 
२ ऐसे ही एक दिन - इस कहानी में गाँव के लोगों की सहज विश्वासी प्रकृति के परिप्रेक्ष्य में मिथकों के भय के प्रभाव को दिखाया है। यह कहानी मुझे इसलिए पसंद आयी कि किस प्रकार लोगों में अज्ञात के प्रति भय का एक स्वाभाविक अंश होता है। और उनके सारे क्रियाकलाप इस प्रवृति से संचालित होते हैं।  
इस सन्दर्भ में एक पर्सनल बात याद आ गयी। मेरे जन्म के अवसर पर छेदी वाले बाम्हन ने कहा की यह माँ की नहीं सुनेगी। यह बात मेरी मम्मी ने इस हद तक अपने दिल में बिठा ली कि  फिर खुद अपनी आँखों से देखना ही छोड़ दिया। फिर इस मिथ्या विश्वास की बुनियाद पर उनका व्यवहार मेरे प्रति रुखा होता चला गया। प्रत्युत्तर में मैं भी विरोधी होती चली गयी ,तो आख़िरकार वही बात सच होकर रही। अन्यथा क्या वे कभी देख पायीं कि मैंने उन्हें जितना obey किया उतना किसी ने भी नहीं किया। पर चेतन - अवचेतन में मिथकों ,अज्ञात भयों की सत्ता इतनी गहरी होती है कि इंसान खुद अपनी आँखों  से देखना भूल जाते हैं। 
यह तो है की मानव सत्ता का एक हिस्सा अज्ञात ही रहता है। धर्म का मानवों पर इस बुरे असर को ,जब मैं सोचती हूँ तो सोच में पड जाती हूँ। पर कोई चारा नहीं। अलप सत्व वाले वाले मनुष्यों पर यह होगा ,कोई निदान नहीहै। 

Saturday, August 13, 2016

कहानीपन -8

१९ - 3- १४
पता नहीं यह टिपण्णी कैसे रह गयी |
वृन्दावन लाल  वर्मा की कहानियां पढ़ी |अच्छी  थी| कहानी को इतिहास में ले जाने से एक ऑटोमेटिक फायदा यह होता  है पाठक प्रिपेयर हो जाता है ,कहानीपन का मज़ा लेने के लिए |कि चलो सेटअप हमारे समय का नहीं है तो हमें अपने समय की मुसीबतों के पेंचो में उलझना नहीं पड़ेगा |बस दूर बैठे मज़ा लेते रहो |
वर्मा की टेक्निक अच्छी है ,पैनी है |चारित्रिक रूपांकन पैना है |मितकथन से काम लेते हैं  | ओवरव्यू टाइप |
post comments - प्रिय पाठक ,एक वह  वक्त था जब कहानीकार   कहानीकार होता था और पाठक पाठक |कहानी कही और मजमा समेट दिया |लेखक अपने घर राजी ,पाठक अपने घर राजी |आजकल  के पाठक तो घर में ही घुसे चले आते हैं |आधुनिक जिंदगी के अकेलेपन ने लेखकों की जिम्मेवारी बढा दी है |क्या करें ,कोई चारा नहीं |करना पड़ेगा |अस्तु
२३-८-१४
रघुवीर सहाय की कहानी पढ़ी -किले में औरत |ठीक थी |हिंदी साहित्यकार का पक्ष यह है कि वह आदमी को ,आदमियत को जानता है |पर नहीं जानता आदमी की लालसाओं को या जानकर भी मानना नहीं चाहता |क्योकि परम्परा द्वारा प्राप्त राजमार्ग का जब पता है तो इन्सान बीहड़ों में क्यों धक्के खाता है ,यह बात हिंदी साहित्यकार के समझ के बाहर की बात है |इसलिए बयानगी का अंदाज बेहद डाईसेक्टिंग ,तटस्थ ,निर्मम होता है |
पर यह अंदाज अपने स्टैंड की दृढ़ता में कितना ही ठोस हो ,पर आधुनिक भोगी पाठकों को हज़म कराना बहुत कठिन है |
३१-८-१४
रघुवीर की कई कहानियां और भी पढ़ी |ग्यारहवीं कहानी ,रास्ता इधर है ,मुठभेड़ |हमेशा हैवी जोंन  में रहते हैं | ये तेवर कविता में तो खप जाता है 'गंभीर ' कवि का दर्जा दिलाने के लिए पर कहानियों में नहीं |कहानियों में यूँ आदि से अंत तक तनावपूर्ण खिंचाव सहन नहीं होता |मनोरंजन तो चाहिए |   

Friday, August 12, 2016

note

बेटे का बर्थडे तो हुआ ,पर फंक्शन नहीं। अस्तु
चलो काम शुरू करते हैं। 
इस ब्लॉग के साथ मेरा एक ब्लॉग और भी है ,इल्ली। आगे उस ब्लॉग पर भी मैटर  शेयर करुँगी।
कहानीनामा पर प्रोफेशनल मैटर और इल्ली पर पर्सनल -प्रोफेशनल।
इल्ली -यह नाम मैंने इस ब्लॉग  इसलिए रखा ,क्योंकि यह नाम मुझे सबसे ज्यादा डिफाइन करता है। इल्ली कहतें हैं ,कैटरपिल्लर को। एक कीड़ा जो अपनी खोल में पड़ा पड़ा दुनिया भर की चीजें  खाता रहता है -सेब ,पत्ते ,कीड़े ,कुछ भी। मैं भी ऐसी ही थी। अपनी सुरक्षित हद की जिंदगी में जो भी विचार ,अनुभव मिला , खा लिया।
फिर एक वक्त्त  ऐसा भी आया की मुझे लगा ,अब मैं अपनी खोल से बाहर आकर दुनिया को अपने रंग-बिरंगे पंख दिखाऊँ  ,पर हिंदी में तितली शब्द के साथ सामाजिक रूप से अति गतिशील महिलाओं की अर्थछाया जुडी है ,जो की मुझे पसंद नहीं है। इसलिए इल्ली को मैंने इल्ली ही रहने दिया। वैसे यह इल्ली तितली से भी ज्यादा रंग-बिरंगी है (होप सो ). 

Wednesday, August 3, 2016

note

दिसम्बर में घर  की रेनोवेशन का जो काम शुरू हुआ था ,वह  अब कम्प्लीशन  पर है। इसलिये इन दिनों सुपर बिजी हूँ। + नेट की सेटिंग वगैरह सब डिस्टर्ब है. ये भी आईपैड से लिखा है। ११ अगस्त को बेटे का बर्डे है। सो शायद फंक्शन करेंगे ,भंडारा सॉर्ट  ऑफ़।
विल कम सून।