दरअसल जब मैं सजीवता शब्द पर विचार करती हूँ ,तो यकीन मानिये ,मैं विचार ही करती रह जाती हूँ ;किसी नतीजे पर नहीं पहुंच पाती |
इस संग्रह की कहानियों में मैंने सजीव पात्रों का जिक्र किया ,दरअसल तो वे दो -चार ही हैं |मारिया दोस प्राजेरेज़ की मारिया ही एक असली सजीव ,जिंदादिल ,जीवन्त मुलट्टा (अनुवादक ने अनुवाद किया है ) है ,बाकि 'मैं तो बस फोन करने आयी' की मारिया तो परिस्थितियों से लडती हुई स्त्री ज्यादा है | संत के नायक का नायकत्व भी faded सा है |
सच कहूँ ,इन कहानियों में अगर कोई सचमुच में सजीव ,जिंदादिल ,जीवंत है तो वे हैं स्वयं मार्केज |इनकी बयानगी का अंदाज इतना सजीव ,जीवंत और रिच है कि यह अंदाज ही पात्रों की सारी कमियों को छुपा लेता है ,अन्यथा इन कहानियों में ,इन पात्रों को पढने में कोई मजा नहीं |
इस संग्रह की कहानियों में मैंने सजीव पात्रों का जिक्र किया ,दरअसल तो वे दो -चार ही हैं |मारिया दोस प्राजेरेज़ की मारिया ही एक असली सजीव ,जिंदादिल ,जीवन्त मुलट्टा (अनुवादक ने अनुवाद किया है ) है ,बाकि 'मैं तो बस फोन करने आयी' की मारिया तो परिस्थितियों से लडती हुई स्त्री ज्यादा है | संत के नायक का नायकत्व भी faded सा है |
सच कहूँ ,इन कहानियों में अगर कोई सचमुच में सजीव ,जिंदादिल ,जीवंत है तो वे हैं स्वयं मार्केज |इनकी बयानगी का अंदाज इतना सजीव ,जीवंत और रिच है कि यह अंदाज ही पात्रों की सारी कमियों को छुपा लेता है ,अन्यथा इन कहानियों में ,इन पात्रों को पढने में कोई मजा नहीं |
अब जरा देखिये - 'ठीक छह बजे रेस्टोरेंट के भीतर कदम रखती कोई स्त्री 'की स्त्री को |यह एक वेश्या है |इसका रोज़ का काम है की यह एक रेस्टोरेंट में शाम 6 बजे कुछ खाने आ बैठती है |क्योंकि उसका रोज़ का काम है ,सो मालिक से उसकी पहचान हो गयी है ,पहचान क्या मालिक खासा लट्टू है उस पर |(यहाँ तक आपको कहानी में कोई एक्स्ट्राऑर्डिनरी बात नहीं लगी होगी )
एक दिन उसने अपने एक ग्राहक का मर्डर कर दिया ,तो उस दिन वह छः बजे से पहले पहुंच गयी | मर्डर करने के बाद दुकान के मालिक से उसने यह फेवर माँगा की अगर पुलिस पूछे वह अपनी नेकनामी के बल पर उसका कुछ बचाव कर दे |
वह कौन है और किस तरह इस काम में आई ,इसका कोई जिक्र नहीं ,पर इस घटना के बाद उसे अपना फ्यूचर साफ दिख रहा है कि 'मानो एकाएक किसी विचित्र गर्त में ,गन्दी ,अज्ञात शक्लों से पटे पड़े अंडरवर्ल्ड में जा डूबी हो' |(यहाँ तक भी ठीक है |मर्डर किया है तो यह तो होगा ही | )
मगर मर्डर करने का कारण देखिये -
'सुनो ,बताओ ,अगर किसी पुरुष के ,और उस जैसे कई पुरुषों के साथ रहने से वितृष्णा हो जाए और मैं उसे
मार डालूं तो समाज को मुझे क्यों निकाल बाहर करना चाहिए ? (यह है उसकी दीर्घ , इकठ्ठा हुई पीड़ा )
उस दिन क्या हुआ था ?
'क्यों नहीं ,अगर स्त्री उस पुरुष को कपडे पहनते देखे क्योंकि सारी दोपहर उसके संग रगडाती रही ,तब तो बाद में लगाये साबुन और सारे तौलिये भी स्त्री की देह से उसकी गंध मिटा नहीं सकते ?'
मिट जाती है ,रानी .........उसे मारना जरुरी नहीं |उसे बस जाने दो ,छोड़ दो |
क्यों छोड़ दू ,क्यों नहीं मारुँ अगर स्त्री उसे कहे ;घिन हो गयी है तुमसे ,तो पुरुष कपडे पहनना बंद कर फिर उस पर आ चढ़े ,चूमे ......?
कोई भद्र आदमी ऐसा कभी नहीं करेगा ?
लेकिन अगर करे तो ?..............अगर आदमी भद्र न हो और वैसा करे और स्त्री को उससे इतनी नफरत हो जाए कि ख़ुदकुशी करना चाहे ,या उसके गले चाकू उतार कर इस सबका अंत करने के सिवा उसे कोई राह न सूझे .तो ?'
.........................
...........................
..........................यह था मर्डर करने का कारण |घूम गयी न संवेदना की चकरी दिल के अन्दर |हाय !क्या कहें ?निशब्द हैं |
इन्ही कृति साहित्यकारों के लिए धर्मवीर भारती ने कहा कि एक साहित्यकार चीजों को वहां से ,उस एंगल से देखता है ,जहाँ से कोई और नहीं देख सकता |
देह की शुचिता की इन्सान की जिम्मेदारी को यह कहानी बड़ी संवेदनशीलता से दिखाती है |
No comments:
Post a Comment