22-9 -14
आज सुनीता जैन की आत्मकथा पढ़ी -शब्द्काया |पढने का चाव इस प्रकार बन गया की सुधा अरोरा के किसी इंटरव्यू में किन्ही सुनीता का जिक्र आया था |अब वे जैन थी या नहीं ,इसी कन्फ्यूज़न में पढ़ गयी |बाद में दोबारा देखा तो वे सुनीता देशपांडे निकली |खैर ...
सुनीता जैन को पढना भी बुरा नहीं रहा |एक तो जैनियों की हिंदी साहित्य में उपस्थिति की वैसे भी उत्सुकता रहती है ,फिर कहानी के पहले भाग की भाषा सहज लगी तो पढ़ती ही चली गयी |
लेखिका ने अपने संघर्ष को साफगोई से बयान किया है |विशेषकर इनका अपने कालेज की दो अध्यापिकाओं से आकर्षण वाला भाग मुझे ज्यादा अच्छा लगा |अपने जीवन में मीनू मैडम का किस्सा याद आ गया |रामसिंह वाला चैप्टर ठीक तो था पर इसमें रामसिंह का अलग से कोई व्यक्तित्व नहीं उभरा |ऐसा लगा कागज पर उतार कर लेखिका किसी भार से मुक्त हो रही है |
अमेरिका में डिग्री पाने की जद्दोजहद भी प्रेरणास्पद थी |
आत्मकथा में निजी संबंधो का एक व्यक्तित्व बनता है ,वह इस किताब में गायब है |सास से सम्बन्ध ,पति -बच्चों से सम्बन्ध पर इन्होने अधिक नहीं कहा है |
संस्कृत शास्त्री वाला किस्सा ज्यादा ही खिंच गया |
मुनिश्री वाला प्रसंग ठीक था |पर नीरस लगा |
अशोक वाजपेयी प्रसंग ठीक था ,हिंदी के हालात दिखाने के लिए |सब यही बताते हैं |प्रकाशकों ,लेखकों के व्यव्हार पर लेखिका की टिप्पणियाँ धारदार हैं |
नौकरी ,इंटरव्यू वाला प्रसंग भी ठीक था |
कुल 8 प्रसंग है |लेखिका का भाषा प्रेम ,भाषा का व्यक्तित्व निर्माण में योगदान इत्यादि प्रसंग लाजवाब है |गर्मी की छुट्टियों में पुस्तकें पढने की प्रेरणा देना अच्छी सलाह है |
एक जाने -पहचाने परिवेश के बारे में पढना सुखद रहा |
25 -9-14
सुधा अरोरा की कहानी '................भरवां करेले 'में पंडाइन शब्द का प्रयोग पात्र के सजीव चित्रण के लिए बहुत उपयुक्त है |इस शब्द के साथ सीधे पल्ले की साड़ी ,स्थूल का्य ,बीच की मांग निकली .सिंदूर ,कसी हुई चोटी ,बिंदी लगाये हुए महिला का चित्र साक्षात साकार हो उठता है |हिंदी की शक्ति |क्या इस तरह की व्यंजना गुप्ताइन ,या रस्तोगन शब्दों से की जा सकती है |
comments -सुधा अरोड़ा के साहित्य पर और कोई टिप्पणी नहीं है |कमाल है ,मैंने कहीं कुछ भी नहीं लिखा ;जबकि ये मेरी प्रिय कहानीकारों में से हैं |हो सकता है ,ऐसा इसलिए .कि मैं इन्हें अभी तक डिकोड नहीं कर पायी होंगी |
27 -9-14
हिंदी में प्रोफेशनल एटमोस्फेयर ,मनोभावों के चित्रण वाली कहानिया नहीं है |ज्ञान संवेदना का विषय नहीं बना है ,बना भी है तो विडम्बना ,नोस्टेल्जिया के रूप में |
आज सुनीता जैन की आत्मकथा पढ़ी -शब्द्काया |पढने का चाव इस प्रकार बन गया की सुधा अरोरा के किसी इंटरव्यू में किन्ही सुनीता का जिक्र आया था |अब वे जैन थी या नहीं ,इसी कन्फ्यूज़न में पढ़ गयी |बाद में दोबारा देखा तो वे सुनीता देशपांडे निकली |खैर ...
सुनीता जैन को पढना भी बुरा नहीं रहा |एक तो जैनियों की हिंदी साहित्य में उपस्थिति की वैसे भी उत्सुकता रहती है ,फिर कहानी के पहले भाग की भाषा सहज लगी तो पढ़ती ही चली गयी |
लेखिका ने अपने संघर्ष को साफगोई से बयान किया है |विशेषकर इनका अपने कालेज की दो अध्यापिकाओं से आकर्षण वाला भाग मुझे ज्यादा अच्छा लगा |अपने जीवन में मीनू मैडम का किस्सा याद आ गया |रामसिंह वाला चैप्टर ठीक तो था पर इसमें रामसिंह का अलग से कोई व्यक्तित्व नहीं उभरा |ऐसा लगा कागज पर उतार कर लेखिका किसी भार से मुक्त हो रही है |
अमेरिका में डिग्री पाने की जद्दोजहद भी प्रेरणास्पद थी |
आत्मकथा में निजी संबंधो का एक व्यक्तित्व बनता है ,वह इस किताब में गायब है |सास से सम्बन्ध ,पति -बच्चों से सम्बन्ध पर इन्होने अधिक नहीं कहा है |
संस्कृत शास्त्री वाला किस्सा ज्यादा ही खिंच गया |
मुनिश्री वाला प्रसंग ठीक था |पर नीरस लगा |
अशोक वाजपेयी प्रसंग ठीक था ,हिंदी के हालात दिखाने के लिए |सब यही बताते हैं |प्रकाशकों ,लेखकों के व्यव्हार पर लेखिका की टिप्पणियाँ धारदार हैं |
नौकरी ,इंटरव्यू वाला प्रसंग भी ठीक था |
कुल 8 प्रसंग है |लेखिका का भाषा प्रेम ,भाषा का व्यक्तित्व निर्माण में योगदान इत्यादि प्रसंग लाजवाब है |गर्मी की छुट्टियों में पुस्तकें पढने की प्रेरणा देना अच्छी सलाह है |
एक जाने -पहचाने परिवेश के बारे में पढना सुखद रहा |
25 -9-14
सुधा अरोरा की कहानी '................भरवां करेले 'में पंडाइन शब्द का प्रयोग पात्र के सजीव चित्रण के लिए बहुत उपयुक्त है |इस शब्द के साथ सीधे पल्ले की साड़ी ,स्थूल का्य ,बीच की मांग निकली .सिंदूर ,कसी हुई चोटी ,बिंदी लगाये हुए महिला का चित्र साक्षात साकार हो उठता है |हिंदी की शक्ति |क्या इस तरह की व्यंजना गुप्ताइन ,या रस्तोगन शब्दों से की जा सकती है |
comments -सुधा अरोड़ा के साहित्य पर और कोई टिप्पणी नहीं है |कमाल है ,मैंने कहीं कुछ भी नहीं लिखा ;जबकि ये मेरी प्रिय कहानीकारों में से हैं |हो सकता है ,ऐसा इसलिए .कि मैं इन्हें अभी तक डिकोड नहीं कर पायी होंगी |
27 -9-14
हिंदी में प्रोफेशनल एटमोस्फेयर ,मनोभावों के चित्रण वाली कहानिया नहीं है |ज्ञान संवेदना का विषय नहीं बना है ,बना भी है तो विडम्बना ,नोस्टेल्जिया के रूप में |
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