5 -9 -14
आज सआदत की कई कहानियां पढ़ी -
भीष्म साहनी और सआदत के अनुभवों में कितना फर्क है |पागलपन और बर्बरता भीष्म ने भी देखी | फिर भी उनमे कुछ मानवीयता की रोशनी बची रही जो की वे हरनामसिंह (तमस में )जैसा किरदार रच पाए |यह भी उस दौर का एक सच था कि उस भीषण आग में भी कुछ लोगों ने हिन्दू-मुस्लिम से ऊपर उठकर मानवीयता दिखाई होगी | मूल्यों की क्षीण रेखा भीष्म के यहाँ बची है |
पर सआदत के यहाँ मनुष्य गोश्त हो गया है |एक दुसरे को नोचते लोग जानवर दिखाई देते है (क्या जानवर ऐसे होते हैं, यह भी एक वाजिब प्रश्न हो सकता है ?मगर क्या करें |शब्दों की मज़बूरी है |और क्या कहें ? ) |इसमें स्त्री -पुरुषों के बीच शरीर संबंधों पर यह पागलपन भयावह लगता है |इस कहानी ने इसलिए मुझे चौंकाया |
ईश्वर सिंह ने 6 जने क़त्ल कर दिए थे फिर उस लड़की के मृत शरीर का ही उसे क्या अफ़सोस लगा ?
पर नहीं !!!!यही तो बात है इंसान की |
उस लड़की को उसने मारना नहीं भोगना चाहा था ,पर वह खुद मर गयी या वह मरी हुई ही उठा लाया ,भावना की इतनी सी हलचल ने ईश्वर सिंह के समूचे व्यक्तित्व में ऐसी ठसता भर दी की वह न हैवान ही बना और न इन्सान ही बचा |कहीं बीच में ही ठंडा पड गया |भावनाओं के उबाल में एक साथ 10 क़त्ल कर डालना आसान है पर एक लड़की की अनाम मौत झिंझोड़ देती है |ठंडा गोश्त ईश्वर सिंह के भीतर उठते हुए हैवान के ठंडेपन की कहानी है |
in between comment - आप कहोगे हैवान का ठंडापन ? उसने 6 लोग मार डाले ,क्या अब भी उसके हैवान बनने में कोई कसर है ?
मैं कहूँगी -हाँ | हैवान का ठंडापन |
अगर हम इस कहानी को ध्यान से पढ़ें तो हमें दिखाई देगा की कहानीकार ने भी ईश्वर सिंह के प्रति अ -सहानुभूती नहीं दिखाई है |ईश्वर सिंह और उसकी बीवी एक साधारण सरदार दंपति हैं जो ,घर के बाहर हो रहे इतने बड़े बवाल में ,अपना हाथ साफ करने में कोई बुराई नहीं देखते |उसकी बीवी तो लूटे हुए गहने पाकर खुश होती है |उसे ईश्वर के किसी और लड़की के साथ मुह मारने में भी कोई ऐतराज नहीं |दोनों के बीच 'गुनहगारी की परस्पर इजाजत देने वाला '(थैंकयू मार्केज ) एक अनाम समझौता है |
ये स्वाभिमान ,अस्मिता ,शुचिता के प्रश्न पढ़े -लिखों की सरदर्दिया हैं |आम लोग तो खाओ-पीयो-मौज मारो के सिद्धांत पे जीता है |
सआदत को इसलिए इस आदमी से अ-सहानुभूती नहीं ,क्योंकि वे जानते हैं कि ,अन्यथा यह आदमी कितना मासूम है ; क्योंकि वे स्वयं उनमे से एक हैं ,उन्होंने इस आदमी को करीब से ,बहुत करीब से देखा है ,जाना है |
वे जानते हैं कि ,अगर इस पर यह पागलपन तारी न होता तो ,लाश के साथ गन्दा काम करना तो दूर यह आदमी तो उसे छूने से भी डरता |यह तो वो आदमी है ,जो किसी को कन्धा देकर आये ,तो नहाता है |किसी अनजानी लाश को भी दूर से प्रणाम करके वाहे गुरु का नाम याद करता है |
मगर हाय !!!
हाय!!!हाय!!!!
क्या हो गया इसे !!!!
क्यों असफुद्दीन(काल्पनिक नाम ) ने मिलापे(काल्पनिक नाम ) की बेटी को मारा |मिलापा क्यों अपने पिंड के दस लोगों को लेकर चढ़ आया |हाय !!हाय!!
क्यों सरदार जगजीत सिंह (किसी स्थानीय नेता का काल्पनिक नाम )ने ऐन वक्त पर कायरता दिखाई और आग बुझाने की बजाय ,भाग खड़े हुए |हाय !!हाय!!
क्यों जिन्ना ने गाँधी जी की बात नहीं मानी ?
कहाँ तक सोचें?क्या क्या सोचें ?
दिमाग फेल हो गया जी |
बेचारी फूल जैसी लड़की कैसी उघाड़ी झाड़ियों में पड़ी पाई गयी |हाय ! उसका कैसा सलोना चेहरा था! कैसा गोरा रंग था ! कितने सुन्दर नैन-नक्श थे ! कैसा लम्बा कद था! बदन क्या गठीला था !कैसे चढ़े हुए ,गठीले उरोज थे !
सआदत का साहित्य अपने समय का करुण -करुणतम विलाप है |contd
आज सआदत की कई कहानियां पढ़ी -
- टोबा टेक सिंह -लगता है साहित्य जगत में ये इसी कहानी से ज्यादा फेमस हैं |इंटरनेट पर सर्च की तो author of toba teksingh नाम से कई रिज़ल्ट निकले |ठीक थी |
- खोल दे -ठीक थी |बंटवारे की हैवानियत में लोगों पर सदियों का पागलपन तारी हो गया था |
- टिटमार का कुत्ता - भी वही ,जड़ पागलपन को दिखाती है |
- बू -कहानी अच्छी लगी |स्त्री-पुरुष के रिश्ते की नैसर्गिकता को पेश किया है |
भीष्म साहनी और सआदत के अनुभवों में कितना फर्क है |पागलपन और बर्बरता भीष्म ने भी देखी | फिर भी उनमे कुछ मानवीयता की रोशनी बची रही जो की वे हरनामसिंह (तमस में )जैसा किरदार रच पाए |यह भी उस दौर का एक सच था कि उस भीषण आग में भी कुछ लोगों ने हिन्दू-मुस्लिम से ऊपर उठकर मानवीयता दिखाई होगी | मूल्यों की क्षीण रेखा भीष्म के यहाँ बची है |
पर सआदत के यहाँ मनुष्य गोश्त हो गया है |एक दुसरे को नोचते लोग जानवर दिखाई देते है (क्या जानवर ऐसे होते हैं, यह भी एक वाजिब प्रश्न हो सकता है ?मगर क्या करें |शब्दों की मज़बूरी है |और क्या कहें ? ) |इसमें स्त्री -पुरुषों के बीच शरीर संबंधों पर यह पागलपन भयावह लगता है |इस कहानी ने इसलिए मुझे चौंकाया |
ईश्वर सिंह ने 6 जने क़त्ल कर दिए थे फिर उस लड़की के मृत शरीर का ही उसे क्या अफ़सोस लगा ?
पर नहीं !!!!यही तो बात है इंसान की |
उस लड़की को उसने मारना नहीं भोगना चाहा था ,पर वह खुद मर गयी या वह मरी हुई ही उठा लाया ,भावना की इतनी सी हलचल ने ईश्वर सिंह के समूचे व्यक्तित्व में ऐसी ठसता भर दी की वह न हैवान ही बना और न इन्सान ही बचा |कहीं बीच में ही ठंडा पड गया |भावनाओं के उबाल में एक साथ 10 क़त्ल कर डालना आसान है पर एक लड़की की अनाम मौत झिंझोड़ देती है |ठंडा गोश्त ईश्वर सिंह के भीतर उठते हुए हैवान के ठंडेपन की कहानी है |
in between comment - आप कहोगे हैवान का ठंडापन ? उसने 6 लोग मार डाले ,क्या अब भी उसके हैवान बनने में कोई कसर है ?
मैं कहूँगी -हाँ | हैवान का ठंडापन |
अगर हम इस कहानी को ध्यान से पढ़ें तो हमें दिखाई देगा की कहानीकार ने भी ईश्वर सिंह के प्रति अ -सहानुभूती नहीं दिखाई है |ईश्वर सिंह और उसकी बीवी एक साधारण सरदार दंपति हैं जो ,घर के बाहर हो रहे इतने बड़े बवाल में ,अपना हाथ साफ करने में कोई बुराई नहीं देखते |उसकी बीवी तो लूटे हुए गहने पाकर खुश होती है |उसे ईश्वर के किसी और लड़की के साथ मुह मारने में भी कोई ऐतराज नहीं |दोनों के बीच 'गुनहगारी की परस्पर इजाजत देने वाला '(थैंकयू मार्केज ) एक अनाम समझौता है |
ये स्वाभिमान ,अस्मिता ,शुचिता के प्रश्न पढ़े -लिखों की सरदर्दिया हैं |आम लोग तो खाओ-पीयो-मौज मारो के सिद्धांत पे जीता है |
सआदत को इसलिए इस आदमी से अ-सहानुभूती नहीं ,क्योंकि वे जानते हैं कि ,अन्यथा यह आदमी कितना मासूम है ; क्योंकि वे स्वयं उनमे से एक हैं ,उन्होंने इस आदमी को करीब से ,बहुत करीब से देखा है ,जाना है |
वे जानते हैं कि ,अगर इस पर यह पागलपन तारी न होता तो ,लाश के साथ गन्दा काम करना तो दूर यह आदमी तो उसे छूने से भी डरता |यह तो वो आदमी है ,जो किसी को कन्धा देकर आये ,तो नहाता है |किसी अनजानी लाश को भी दूर से प्रणाम करके वाहे गुरु का नाम याद करता है |
मगर हाय !!!
हाय!!!हाय!!!!
क्या हो गया इसे !!!!
क्यों असफुद्दीन(काल्पनिक नाम ) ने मिलापे(काल्पनिक नाम ) की बेटी को मारा |मिलापा क्यों अपने पिंड के दस लोगों को लेकर चढ़ आया |हाय !!हाय!!
क्यों सरदार जगजीत सिंह (किसी स्थानीय नेता का काल्पनिक नाम )ने ऐन वक्त पर कायरता दिखाई और आग बुझाने की बजाय ,भाग खड़े हुए |हाय !!हाय!!
क्यों जिन्ना ने गाँधी जी की बात नहीं मानी ?
कहाँ तक सोचें?क्या क्या सोचें ?
दिमाग फेल हो गया जी |
बेचारी फूल जैसी लड़की कैसी उघाड़ी झाड़ियों में पड़ी पाई गयी |हाय ! उसका कैसा सलोना चेहरा था! कैसा गोरा रंग था ! कितने सुन्दर नैन-नक्श थे ! कैसा लम्बा कद था! बदन क्या गठीला था !कैसे चढ़े हुए ,गठीले उरोज थे !
सआदत का साहित्य अपने समय का करुण -करुणतम विलाप है |contd
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