Sunday, September 4, 2016

मार्केज-8

' एलिवेटर से उतरते  सत्रह शव ' तो पूरी वर्णनात्मक है |एक बूढी ईसाई औरत अपने बूढ़े  के मरने पर कोई मन्नत पूरी करने ,पहली बार अपने घर से अकेली निकली है|उसकी समुद्री यात्रा ,होटलों रेस्टोरेंटों के वर्णन ,सड़कों के वर्णन हैं |इस किरदार को बयां करने में लेखक की दिलचस्पी शायद यह रही होगी कि वे पाठकों को याद दिलाएं की ऐसी धर्म भीरु औरतें भी होती हैं |
अपने यहाँ की किसी पुरानी पंडाइन या शर्माजी सोर्ट ऑफ कोई वर्णन समझ लीजिये |ऐसे कई लोगों की कहानी का भी पाठक वर्ग होता है |इस तरह के किरदार नोस्टेल्जिया बड़ी कुशलता से  क्रिएट करते है |
 'संत ' का नायक अपनी आस्था को जी रहा है |ईसाईयों में संत की पदवी देना ,एक सांस्थानिक परिपाटी है |इस कहानी के नायक की बेटी का शव अर्सा बाद भी सडा नहीं |तो उसे उसके चमत्कार पर यकीं हुआ ,और वह उसे संत की पदवी दिलाने रोम ले आया |
यह कहानी उसके अंतहीन  प्रयास और प्रतीक्षा को दिखाती है |
देखा जाए कहानी में कुछ भी नहीं |मजा कैसे आएगा ?पर ऐसी कहानी में भी ,कुछ युवा विद्यार्थियों के क्रियाकलापों और हरकतों को जोड़कर लेखक  ने इस कहानी को fultush मसाला कहानी बना दिया है ,बिना साहित्यिकता से समझौता किये |
' सोई सुंदरी की हवाई उड़ान ' imperial blue whisky की ad  - men will be men का कहानी संस्करण समझिये |एक गुदगुदाती हुई मीठी 'हार्मलेस 'कहानी |इसमें जापानी मिथक कथा का उपयोग मुझे कहानी के अनुभव को रिच बनाने की दृष्टि से बहुत पसंद आया |
' प्रकाश पानी समान है ' में बच्चों के नज़रिये से जीवन में '  झाँका ' गया है |
 'मैं सपने बेचती हूँ 'की स्त्री को अहसास हुआ कि उसके पास कुछ पराशक्ति है .तो उसने इसी को अपना बिजनेस बना लिया | वे कोई नौसिखिये लेखक होते हैं ,जो मृत्यु को एक शॉकिंग डिवाइस की तरह इस्तेमाल करते हैं |वे पहले किरदार की मज़बूरी दिखाएँगे ,फिर धीरे धीरे उसके समझौते गिनाएँगे ,उन समझौतों में रपटती बेचारे किरदार की ज़िन्दगी का अवसादपूर्ण अंत मृत्यु !!!!!
मार्केज़ पहले पैरा में ही बता देते हैं कि यह फलां इस प्रकार मरा |पर उसने जीवन क्या जीया ? इस बात को वे खोल खोल के ,रस ले ले कर बताते हैं ,कि पाठक को इत्मिनान रहता है कि मरी तो मरी ,अपनी जिंदगी तो जी गयी |
मार्केज की कला का जादू -लोगों को जानने और समझने की उनकी अदम्य जिज्ञासा में है |
जादू की बात कही थी |वह भी बता दूँ |
 इनकी कहानी है -' बर्फ में  जमी तुम्हारे लहू की लकीर ' ,जिसके नाम पर इस संग्रह का नाम है |इस कहानी में वर्णन चल रहा है कि किस तरह नायक -नायिका मिले ,उनमे प्यार हुआ , उन्होंने प्यार को एक्सप्लोर किया और दो महीने की गर्भवती नायिका शादी के बाद फर्स्ट नाइट  व्यतीत करने मेड्रिड से  पेरिस जा रहे हैं ,कार से |उनके घरवालों ने होटल बुक करा रखा है |दोनों उस देश के शाही खानदानों के बच्चे है |
नायिका के हाथ की उंगली में काँटा चुभ गया और किसी ऐसी नस में चुभा की वह सफ़र उसका अंतिम सफ़र साबित हुआ |उसे बराबर होश है अपने जख्म का |महंगी गाड़ी ,पीछे की सीट पर पड़े महंगे उपहार ,उसका  महंगा ओवरकोट | पर हाइवे पर रात के समय ,चिकित्सा कहाँ मिलेगी ?
और ऐसे ही समय ,जब वे दो जन ,किसी डाक्टर को भी देख रहे है ,उन्हें यह भी ख्याल है की पेरिस पहुंच जाएँ ,रात का समय है ,बर्फ पडनी शुरू हो गयी है -
"फिर वो ,हाल के पिछले  दिनों की बाबत ,काफी देर से आह्वान करते आ रहे स्वप्नों में जा डूबी ,और ,किसी ऐसे दुस्वप्निल प्रभाव से चौंककर उठी मानो कार पानी में चल रही हो ,तब यद्यपि खूब विलम्ब से ,याद आया उंगली पर रुमाल बंधा है |उसने डैशबोर्ड के बीच लगी प्रदीप्त घडी में देखा वक्त तीन से ऊपर है ,अन्दाजिया गणना कर समझ पाई कि वे बोर्ड्यु ही नहीं एन्गाऊलिमे और पोइतिएर्स भी पार कर लोआयर के जल प्लावित बाँध की बाजू में चल रहे हैं |धुंध में से छनी चांदनी बिखरी हुई थी और चीड की असंख्य पत्तियों के बीच से दुर्गों,किलों,गढ़ियों की स्याह छायाकृतियों दिखाई दे रही थी मानो परीकथाओं में से निकल कर सामने आ गयी हों |इलाके से भली भांति परिचित नेना -दाकोंते ने अनुमान लगाया वे पेरिस से कोई तीन घंटे ही दूर होंगे ....
इस वर्णन में जादू कहाँ है ?
चांदनी और चीड की पत्तियों में?
पर वे तो होती हैं |ये तो रियल है |
फिर ?
जादू है .इन अलग -अलग प्रकार की वास्तविकताओं को ब्लेंड करने में ,उन्हें मिलाने में |
वास्तविकता को फैला कर उसे और अधिक सघन और रिच बनाने में |       

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