Saturday, July 16, 2016

पॉज़ -3

रेफरेंस वाली बात भी अच्छी निकल आई |यह बात तो है की रोज लिखने का अभ्यास बनाया जाए तो कई बार अनजाने में ही अच्छे पॉइंट्स निकल आते हैं |
कई लोगों के लिए उनकी भाषा ,एक जैसा रहन -सहन ,माहौल उनके रेफरेंस होते हैं | दे फील कम्फर्टेबल |
खैर ..
इस रेफरेंस के कारण मुझे खुद पर इतना भरोसा होता है कि मैं तो किसी से भी जीत लूंगी |कोई भी मेरे सामने क्या टिकेगा ? रजिया गुन्डों में नहीं फंसी बल्कि गुंडे ये सोचेंगे कि ये किस रजिया के सामने फंस गए |जो भी है |अपनी एक आदत की बात मैंने यहाँ शेयर करी |
शायद आगे की बातचीत में प्रसंगों के सन्दर्भ में यह ज्यादा क्लीअर होगी |
अब आगे बढ़ते हैं |  

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