कहानियों के बारे में भी आमजन में अलग-अलग धारणाएं देखने में आती हैं|कभी किसी महान इंसान के जीवन की प्रशंसा करते हुए लोग कहते हैं 'जी इनका जीवन तो एक कहानी है ' | उनका इशारा उस जीवन की शु रुआत,मध्य,अवसान की तार्किकता ,ऊंचाई ,गहराई ,रोचकता ,प्रेरणा की ओर होता है |
तो कभी किसी आदमी के हल्केपन को दिखाने के लिए भी लोग कहते हैं 'जी इसकी बातों का क्या ?इसका तो का म ही कहानी कहना है 'अर्थात कहानियों की झूठी मनघडंत कल्पनाशीलता की लोग निंदा भी करते हैं |
ये दो धारणाएं इस विधा के तत्वों की ओर बड़ा जरुरी इशारा करती हैं |
पहली धारणा कहती है की रोचकता (मनोरन्जन तत्व )की ओर उन्मुखता इन्सानो की स्वाभाविक फितरत है |सपाट सत्य से ज्यादा लोग रंगीन ,हरी-भरी ,रसपूर्ण गलियों में चलना ज्यादा पसंद करते है |
दूसरी धारणा कहती है की सच्चे ,कमेरे लोग (और यह लाजिमी है की वे अवश्य ही प्रभावशाली होंगे |उनकी प्रभावशीलता जगत में ऐसे मानक स्थापित करेगी कि आमजन को और कहानीकारों को भी उनकी पसंद की परवाह करनी ही पड़ेगी |)मनोरंजन के लिए अर्थात केवल मनोरंजन के लिए वे सत्य से समझौता नहीं करते |मनोरजंन की चाह रखते हुए भी वे चाहते हैं कि उन्हें कहानियों (अर्थात सम्पूर्ण साहित्य ही ) से कुछ अलग प्रकार के जीवन सत्य ,स्वभाव सत्य की प्राप्ति हो |
साहित्य में इन दो प्रकार की रुचियों ने साहित्य की श्रेष्टता के मानक स्थापित किये हैं |एक ओर क्लासिक साहित्य है ,दुसरी ओर लोकप्रिय साहित्य है |लोकप्रिय को क्लासिक से कमतर समझा जाता है |
आजकल लोकप्रिय साहित्य को प्रतिष्ठित करने की कवायद ;दरअसल क्योकि सत्ता ही लोक (जनता )के हाथों में चली गयी है तो साहित्य क्यों नहीं ,इसी जरुरत का विस्तार है |
हाँ तो बात चल रही थी कहानी ओर कहानीपन की -
a cup of tea के बाद मुझे एक और कहानी याद आई जो मैंने हिंदुस्तान अख़बार में पढ़ी थी |किसी ईरानी कथाकार की थी | अब तो न कहानी का नाम याद है न लेखक का |बस इतना याद है की वह एक चिडिया के परिवार को आधार बनाकर संयुक्त परिवार के मेलजोलपन को बताती थी\ ठीक थी |अच्छी थी |हलकी थी |(मुझे ज्यादातर हलकी कहानिया ही पसंद आती है ) .............contd
तो कभी किसी आदमी के हल्केपन को दिखाने के लिए भी लोग कहते हैं 'जी इसकी बातों का क्या ?इसका तो का म ही कहानी कहना है 'अर्थात कहानियों की झूठी मनघडंत कल्पनाशीलता की लोग निंदा भी करते हैं |
ये दो धारणाएं इस विधा के तत्वों की ओर बड़ा जरुरी इशारा करती हैं |
पहली धारणा कहती है की रोचकता (मनोरन्जन तत्व )की ओर उन्मुखता इन्सानो की स्वाभाविक फितरत है |सपाट सत्य से ज्यादा लोग रंगीन ,हरी-भरी ,रसपूर्ण गलियों में चलना ज्यादा पसंद करते है |
दूसरी धारणा कहती है की सच्चे ,कमेरे लोग (और यह लाजिमी है की वे अवश्य ही प्रभावशाली होंगे |उनकी प्रभावशीलता जगत में ऐसे मानक स्थापित करेगी कि आमजन को और कहानीकारों को भी उनकी पसंद की परवाह करनी ही पड़ेगी |)मनोरंजन के लिए अर्थात केवल मनोरंजन के लिए वे सत्य से समझौता नहीं करते |मनोरजंन की चाह रखते हुए भी वे चाहते हैं कि उन्हें कहानियों (अर्थात सम्पूर्ण साहित्य ही ) से कुछ अलग प्रकार के जीवन सत्य ,स्वभाव सत्य की प्राप्ति हो |
साहित्य में इन दो प्रकार की रुचियों ने साहित्य की श्रेष्टता के मानक स्थापित किये हैं |एक ओर क्लासिक साहित्य है ,दुसरी ओर लोकप्रिय साहित्य है |लोकप्रिय को क्लासिक से कमतर समझा जाता है |
आजकल लोकप्रिय साहित्य को प्रतिष्ठित करने की कवायद ;दरअसल क्योकि सत्ता ही लोक (जनता )के हाथों में चली गयी है तो साहित्य क्यों नहीं ,इसी जरुरत का विस्तार है |
हाँ तो बात चल रही थी कहानी ओर कहानीपन की -
a cup of tea के बाद मुझे एक और कहानी याद आई जो मैंने हिंदुस्तान अख़बार में पढ़ी थी |किसी ईरानी कथाकार की थी | अब तो न कहानी का नाम याद है न लेखक का |बस इतना याद है की वह एक चिडिया के परिवार को आधार बनाकर संयुक्त परिवार के मेलजोलपन को बताती थी\ ठीक थी |अच्छी थी |हलकी थी |(मुझे ज्यादातर हलकी कहानिया ही पसंद आती है ) .............contd
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