Saturday, July 16, 2016

कहानीपन -5

१८-3-१४
उदय प्रकाश की कहानी 'अनावरण ' पढ़ी | ठीक थी |कहानी में यथार्थ स्थितिओं के कहने के ढंग में वर्णनात्मकता नहीं है ,इसलिए बड़े स्वाभाविक से लगते हैं |पाठकों के स्तर  को लेकर आश्वस्त से हैं |कहानी पढ़ती गयी |पर कुछ चौंकाने वाला सामने आ ही नहीं रहा था |एकदम सूचनात्मक ढंग से चल रही थी |कि ,पर ,उनके बीच ही यह उजागर हुआ कि अनावरण उस व्यवस्था और सिस्टम का है जो आदर्शों के खोखलेपन को ढो  रही है | अच्छी थी |एंड को तार्किक ढंग से संभाल नहीं पाए |
(इनकी दो टिपण्णी और हैं ,इकठ्ठा ही लिख देती हूँ )
२५-3-१४
उदय प्रकाश की कहानी 'अरेबा -परेबा  ' पढ़ी | ठीक थी | पर सपाट कथनात्मक ढंग से बच्चे की मासूमियत को खींचा सा गया है |९-१० साल के लड़के इतने मासूम भी नहीं होते |घटनात्मक क्रम जबरदस्ती की उत्सुकता पैदा करने के लिए रचा गया है |अंत वही फिलोस्फिकल |पवित्र , मासूम के  लुप्त होने का संताप |
१६-4-१४
उदय प्रकाश की कहानी 'जज साब ' पढ़ी | ठीक थी | बल्कि अच्छी लगी |बिलकुल आज के परिवेश को कहानी में रूपायित करती यथार्थवादी कहानी |जिंदगी की लत पर है |वह जो है कि  लोग आदी हो जाते हैं एक जैसी जिंदगी ,आदतों ,कपड़ों और भाषा के |कहानी में सच्चाई है ....|लगभग किसी भी तरह का भाव उत्पादन नहीं करती .....पर अपनी सच्चाई से ;अंत में ; शायद उसांस जैसा कुछ निकले |पठाक सहमत हो कि हाँ ऐसा ही होता है ,यही इस कहानी की उपलब्धि है |
परिवेश की वर्णनात्मकता में मेक्डोनाल्ड ,बीकानेरवाला ,ट्वेंटी -ट्वेंटी जैसी बातचीत डालकर यथार्थ को ज्यों का त्यों रखा है |बिना किसी अतिरिक्त दवाब के |कोई व्यंग्य नहीं ,विरोध नहीं ,'साहित्यिक ' औजारों के शून्य पर फिर भी अत्यंत प्रभावी |
हिंदी पर भी चुटकियाँ ली  हैं |लेखन होने की दुविधा को शेयर किया है |पर आम पाठक के लिए यह सुविधाजनक नहीं होता |
कुमार अनुपम की कविता 'बातूनी लोग ' का कहानी संस्करण लगता है |
पर शीर्षक  'जज साब ' क्यों रखा | ज़िन्दगी की लत होना चाहिए था |
पर इस तरह के जीने को लत क्यों कह रहे है | जीना तो जीना है |may be passionlessness के लिए कहा होगा |

No comments:

Post a Comment