Tuesday, June 14, 2016

कहानी का कहानीपन ,सही सही क्या ?

बी ए  spm college से की | वहाँ  वृन्दावन लाल वर्मा के उपन्यास और शरत चन्द्र के उपन्यास खूब पढ़े | बहुत से अंग्रेजी नावेल भी पढ़े |बल्कि एक समय ऐसा भी आया कि मैं हिंदी से उब गयी थी और इंग्लिश पढना ही पसंद करती थी |थर्ड इयर में ख्याल आया कि इतना कुछ पढ़ती हूँ ,पढ़कर भूल जाती हूँ |कभी कोई पूछ ले कि आपने क्या-क्या पढ़ रखा है तो क्या जवाब दूंगी ? तो ये सोचकर एक बार डायरी में लिस्ट बनाइ  |१३ किताबे याद आई -जिनमे शानी का काला जल ,गोर्की का माँ भी थी |बल्कि माँ उपन्यास की  तो उस समय में  मैंने छोटी-मोटी  समीक्षा भी लिखी थी |.......पर यह सब कुछ जल्द ही भूल-भाला गया|
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अब लगभग  २-३ साल से दोबारा लिखना शुरू किया था |अब वैसी दिखाने की /नुमाइश की  हसरतें बाकी नही रही |बल्कि अब तो कुछ अच्छा लगता है तो नोट कर लेती हूँ ,नहीं तो भूल जाती हूँ |भूल जाने का अब कोई दर्द  नहीं | बल्कि सोचती हूँ अच्छा है |दिमाग का बोझ कम हुआ |पढने का कोई प्रतिबन्ध नहीं है | कुछ भी पढ़ लूँ | पर टिकेगा वही ,जो स्ट्राइक करेगा | इस मामले में मैं खुद को एक  दुश्प्रसाद्य (hard to please)पाठक मानती हूँ |सचमुच एक लेखक के लिए मुझे प्रसन्न  करना अत्यंत कठिन है |लेखन-कर्म के प्रति मेरे आदर्श बहुत ऊँचे है | मैं स्वयं कैसी लेखक हूँ ,यह तो समय ही बताएगा |.....    
तो इस तरह एक बार ख्याल आया कि कहानी क्या होती है ?अर्थात कहानी का कहानीपन ,सही सही ,क्या -किस्मे होता है ?
जाहिर है इस प्रॉब्लम को थेओरीटिकली सोल्व करने चलती ,तो कई सारी  आलोचनात्मक किताबों की  भूल-भुलईया में फंस कर रह जाती |
तो मैंने एक ,स्वयं का ,आसान रास्ता निकाला कि याद किया कि मुझे कौन सी कहानियां पसंद हैं और क्यूँ ? -तो इससे मुझे अपनी पसंद का भी पता चल जाएगा और कहानीपन को भी जानने में आसानी होगी |
(next post -next weeek)
  

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