अब तो मैं ये मानती हूँ कि बहुत ज्यादा पढना आपको फिजिकली लेजी बना देता है |आपको बहुत कच्ची उम्र में 'जिंदगी क्या है ?'जैसे जटिल प्रश्न में उलझा देता है |इस गुत्थी को सुलझाते -सुलझते ,आखिर आपके पास कोई चारा नही बचता की आप शब्दों की दुनिया (जंगल ,बियाबान ,रेगिस्तान ,गहन समुद्र ,अनत आकाश ,भयानक वन ) में पहुंच जाए | बेशक ये स्वास्थ्य (आपके परिवार )के लिए हानिकारक है |
किसी ने सही कहा है कि अति हर चीज की बुरी होती है |खैर ..
पढने की शुरुआत कॉमिक्स से हुई |प्राण की कोमिक्स से -चाचा चौधरी ,पिंकी ,बिल्लू ,रमन |सुपर कमांडो ध्रुव ,अमर चित्र कथा |इनके किरदार हमेशा हँसते ,मुस्कुराते ,चलाचल तबियत के थे |ऐसा लगता था कि पढ़कर हमारी ज़िन्दगी में भी रवानगी सी आ गयी है (जो की, उस समय ,वास्तव में पढने से प्रसन्नता आदि भावों की रवानगी होती थी ) खैर ....
सांतवी -आठवी तक मैंने जैन कथाएँ -केवल मुनि जी की (जिनमे मैंना सुंदरी ,गुणसागर ,धन्ना सेठ,अमर कुमार ) पढ़ ली थी | (उपलब्धता के कारन ,क्योंकि पीतम पुरा में हमारा घर जैन स्थानक के सामने ही था |मेरे जीवन में यह संयोग हमेशा रहा | हमारे घर अधिकतर जैन स्थानक के आस-पास ही रहे | क्योंकि पापा सोचते थे कि इससे धार्मिक रूटीन (चातुर्मास में गुरुओं के दर्शन ,प्रवचन सुनना इत्यादि )को फ़ॉलो करने में आसानी रहेगी |बिना उस रूटीन के लगता था कि जीवन में कुछ अर्थपूर्ण ........नहीं हो रहा है |खैर ...... )
टेंथ तक मुझे ये रिअलाइज़ (कोन्शिअसली )हो गया था कि मैं शब्दों की दुनिया में पहुंच गयी हूँ | मैं यहाँ अकेली हूँ| यह बहुत भयानक है | लेकिन मुझे चलना होगा | रास्ता निकालना हो होगा |
किसी ने सही कहा है कि अति हर चीज की बुरी होती है |खैर ..
पढने की शुरुआत कॉमिक्स से हुई |प्राण की कोमिक्स से -चाचा चौधरी ,पिंकी ,बिल्लू ,रमन |सुपर कमांडो ध्रुव ,अमर चित्र कथा |इनके किरदार हमेशा हँसते ,मुस्कुराते ,चलाचल तबियत के थे |ऐसा लगता था कि पढ़कर हमारी ज़िन्दगी में भी रवानगी सी आ गयी है (जो की, उस समय ,वास्तव में पढने से प्रसन्नता आदि भावों की रवानगी होती थी ) खैर ....
सांतवी -आठवी तक मैंने जैन कथाएँ -केवल मुनि जी की (जिनमे मैंना सुंदरी ,गुणसागर ,धन्ना सेठ,अमर कुमार ) पढ़ ली थी | (उपलब्धता के कारन ,क्योंकि पीतम पुरा में हमारा घर जैन स्थानक के सामने ही था |मेरे जीवन में यह संयोग हमेशा रहा | हमारे घर अधिकतर जैन स्थानक के आस-पास ही रहे | क्योंकि पापा सोचते थे कि इससे धार्मिक रूटीन (चातुर्मास में गुरुओं के दर्शन ,प्रवचन सुनना इत्यादि )को फ़ॉलो करने में आसानी रहेगी |बिना उस रूटीन के लगता था कि जीवन में कुछ अर्थपूर्ण ........नहीं हो रहा है |खैर ...... )
टेंथ तक मुझे ये रिअलाइज़ (कोन्शिअसली )हो गया था कि मैं शब्दों की दुनिया में पहुंच गयी हूँ | मैं यहाँ अकेली हूँ| यह बहुत भयानक है | लेकिन मुझे चलना होगा | रास्ता निकालना हो होगा |
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